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सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) यानी देश की सबसे बड़ी और उच्चस्थ जांच एजेंसी। सीधे सीवीसी के अधीन। इस एजेंसी के दो शीर्षस्थ अधिकारी। दोनों पर भ्रष्टाचार का आरोप। आरोप किसी और ने नहीं खुद उन्होंने एक-दूसरे पर लगाया। एक का मामला कोर्ट में तो दूसरे का सीवीसी के पास। मध्यांतर के रूप में दोनों आरोपित शीर्षस्थ अधिकारियों को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया। सीबीआई के संयुक्त निदेशक नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बनाकर एजेंसी में चल रही हाई वोल्टेज नूरा-कुश्ती पर सरकार ने फिलहाल अर्द्धविराम लगा दिया है। इस पर पूर्णविराम लगना अभी बाकी है। पूर्णविराम लगते-लगते यह उच्चस्थ जांच एजेंसी खुद अपने और केंद्र सरकार के शरीर पर से कितने कपड़ा उतारती है, यह देखने के लिए पूरा देश उत्सुक है।

सीबीआई के दामन पर कई बार दाग लगते रहे हैं। अभी तक दाग अपोजिशन की पॉलिटिकल पार्टियां लगाया करती थीं। जब कभी किसी विपक्षी पार्टी के नेताओं पर सीबीआई कार्यवाही होती थी, नेताओं और संबंधित पार्टी का एक ही जवाब होता था कि सरकार सीबीआई के डर से विपक्ष की आवाज को दबा रही है। यह सीबीआई के शुरुआती कार्यकाल से अब तक निरंतर चला आ रहा है। जिस कारण आम जनता के दिलो-दिमाग पर यह परसेप्शन हावी हो गया है कि केंद्र सरकार सीबीआई का गलत इस्तेमाल करती है। उसके निष्पक्ष चेहरे पर कालिख पोत दी है। इसके बावजूद आज भी आम लोग अपने किसी मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग करते रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कि अराजनीतिक मामलों की जांच में इक्का-दुक्का को छोड़ सीबीआई ने बेहतरीन काम किए हैं। इसलिए सीबीआई आज भी भारत की टॉप जांच एजेंसी बनी हुई है।

मगर इस बार का मामला दूसरा ही है। एक तो इस बार सीबीआई पर किसी राजनीतिक दल ने कोई आरोप नहीं लगाया है, बल्कि सीबीआई के निवर्तमान डायरेक्टर आलोक वर्मा ने अपने नंबर दो अधिकारी विशेष निदेशक राकेश अस्थाना पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया और एफआईआर दर्ज करवाई। सिर्फ एफआईआर दर्ज ही नहीं कराई, बल्कि उनकी पूरी शक्ति छीन ली। दूसरी तरफ विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने अपने डायरेक्टर के भ्रष्टाचार का पुलिंदा सीवीसी को भेज कर उन पर भी आरोप लगा दिया। इन घटनाओं के बाद एजेंसी के शीर्ष के दोनों अधिकारी भ्रष्टाचार के आरोपी हो गए।

राकेश अस्थाना पर मांस निर्यातक मोइन कुरैशी के खिलाफ जांच में रिश्वत लेने के आरोप हैं तो आलोक वर्मा पर भी रिश्वत लेने के ही आरोप लगाए हैं। बताया जाता है कि राकेश अस्थाना के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल यानी एसआईटी गठित हुई थी। यह एसआईटी मांस निर्यातक मोइन कुरैशी केस की जांच कर रही थी। आरोप है, इसकी जांच में कुरैशी को बरी करने के लिए अस्थाना ने रिश्वत ली। दूसरी तरफ अस्थाना का आरोप है कि आलोक वर्मा ने इसकी जांच रूकवा दी। सीबीआई ने राकेश अस्थाना के नेतृत्व वाली एसआईटी में शामिल जांच अधिकारी देवेंद्र कुमार को गिरफ्तार किया था।

कहा जा रहा है कि दोनों शीर्ष अधिकारियों के बीच 2016 से ही खींचतान चल रही थी। तब सीबीईआई के नंबर दो अधिकारी आरके दत्ता का अचानक गृह मंत्रालय में तबादला कर दिया गया था। उनका तबादला डायरेक्टर अनिल सिन्हा के रिटायर होने से ठीक दो दिन पहले किया गया था। यानी वरिष्ठता के मुताबिक दत्ता अगले सीबीआई डायरेक्टर बन सकते थे। इसके बाद राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति स्थायी हो सकती थी, लेकिन वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने उनकी नियुक्ति को चुनौती दे दी। मगर सुप्रीम कोर्ट ने अस्थाना की नियुक्ति को वैध बताया। फिर 2017 फरवरी में आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर बनाया गया, लेकिन कुछ ही महीने बाद यह मामला फिर तूल पकड़ने लगा। तब आलोक वर्मा ने ही राकेश अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बनाए जाने का ये कहते हुए विरोध किया कि उनके खिलाफ कई तरह के आरोप हैं और मामले की जांच जारी है, इसलिए उन्हें एजेंसी में नहीं होना चाहिए।

 

सीबीआई से जुड़े नियमों का उल्लेख दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में है। धारा 4(2) के मुताबिक अगर डायरेक्टर को चुने जाने वाली कमेटी का कोई सदस्य उपस्थित नहीं रहता है तो नियुक्ति को अवैध नहीं माना जाएगा। यानी कमेटी का कोई सदस्य भी किसी एक नाम पर मुहर लगा सकता है। धारा 4 (ठ) के मुताबिक कार्यभार संभालने की तारीख से कम से कम दो साल तक डायरेक्टर पद से कोई हटा नहीं सकता है। इसी कानून के मुताबिक अगर सीबीआई के भीतर ही कोई ऐसा भ्रष्टाचार का मामला आता है तो इसकी जांच अलग होगी।

