राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में दाखिला लेने के लिए छात्र-छात्राएं कड़ी मेहनत करते हैं। लेकिन उत्तराखण्ड के श्रीनगर स्थित एनआईटी का नौ साल बाद भी यह हाल है कि यहां के 900 से अधिक छात्र-छात्राएं संस्थान छोड़कर अपने घरों को चले गए हैं। बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर छात्र-छात्राए निरंतर आंदोलन करते रहे। पिछले वर्ष आश्वासन देकर उनकी हड़ताल तुड़वाई गई। लेकिन इस बार तो हद हो गई। 19 दिन की हड़ताल के बाद जब कहीं से भी उनकी सुध नहीं ली गई तो तंग आकर उन्होंने एनआईटी कैंपस छोड़कर जाने का फैसला लिया। छात्र-छात्राएं वर्तमान अस्थाई कैंपस को स्थाई कैंपस में शिफ्ट किए जाने की मांग कर रहे हैं। मौजूदा अस्थाई कैंपस दो भागों में बंटा है। छात्र-छात्राएं एक जगह से दूसरी जगह पढ़ने जाते हैं तो नेशनल हाइवे पार करते वक्त दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं। इस साल हुई दुर्घटना में एक छात्रा गंभीर रूप से घायल है। छात्र-छात्राएं इस छात्रा को बेहतर इलाज देने की भी मांग कर रहे हैं। स्थाई कैंपस की मांग अभी पूरी होती नहीं दिखाई देती। नौ साल तो प्रदेश सरकार को इसके लिए भूमि चयन करने में ही लग गए। स्थाई परिसर का निर्माण कार्य पेड़ों की कटाई से आगे नहीं बढ़ सका

चार अक्टूबर से क्लास (व्याख्यान) का बहिष्कार। 19 दिन बाद सभी छात्रों ने एक साथ कैंपस किया खाली। छात्रों की संख्या 50-100 नहीं है, बल्कि करीब एक हजार छात्रों ने संस्थान का बहिष्कार कर दिया। यह भारत ही नहीं, संभवतः दुनिया के इतिहास की पहली घटना है। संस्थान भी राज्य या जिला स्तरीय नहीं है। यह तो राष्ट्रीय स्तर का संस्थान है। जिसमें दाखिले के लिए छात्र दसवीं से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। राष्ट्रीय स्तर के लाखों छात्रों के बीच प्रतियोगिता होती है, उसमें कुछ हजार छात्रों का सलेक्शन होता है। ऐसे होनहार छात्रों का भविष्य एनआईटी उत्तराखण्ड में आकर बर्बाद हो रहा है। इसकी चिंता न तो युवाओं पर सबसे अधिक बोलने वाली केंद्र सरकार को है और न ही भाजपानीत प्रदेश सरकार को।

एनआईटी के छात्रों ने अपनी जिन मांगों के लिए संस्थान खाली कर दिया है, वे मांगें कोई नई नहीं हैं। उत्तराखण्ड में एनआईटी के गठन से ही यह मांगें हैं। आश्चर्यजनक है कि मांगें भी केवल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की हैं। पिछले साल भी छात्रों ने एक हफ्ते तक आंदोलन किया था। तब छात्र आश्वासन से मान गए थे। छात्रों के मुताबिक इस बार आश्वासन देने भी कोई नहीं आया। जबकि इस बार आंदोलन एक खतरनाक दुर्घटना के बाद शुरू हुआ। एनआईटी की ही एक छात्रा सड़क दुर्घटना में घायल होकर जिंदगी से जंग लड़ रही है। एनआईटी के छात्रों के लिए सड़क दुर्घटना नियति हो गई है। इस साल ही इस तरह की यह तीसरी सड़क दुर्घटना थी।

एनआईटी उत्तराखण्ड का अस्थायी कैंपस व्यस्त राष्ट्रीय राजमार्ग 58 के साथ है। क्लास रूम से लैब जाते समय बीटेक की एक छात्रा दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई। छात्रों ने तभी से हड़ताल शुरू की थी। 23 अक्टूबर को 900 से अधिक हड़ताली छात्रों ने विरोध में एक साथ घर जाने का निर्णय लिया। छात्रों ने धमकी दी है कि वे ‘असुरक्षित’ और ‘खराब संसाधन’ वाला वर्तमान अस्थाई परिसर से स्थानांतरित होने तक क्लास का बहिष्कार जारी रखेंगे।

एनआईटी एक राष्ट्रीय महत्व वाला संस्थान है। एनआईटी उत्तराखण्ड 2009 में ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत स्वीकृत 10 नई एनआईटी में से एक था। यहां 2010 में छात्रों का एडमिशन शुरू हुआ। अस्थाई कैंपस श्रीनगर के राजकीय पॉलिटैक्निक और आईटीआई के कैंपस में शुरू किया गया। आठ साल बाद भी 980 छात्रों वालों यह एनआईटी 3.4 एकड़ के अस्थायी कैंपस से स्थाई कैंपस में शिफ्ट नहीं हो पाया।

