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सोनिया गांधी को बागी नेताओं पर भरोसा नहीं रहा 

नई दिल्ली -ऐसा लगता है कि कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को अब बगावती तेवर दिखाने वाले नेताओं पर भरोसा नहीं रहा। राहुल और प्रियंका की तरह ही वे भी मान चुकी हैं कि नेताओं ने चिठ्ठी लिखकर और मीडिया में लीक कर पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। शायद यही वजह है वे अब इन नेताओं को अहम फैसलों में शामिल करने के बजाए दूर ही रखना चाहती हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने कर भी दी है।

इस बीच कांग्रेस ने केंद्र की मोदी सरकार की ओर से जारी किए गए अध्यादेशों पर विचार के लिए एक कमेटी का गठन किया है। इस कमेटी में गांधी परिवार के कई करीबी नेताओं को जगह दी गई है।जबकि,गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा जैसे पुराने नेताओं को इस कमेटी में जगह नहीं दी गई है । जिसके बाद कहा जा रहा है कि हाल  ही में हुए चिट्ठी विवाद  के बाद एक तरफ सोनिया गांधी इस मामले को डैमेज कंट्रोल की कोशिश में लगी हुई हैं ,तो दूसरी तरफ उनका इन  बगावती नेताओं से भरोसा उठ गया है।

दो दिन पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान गुलाम नबी आजाद सहित 23 बड़े नेताओं की लिखी चिठ्ठी को लेकर काफी हंगामा भी हुआ था।
कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी  की बनाई गई इस कमेटी में जिन नेताओं को रखा गया है उनमें पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह, जयराम रमेश, डॉ अमर सिंह और गौरव गोगोई शामिल हैं। इस समिति के संयोजन की जिम्मेदारी जयराम रमेश को सौंपी गई है। यह कमेटी केंद्र की ओर से जारी प्रमुख अध्यादेशों पर चर्चा और पार्टी का रुख तय करने का काम करेगी।
हाल  में हुई बैठक के दौरान कांग्रेस के कई सदस्यों ने पत्र लिखने वाले नेताओं को भाजपा का समर्थक बताया था। कहा जाता है कि आजाद इन आरोपों से दुखी हैं और उन्होंने तब भी इसे बेबुनियाद बताते हुए इस्तीफे की पेशकश की थी। पत्र लिखने वाले दूसरे नेताओं ने भी इन आरोपों का खंडन किया था।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में हंगामे के बाद गांधी परिवार डैमेज कंट्रोल की कवायद में जुट गया है। चिठ्ठी लिखने वाले असंतुष्ट धड़े की अगुवाई करने वाले गुलाम नबी आजाद को मनाने के लिए सोनिया गांधी ने मोर्चा संभाला है। बैठक के तुरंत बाद राहुल गांधी ने भी गुलाम नबी आजाद से बात कर गिले शिकवे -दूर करने की कोशिश की थी।
गुलाम नबी आजाद को मानने की कोशिश इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे राज्य सभा में विपक्ष के नेता के साथ संसद में कांग्रेस की दमदार आवाज भी हैं। इससे पहले वे जम्मू और कश्मीर राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। एक महीने के अंदर ही संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व यह नहीं चाहता कि पार्टी की एकता को खतरा हो या संसद में उनकी आवाज कमजोर पड़े। चिठ्ठी लिखने वाले असंतुष्ट धड़े की अगुवाई करने वाले गुलाम नबी आजाद  को मनाने के लिए खुद सोनिया गांधी  को आगे आना पड़ा है।

पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने गुलाम नबी आजाद से फोन कर बात की। हालांकि, यह पता नहीं चल सका है कि दोनों नेताओं के बीच क्या बातचीत हुई है। फिर भी इस फोनकॉल की टाइमिंग को लेकर अनुमान लगाया जा रहा है कि गांधी परिवार किसी भी कीमत पर पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को रूठने नहीं देना चाहता है।
कांग्रेस के जिन 23 नेताओं ने सियासी बवंडर खड़ा करने वाले पत्र पर हस्ताक्षर किये थे उनमें गुलाम नबी आजाद, राज्यसभा में कांग्रेस के उपनेता आनंद शर्मा, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पृथ्वीराज चव्हाण, राजिंदर कौर भट्टल , पूर्व मंत्री मुकुल वासनिक, कपिल सिब्बल, एम वीरप्पा मोइली, शशि थरूर, सांसद मनीष तिवारी, पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, संदीप दीक्षित और कई अन्य नेताओं के नाम शामिल थे ।

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