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गुजरात बचाने की जद्दोजहद

प्रधानमंत्री मोदी के गृहराज्य में कमजोर हो रहे संगठन के भीतर उत्साह भरने की नीयत से वेदांता समूह के जरिए भारी-भरकम पूंजी निवेश चुनाव से ठीक पहले राज्य में कराया गया है। हालांकि गुजरात बचाने की इस कवायद ने पार्टी शासित दूसरे महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र में न केवल सहयोगी दल शिव सेना (शिंदे) को नाराज कर डाला है बल्कि स्वयं राज्य भाजपा भीतर इस मुद्दे चलते आंतरिक क्लेश तेज हो चला है

भारतीय कंपनी वेदांता और ताइवान की इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी फाक्सकान के सेमी कंडक्टर प्लांट को महाराष्ट्र से गुजरात शिफ्ट किए जाने के एलान बाद महाराष्ट्र में सियासत गर्म हो गई है। वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने जैसे ही ऐलान किया उनकी कंपनी सेमी कंडक्टर प्लांट को गुजरात में लगाने जा रही है, वैसे ही महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों ने मोर्चा खोल दिया। शरद पवार से लेकर आदित्य ठाकरे ने वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे सरकार पर साजिश करने का आरोप लगा डाला। उनका कहना है कि महाविकास अघाड़ी सरकार ने जो प्रोजेक्ट महाराष्ट्र लाने का 90 फीसदी काम पूरा कर दिया था, उसे शिंदे सरकार ने एक झटके में जाने दिया। विपक्षी नेताओं ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर इस सेमीकंडक्टर प्लांट को महाराष्ट्र से गुजरात शिफ्ट किया गया है।


इस प्लांट को लगाने के लिए गुजरात सरकार ने कंपनी सब्सिडी के तौर पर 2800 करोड़ रुपये देने का फैसला किया है ,जबकि महाराष्ट्र की सरकार ने कंपनी को लगभग 3900 करोड़ की सब्सिडी देने की बात कही थी। इसके बावजूद अचानक ही वेदांता और फाक्सकान कंपनी ने महाराष्ट्र की बजाए गुजरात अपनी कंपनी लगाने का फैसला किया है। कंपनी गुजरात के अहमदाबाद जिले में लगभग 1000 एकड़ की जगह में इस सेमी कंडक्टर प्लांट को लगाएगी। इसमें सेमीकंडक्टर असेंबलिंग और टेसि्ंटग यूनिट प्रमुख है। इस ज्वाइंट वेंचर में वेदांता की हिस्सेदारी लगभग 60 फीसदी होगी जबकि 40 फीसदी हिस्सेदारी ताइवान की कंपनी फाक्सकान की होगी। इसके लिए सरकार के साथ वेदांता और फाक्सकान कंपनी ने अनुबंध किए हैं। हालांकि वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने यह भी कहा है कि हमारी कंपनी ने फिलहाल भले ही सेमी कंडक्टर प्लांट के लिए गुजरात को चुना हो, लेकिन अभी भी महाराष्ट्र की उम्मीदें जिंदा हैं। हम यंहा दूसरा सेमी कंडक्टर प्लांट लगाने की तैयारी में हैं, जिसमें आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र हमारी प्रमुख प्राथमिकता में है।

यह ऐलान ऐसे समय हुआ है,जब गुजरात में अगले दो-तीन महीने में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इस दृष्टि से भाजपा के लिए चुनाव प्रचार के दौरान जनता को लुभाने के लिए एक अच्छी उपलब्धि मिल गई है। पिछले वित्त वर्ष के आंकड़ों को देखें तो गुजरात का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने में छठा स्थान था। इस अवधि में राज्य में केवल 20,169 करोड़ रुपए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया था। जिसकी वजह से गुजरात प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में कर्नाटक, महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, तमिलनाडु से पिछड़ गया था। लेकिन 1 .54 लाख करोड़ रुपये का निवेश गुजरात को एक बार फिर नंबर वन पर पहुंच सकता है। डिपार्टमेंट फॉर प्रोमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2021-22 के दौरान सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त करने वाला राज्य कर्नाटक है, जहां 38 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया है। इसके बाद 26 प्रतिशत के साथ महाराष्ट्र दूसरे नंबर और 14 प्रतिशत के साथ दिल्ली तीसरे स्थान पर है। लेकिन चालू वित्त वर्ष में अकेले 1 .54 लाख करोड़ रुपए के निवेश गुजरात में लगने वाले इस प्लांट में किया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट में एक बड़ा हिस्सा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के जरिए निवेश किया जाएगा।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का गुजरात में पिछले 22 सालों में सबसे खराब प्रदर्शन रहा था। भाजपा ने तब 99 सीटों पर जीत दर्ज कर सकरार बनाई थी।, लेकिन भाजपा की जीत में हार भी शामिल थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह न होते तो गुजरात किसी भी हालत में भाजपा की झोली में न आता। उस समय गुजरात में सौराष्ट्र का जल संकट, किसानों के लिए अलाभदायक होती जा रही खेती, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लूट का आलम, बढ़ती बेरोजगारी और पटेल आरक्षण आंदोलन आदि की गंभीरता प्रधानमंत्री मोदी तभी समझ गए जब चुनाव प्रचार के दौरान उनका गुजरात के जनता से सामना हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने नाराज व्यापारियों को मनाने के लिए जीएसटी के नियम में तुरंत बदलाव कर दिया था। इतना ही नहीं मोदी ने मणिशंकर अय्यर द्वारा ‘नीच’ शब्द के बोलने को खूब भुनाया था। इस बयान के कुछ देर बाद ही सूरत की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘एक नेता हैं। बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी से उन्होंने डिग्री ली है। वे भारत के राजदूत रहे हैं। फॉरेन सर्विस के बड़े अफसर रहे हैं। मनमोहन सरकार में वे जवाबदार मंत्री थे। उन्होंने आज एक बात कही। श्रीमान मणिशंकर अय्यर ने कहा कि मोदी नीच जाति का है। मोदी नीच है। भाइयों-बहनों! ये अपमान गुजरात का है। ये भारत की महान परंपरा है?’ क्या ये जातिवाद नहीं है? क्या ये हमारे देश के दलितों का अपमान नहीं है? क्या ये मुगलों की मानसिकता नहीं है, क्या ये सामंतवादी मानसिकता नहीं है? क्या उन्होंने मुझे नीच नहीं कहा? लेकिन हमारे संस्कार इस तरह की भाषा की इजाजत नहीं देते। प्रधानमंत्री ने मणिशंकर अय्यर के बयान को गुजराती अस्मिता से जोड़ कांग्रेस को बैकफुट में ला खड़ा किया था।