बीटेक (इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स) के तीसरे वर्ष की छात्रा नीलम मीना के सड़क दुर्घटना में घायल होने के बाद छात्रों ने हड़ताल शुरू कर दी। इस साल एनएच 58 पर दुर्घटना की शिकार हुई नीलम एनआईटी की तीसरी छात्रा है जो गंभीर रूप से घायल हो गई। उसके सिर, चेस्ट और रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट है। एम्स ऋषिकेश में उसका अभी भी इलाज चल रहा है। नीलम के शरीर का निचला हिस्सा काम नहीं कर रहा है। इस दुखद घटना ने छात्रों को आंदोलित कर दिया। पिछले साल भी छात्रों ने स्थाई परिसर में एनआईटी शिफ्टिंग को लेकर छह दिन का आंदोलन किया था।

श्रीनगर स्थित एनआईटी परिसर दो हिस्सों में बंटा है। राजकीय पॉलिटेक्निक कैंपस के एक हिस्से में एनआईटी का क्लास रूम और हॉस्टल है। करीब 400 मीटर दूर आईटीआई कैंपस में एनआईटी का प्रशासनिक भवन और लैब (प्रयोगशाला) है।

एनआईटी के विभिन्न कार्यों के लिए जिस भवन का इस्तेमाल किया जा रहा है, उनमें से कई बिल्डिंग पुरानी बनी हुई हैं। ये पुरानी बिल्डिंग्स भी 2013 की आपदा में काफी क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। राष्ट्रीय महत्व वाले इस संस्थान की सभी लैब दयनीय स्थिति में हैं। हॉस्टल में रूम्स की कमी के कारण एक रूम में छह-छह छात्र शेयरिंग करते हैं। एनआईटी श्रीनगर के निदेशक श्याम लाल सोनी कहते हैं, ‘इस साल बी टेक की सीट बढ़ाई गई हैं। इनकी संख्या 150 से 300 की गई है। इस वजह से भी छात्रों के लिए जगह और सुविधाओं की कमी है।’ कुल 980 छात्रों में 866 छात्र इंजीनियरिंग कर रहे हैं। इनके अलावा 90 छात्र एम टेक कर रहे हैं और 24 छात्र पीएचडी में हैं।

एनआईटी उत्तराखण्ड अपने स्थाई कैंपस के लिए कई डेड लाइन को पार कर चुका है। आठ साल से इसे स्थाई कैंपस नहीं मिल पाया है। सबसे पहले श्रीनगर से करीब 15 किलोमीटर दूर सुमाड़ी गांव में 310 एकड़ भूमि एनआईटी को राज्य सरकार ने अलॉट की। यह भूमि दिसंबर 2013 में एनआईटी को ट्रांसफर की गई। उस वक्त 2015 में एनआईटी को अपने इस स्थाई कैंपस में शिफ्ट होना था।

वर्ष 2014 में नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) ने सुमाड़ी में बाहरी दीवार का काम शुरू किया। साइट डेवलपमेंट के लिए एनबीसीसी ने प्रारंभिक इस्टीमेट 188.26 करोड़ का दिया। फर्स्ट फेज के काम के लिए 315.75 करोड़ रुपए का इस्टीमेट दिया। इस अनुमानित बजट को रिवाइज कर 1200 करोड़ रुपए कर दिया गया। तब जाकर एचआरडी मिनिस्ट्री ने सुमाड़ी में चल रहे काम को निरस्त कर दिया।

28 जून 2016 को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने उत्तराखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को एनआईटी के लिए नई लैंड चिÐत करने का आग्रह करते हुए पत्र लिखा। जब राज्य सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की तो 10 फरवरी 2017 को वर्तमान मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने तत्कालीन मुख्यमंत्री रावत को ईरानी के आग्रह को दोहराते हुए पत्र लिखा।

12 जून 2017 को एनआईटी उत्तराखण्ड के सिविल इंजीनियरिंग विभाग ने सुमाड़ी की भूमि से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में ‘जीवन और संपत्ति की सुरक्षा’ को लेकर चेतावनी दी गई थी। रिपोर्ट में सुमाड़ी साइट को भूस्खलन, भूकंप और बादल फटने जैसे खतरनाक आपदा की जद में बताया गया था। एनआईटी प्रशासन का कहना है कि सुमाड़ी स्थित भूमि भूस्खलन की जद में है। भूस्खलन से कैंपस को बचाने के लिए कई रिटेनिंग वॉल बनाने पड़ेंगे। जिससे कैंपस को बनाने में खर्च बढ़ेगा।

प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत का कहना है कि हमें ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने हमें कहा कि सुमाड़ी में प्रस्तावित निर्माण पर खर्च बहुत ज्यादा आ रहा है। इसलिए अब हमने एनआईटी के लिए जलेथा गांव में 112 एकड़ भूमि चिन्हित की है।

 

अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश कहते हैं, सुमाड़ी के भूमि मालिक ने सरकार को अपनी भूमि हस्तांतरित कर दी है। जलेथा में भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया में है। जल्द ही यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। केंद्र सरकार के नियम के मुताबकि प्रदेश सरकार को भूमि उपलब्ध करानी है। प्रदेश द्वारा भूमि उपलब्ध कराने के बाद ही संस्थान के निर्माण का काम शुरू होगा।