इस हाई वोल्टेज ड्रामा पर सियासत शुरू होनी स्वाभाविक है। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने सीबीआई निदेशक को छुट्टी पर भेजने पर मोदी सरकार को अपने सवालों से घेरा है। उन्होंने कहा कि आलोक वर्मा राफेल सौदे की जांच के लिए कागजात जुटा रहे थे। मोदी राफेल मामले में कुछ भी कर सकते हैं। उन्होंने वही किया।
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार का बचाव करते हुए कहा, ‘सीवीसी ने अपनी बैठक में धारा 8 और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 4(1) के तहत ये सिफारिश की। इन पर आरोपों की जांच न तो ये दो अधिकारी कर सकते हैं, क्योंकि दोनों पर आरोप हैं और न ही इनकी निगरानी में कोई एजेंसी कर सकती है। इसलिए जांच पूरी होने तक दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेजने का फैसला किया गया।’

1993 में हवाला फंडिंग मामले में विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। ये केस विनीत नारायण बनाम भारत सरकार जजमेंट के नाम से जाना गया। इसी फैसले के बाद सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल किया गया था। सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल फिक्स करने से कुछ नहीं बदला। ना पारदर्शिता आई न कुछ बदला। हर राजनीतिक पार्टी अपने विरोधियों पर हमले के लिए सीबीआई का इस्तेमाल करती है।

 

‘सीबीआई जांच निष्पक्ष नहीं’

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से बातचीत

सीबीआई के पूरे विवाद को आप किस रूप में देखते हैं?
यह पूरा मामला भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने के लिए हुआ है। अस्थाना पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। आलोक वर्मा ने अस्थाना को हटाए जाने की सिफारिश की थी। फिर भी इस सिफारिश को निरस्त कर दिया गया और न जांच हुई, न कोई एक्शन लिया गया। नागेश्वर राव को एक्टिंग डायरेक्टर बना दिया गया। आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

आरोप तो आलोक वर्मा पर भी है?
आलोक वर्मा पर आरोप किसने लगाया है। खुद एक आरोपी ने। ऐसे में उनके आरोप में क्या दम होगा। आप खुद समझिए।

सीबीआई निदेशक को हटाने का अधिकार किसे है?
सीबीआई निदेशक को हटाने के लिए ‘कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग’ को हाई लेवल कमेटी के पास ही मामला ले जाना पड़ेगा। इसके लिए एक बैठक बुलाई जाएगी। ये बताया जाएगा कि ये आरोप हैं। आप बताइए कि इनको हटाना है या नहीं। ये फैसला तीन सदस्यीय कमेटी ही करती है, जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और नेता विपक्ष होते हैं। कैबिनेट कमेटी ऑफ अप्वाइंटमेंट के पास भी इस बारे में कोई अधिकार नहीं है। सरकार के पास भी इस बारे में कोई अधिकार नहीं है।

निदेशक को तो हटाया नहीं गया है, छुट्टी पर भेजा गया है?
यह सरकार को भी पता है। इसलिए निदेशक को सीधे नहीं हटाया। उन्हें छुट्टी पर भेज दिया।

सीबीआई की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों में आप भी अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। आज यदि सरकार दो आरोपी अधिकारियों की जांच करा रही है तो आप ही एक आरोपी के पक्ष में खड़े हैं?
यहां सीबीआई की निष्पक्ष जांच नहीं हो रही है, बल्कि सीबीआई को जो थोड़ी स्वतंत्रता मिली है, उसे भी खत्म किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने बहुत साल पहले सीबीआई को स्वतंत्रता देने के लिए कुछ कदम उठाए थे। पहला ये कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो साल से कम नहीं होगा। ताकि कोई सरकार निदेशक को हटाने की धमकी न दे सके। दूसरा डायरेक्टर की नियुक्ति उच्चस्तरीय कमेटी करती है। हटाने की ताकत सरकार के पास नहीं होती है। पहले भी हमने राकेश अस्थाना की नियुक्ति का विरोध किया था। सारी प्रक्रिया राकेश अस्थाना को बचाने के लिए की गई। हमने रफाल सौदे में सीबीआई में जो शिकायत की थी, उसकी जांच न हो पाए इसलिए ये सब कराया गया।

वर्ष 2014 के बाद निदेशक को हटाने के लिए सिर्फ अप्वाइंटमेंट कमेटी का ही नियम है। अगर निदेेशक के आचरण और उन पर कोई आरोप नहीं हैं तो उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसलिए निदेशक आलोक वर्मा को पद से हटाया नहीं गया, बल्कि छुट्टी पर भेजे गए। इसे सरकार के चोर दरवाजे के तौर पर देख सकते हैं। जो आप सीधे तौर पर नहीं कर सकते वो आप दूसरे तरीके से कर सकते हैं। ब्यूरोक्रेसी पर इसका क्या असर होगा कि कोई भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ काम कर रहा है तो उसे छुट्टी पर भेजा जा सकता है। मोदी सरकार ने कई अच्छे काम किए। लेकिन कोई ईमानदार आदमी बेधड़क अपनी बात कह सके, ऐसा माहौल नहीं दे सके हैं।’
पंकज कुमार सिंह, अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

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