अमित शाह ने भी हमेशा की तरह इस चुनाव को बूथ-स्तर तक स्वयं को जोड़ा। पिछले 22 सालों में लेकिन यह भाजपा का सबसे खराब प्रदर्शन था। पहली बार महिलाओं और ग्रामीण क्षेत्रों की वजह से भाजपा का मतदान प्रतिशत 71.3 प्रतिशत से घटकर 68.5 प्रतिशत पर आ गया था। यंहा तक कि प्रधानमंत्री के गृहनगर में भाजपा के 6 मंत्री चुनाव हार गए थे। दूसरे चरण कि प्रचार दौरान मोदी को मैदान में सीधे उतरने से इसका सीधा लाभ शहरी क्षेत्रों में भाजपा को मिली जबरदस्त बढ़त से समझा जा सकता है कि जिसने ग्रामीण इलाकों में मिली हार का अंतर कम करने का काम किया। भाजपा का शहरी क्षेत्र की 85 प्रतिशत सीटों पर जीत मिली जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में कांग्रेस उस पर हावी रही थी। दूसरी ओर किसी बड़े स्थानीय नेता तथा संगठन के अभाव में कांग्रेस को शहरी क्षेत्रों में मात खानी पड़ी थी। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर के समर्थन का कांग्रेस को लाभ मिला था इसके बावजूद जीतते-जीतते कांग्रेस हार गई थी।

भाजपा ने भले ही राज्य मे लगातार दूसरी बार अपनी सरकार बना ली, संगठन में आई कमियों को दूर करने की कवायद उसने तत्काल ही शुरू कर दी थी। एंटी इन्कमबेंसी के चलते हालात लेकिन भाजपा नेतृत्व के अनुकूल हो नहीं पाए जिसका नतीजा रहा 19 बरस बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के साथ- साथ पूरे मंत्रिमंडल का सफाया। भाजपा आलाकमान ने एक नया राजनीतिक प्रयोग करते हुए भूपेंद्र पटेल के नेतृत्व में राज्य में पूरी तरह से नई सरकार का गठन कर डाला।

गुजरात में इस तरह का व्यापक बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का गृह राज्य है। भाजपा का गढ़ माना जाता है। केशुभाई पटेल के बाद नरेंद्र मोदी की अगुवाई में इस राज्य में पार्टी निरंतर मजबूत रही है। खुद प्रधानमंत्री ने 13 साल तक इस राज्य की कमान संभाली है। इसलिए वह इसकी नब्ज अच्छी तरह जानते हैं। संगठन से लेकर चुनावी रणनीति के माहिर अमित शाह भी हर चीज से वाकिफ हैं। ऐसे में गुजरात का यह प्रयोग इस विधानसभा चुनाव में काम आ सकती है। इस महाप्रयोग के बावजूद गुजरात में भाजपा की स्थिति कमजोर बताई जा रही है। भूपेंद्र पटेल के मुख्यमंत्री बनने के बाद से लगातार उनके हटने की कयासबाजियों ने संगठन में व्याप्त गहरे असंतोष को सामने ला दिया है।

इस आंतरिक कलह के साथ-साथ पार्टी को आम आदमी पार्टी की तेजी से बढ़ती लोकप्रियता से भी दो-चार होना पड़ रहा है। आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल गुजरात का निरंतर दौरा कर रहे हैं। अरविंद केजरीवाल की फ्री योजनाओं और वायदों की राजनीति का असर दिल्ली के बाद पंजाब के चुनावों में देखने को मिला और अब जिस तरह से घर पर राशन पहुंचाने, मुफ्त बिजली, किसानों की समस्याओं का हल करने, नए रोजगार के सृजन के लिए किए गए वादों को पूरा करने के लिए पंजाब में सरकारी घोषणाएं हो रही हैं, उसका एक ही मकसद है कि आम आदमी पार्टी कथनी और करनी में अंतर के आरोप को अपने सिर नहीं चढ़ने देना चाहती है। वह दिल्ली और पंजाब की मिसाल देकर गुजरात के अगले चुनाव में उतरने की तैयारी में जुटी है।

राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो प्रधानमंत्री के गृह राज्य में कमजोर हो रहे संगठन के भीतर उत्साह भरने की नीयत से वेदांता समूह के जरिए भारी भरकम पूंजी निवेश चुनावों से ठीक पहले राज्य में कराया गया है। हालांकि गुजरात बचाने की इस कवायद ने भाजपा शासित दूसरे महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र में न केवल सहयोगी दल शिव सेना (शिंदे) को नाराज कर डाला है बल्कि प्रदेश भाजपा में इसके चलते आंतरिक क्लेश तेज हो चला है।

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