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ऊपर वाला भी जब नीचे देखता होगा तो उसे शर्म आती होगी। सोचता होगा, मैंने तो एक खूबसूरत चीज बनाई थी- नीचे देखा तो वे सब कीड़े बन गए-कीड़े रेंगते रहे। आए-गए-बस खत्म। क्यों आए क्या मरा, नहीं मालूम-कलमवाली बाई क्रांति लाना चाहती थी-कलम के जोर पर। वह वर्तमान को खत्म करना चाहती थी- कौन समझा उसकी बात को-सब साले मुर्दां जिन्दा लाशों ़ ़ ़मैं जाऊंगा-कुछ अच्छा काम करके जा रहा हूं।

नाना पाटेकर, फिल्म क्रांतिवीर। इसी तरह आलोकनाथ और एमजे अकबर की अच्छी और बेहतरीन पंक्तियों को कोट किया जा सकता है। हमारी परंपरा में कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष, दोनों को मिलाकर मुक्कमल माह होता है। उसी तरह क्रांतिवीर की उपस्थित संवाद या एमजे अकबर का महान कारनामा, आलोकनाथ की सिनेमाई मार्यादा उनके पेशे की चमक है। लेकिन इस पेशागत चमक की बौद्धिक छवि के पीछे का अंधेरा गमनाक नहीं, शर्मनाक है।

स्टार पत्रकार, संपादक एमजे अकबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल से अंततः इस्तीफा देना पड़ा। ‘मीटू’ अभियान में घिरे विदेश राज्य मंत्री अकबर पर पत्रकार प्रिया रमानी समेत 20 महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया है। अकबर ने इस्तीफा देने में देरी की। और सच तो यह है कि उन्होंने इस्तीफा दिया नहीं है। अलबत्ता प्रधानमंत्री ने उनका इस्तीफा लिया है। प्रधानमंत्री की सांस आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी की बहुमत के लिए की जा रही जद्दोजहद में अटकी है। वह लगातार पूरे मुल्क में छुमक-छुमक मंचों से ‘बेटी बचाओ’ मुहिम की गुणगान कर रहे हैं। अकबर के यौन उत्पीड़न के आरोप में फंसने के बाद उनका नैतिक पक्ष कमजोर हो रहा था। मोदी सरकार का यह पहला विकेट है जो ऐन चुनाव के वक्त गिरा है। कुछ लोग इस इस्तीफे में हिंदू-मुस्लिम फैक्टर भी देख रहे हैं। उनको लगता है कि एक मुसलमान को इस्तीफा दिलवा देने से हिंदू समुदाय थोड़ा खुश हो जाएगा।

एशियन एज में एमजे अकबर के साथ काम कर चुकी वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्तफा के मुताबिक-जब उन पर आरोप लगने शुरू हुए थे, तभी इस्तीफा दे देते तो थोड़ी इज्जत बच सकती थी। लेकिन वो कोर्ट में लड़ने गए और उसके बाद जिस तरह से लोग सामने आए, उसके बाद ही उन्होंने इस्तीफा दिया। उनके खिलाफ सिविल सेवा के अधिकारियों ने राष्ट्रपति तक को शिकायत दी है। इस्तीफा के बाद अकबर करियर के सबसे नीचे पायदान पर जरूर पहुंच गए हैं।

माना जा रहा है कि भाजपा के भीतर भी अकबर के खिलाफ माहौल बनने लगा था। पार्टी की महिलाओं ने दबाव बनाया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी इस मसले पर अकबर के विरुद्ध था। इसके बाद ही मोदी के संदेश वाहक बनकर अजीत डोभाल अकबर के पास पहुंचे और उनको इस्तीफे के लिए राजी किया। मोदी सरकार की महिला मंत्रियों ने भी ‘मी टू’ का समर्थन कर अकबर के इस्तीफे के लिए दबाव बनाया।