एनआईटी के लिए दो स्थानों पर भूमि उपलब्ध होने के बारे में एनआईटी के निदेशक श्याम लाल सोनी कहते हैं, ‘इन दोनों भूमि के बीच करीब साढ़े तीन किलोमीटर का फासला है। इससे संस्थान के दो कैंपस बनेंगे। दोनों दुर्गम क्षेत्र हैं। शिक्षकों और विशेषज्ञों को इन दुर्गम जगहों पर जाने में परेशानी होगी। एक स्थाई कैंपस की समस्या इससे दूर अवश्य हो जाएगी।

शुरू से ही एनआईटी विवादों में रही है। करीब नौ साल बाद भी एनआईटी के स्थाई परिसर का निर्माण कार्य पेड़ों को काटने से आगे नहीं बढ़ पाया है। लैंड मिलने के बाद ही एनआईटी में स्थाई परिसर का काम शुरू होगा। कई स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सब एनआईटी को कहीं और शिफ्ट करने की साजिश है। शुरुआत से ही विवादों में रही एनआईटी एक सहायक प्रोफेसर की सेवा समाप्ति को लेकर भी विवादों में आ गई थी। सहायक प्रोफेसर ने एनआईटी के निदेशक पर गंभीर आरोप लगाये थे। सुवादीप भटाब्याल ने आरोप लगाए थे कि एनआईटी निदेशक संस्थान की फैकल्टी का मानसिक उत्पीड़न करते हैं। जो कोई भी इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करता है उसे पद से हटा दिया जाता था। उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा है कि निदेशक तमाम तरह की अनियमितताओं को जन्म दे रहे हैं। संस्थान का पठन- पाठन प्रक्रिया पूरी तरह से लड़खडा गई है। संस्थान इन दिनों पुनः विवादों में है।

परिसर छोड़ने से पूर्व छात्र-छात्राओं ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, उत्तराखण्ड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री उत्तराखण्ड, एमएचआरडी सचिव और एनआइटी के निदेशक को पत्र भेजे हैं। जिसमें उन्होंने लिखा है कि वे तत्काल स्थायी कैंपस में शिफ्टिंग चाहते हैं। जो सुविधानक, चिकित्सीय सुविधाएं कॉरपोरेट एक्सपोजर और मानकों को पूरा करता हो। छात्रों की मांगें हैं कि घायल छात्रा के इलाज का खर्चा उठाया जाए। स्थायी कैंपस के लिए भूमि चयन और निर्माण शुरू किया जाए। एनआईटी के छात्र नेता विकास कुमार का कहना है कि आंदोलन के कई दिन बाद भी राज्य और केंद्र सरकार ने कोई सुध नहीं ली। उन्होंने पत्र के साथ भेजे गए ज्ञापन पर कार्यवाही की मांग की है। उन्होंने कहा कि जब तक एक कैंपस से दूसरे कैंपस में आने-जाने के लिए वैकल्पिक रास्ता नहीं बनता, कोई छात्र वापस नहीं आने वाला।

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान एनआईटी उत्तराखंड श्रीनगर से कैंपस छोड़कर अपने घरों को गए छात्रों को वापस बुलाने को लेकर अभी तक एनआईटी प्रशासन व शासन के स्तर से कोई समाधान नहीं निकल पाया है। एनआईटी छात्रों को कैंपस छोड़े एक सप्ताह से ज्यादा का समय हो गया है। इसके बावजूद शासन-प्रशासन एवं एनआईटी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। एनआईटी कैंपस श्रीनगर में 30 दिनों से शैक्षणिक कार्य ठप है। आज एनआईटी कैंपस सूना पड़ा हुआ है। इससे छात्रों का जहां पढ़ाई का नुकसान हो रहा है, वहीं एनआईटी प्रशासन, एमएचआरडी और उत्तराखण्ड शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। एनआईटी के कार्यवाहक निदेशक प्रो आरबी पटेल ने बताया कि वह लगातार छात्रों और उनके अभिभावकों के संपर्क में हैं। बार-बार उनसे वापस लौटने की अपील की जा रही है। लेकिन छात्र मानने को तैयार नहीं हैं।

उत्तराखंड सरकार में उच्च शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने एनआईटी छात्रों को एक कैंपस से दूसरे कैंपस जाने के लिए रेशम फार्म से लगी जमीन से रास्ता देने की बात कही थी। जिस पर एसडीएम श्रीनगर एमडी जोशी ने स्थलीय निरीक्षण कर जमीन को चिन्हित भी किया। लेकिन अभी इस जमीन से रास्ता निकालने के लिए संबंधित विभाग और शासन से एनओसी नहीं ली गई है। जिससे रास्ता बनाने का काम भी शुरू नहीं हो पाया है। एसडीएम एमडी जोशी का कहना है कि रेशम फार्म से लगी जमीन को चिÐत कर दिया गया है। इसके लिए शासन और संबंधित विभाग से एनओसी मिलने के बाद रास्ता बनवा दिया जाएगा।

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