अपनी पुस्तक ‘ब्लड ब्रदर्स’ में एमजे अकबर ने लिखा है कि ‘गाईड’ की वहीदा रहमान ने उन्हें प्रेम और व्यभिचार का पहला पाठ पढ़ाया था। यह फिल्म जब आई थी तब उनकी उम्र 14 साल की थी और लगता है फिल्म की नायिका ‘राजी’ से उन्होंने गलत पाठ सीख लिया, काश वह राजू ‘गाईड’ के जीवन दर्शन की तरफ आकर्षित होते। तब तो उनको इस बात का इल्म भी नहीं होगा कि जबरन व्यभिचार का घेरा उनके इर्द-गिर्द 67 साल की उम्र में जाकर कस जाएगा। खास बात यह कि इसी पुस्तक में उन्होंने यह भी लिखा है कि कैसे 1967 का साल उन्होंने शार्मिला टैगोर की बिकनी देखकर काट लिया था, जो उन्होंने ‘एन एवनिंग इन पेरिस’ फिल्म में पहनी थी। फिल्मफेयर के कवर पर वह तस्वीर छपी थी। अकबर की दीवानगी का तब यह आलम था कि पचास पैसे वाली वह पत्रिका उन्होंने पांच रुपए देकर खरीदी थी।

 

कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के विरोध में

सवाल है कि ‘मी टू’ के इस अभियान के भारतीय संस्करण का रेंज क्या है? इसका दूरगामी नतीजा क्या होगा। इससे क्या हमारी सामाजिक संरचना और सोच में कोई बुनियादी फर्क आएगा। इसके मूल में भय है। वह डर ही था जिसने पुरुषों को जबरदस्ती करने की छूट दी? वह भी डर ही था कि वह दशकों तक अपने खिलाफ हुए जुल्म के बाबत खामोश रही। यह भी भय ही है कि अभी तक सिर्फ सिनेमा और अंग्रेजी दुनिया की स्त्रियां ही अभियान के तहत अपनी जुबान खोल रही है।

अभी तो इस अभियान का माहौल बनना शुरू हुआ है? इसका परवान चढ़ना अभी बाकी है। कहा जाता है कि जो चीज दबी होती है, वह बहुत ही विस्फोटक होती है। वह बेहद दूर तक मार करती है। ज्वालामुखी की तरह। भारत में स्त्रियों को शुरू से ही कभी छल तो कभी बल से दबाकर रखा गया है। देवी कहकर उनके साथ दलितों के जैसा व्यवहार किया गया। उनको बोलने से रोका गया। उनको निर्णय लेने के अधिकार से वंचित रखा गया।

यह एक पक्ष है कि अधिकांश औरतों के लिए जान वैभव और प्रेम की दर्जाबंदी मायने नहीं रखते हैं। दुख के स्रोत और हिंसा के कारण को अलग करना मुश्किल है। सब घुला मिला है। ‘मी टू’ अभियान की दोहरी चोट है दुष्यंत कुमार की गजलों की तरह। एक तरफ तो स्त्रियों के साथ हुआ शोषण सामने आ रहा है। उनके भीतर साहस ने अपना रास्ता बनाया है और उसका संचार हो रहा है। इस अभियान का दूसरा पहलू यह है जो कि पहले से भी बड़ा है वह यह कि मूर्तियां टूट रही हैं, चेहरों से मुखौटे हट रहे हैं। मुखौटों के हटने के बाद जो चेहरे सामने आ रहे हैं, वह गलीज हैं। मुखौटों के पीछे महानता काफूर है और अमानुषपन सामने है। अब तक जितने लोगों पर भी यौन उत्पीड़न के आरोप लगे हैं वे अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं या नामी-गिरामी हस्ती हैं। आरोप उनकी छवि को धड़ाम से गिरा दे रहे हैं। यह एक मायने में नई किस्म की सभ्यता समीक्षा है।

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