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सोशल मीडिया को लेकर अभी और बढेंगे विवाद

नई दिल्ली। सोशल मीडिया के कटेंट्स को लेकर दुनिया में अक्सर विवाद होते रहे हैं। फेसबुक, ट्वीटर आदि के रवैये को लेकर दुनिया के कई देशों से सवाल उठते रहे हैं और इन पर अंकुश रखने की भी मांग की जाती रही है। भारत में भी इन दिनों सोशल साइट फेस बुक को लेकर एक नया विवाद चल रहा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस खबर के बाद कि फेसबुक भाजपा के कुछ नेताओं को लेकर हेट स्पीच के नियमों को लागू नहीं करती,  कांग्रेस मुखर हो गई है। उसने फेसबुक को निशाना बनाया है कि वह भारत में सत्ताधारी भाजपा के प्रभाव में आकर भेदभाव की नीति अपना रही है। फेसबुक द्वारा घृणा से भरी सामग्री के खिलाफ ‘कार्रवाई नहीं करने’ से भारत में ‘लोकतंत्र अस्थिर’ हो रहा है। कांग्रेस ने फेस बुक के रवैये से उपजे विवाद की जांच के लिए अपने देश में बाकायदा  संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनाए जाने की मांग की है। उसकी इस मांग से न सिर्फ वामपंथी. बल्कि संघ विचारक रहे गोविंदाचार्य भी इत्तेफाक रखते हैं।

हालांकि फेसबुक कांग्रेस द्वारा उठाए गए ऐतराज से सहमत नहीं है। उसकी दलील है कि उसके मंच पर ऐसे भाषणों और सामग्री पर अंकुश लगाया जाता है,  जिनसे हिंसा फैलने की आशंका रहती है। इसके साथ ही कंपनी ने कहा कि उसकी ये नीतियां वैश्विक स्तर पर लागू की जाती हैं और इसमें यह नहीं देखा जाता कि यह किस राजनीतिक दल से संबंधित मामला है। फेसबुक ने यह भी कहा है कि वह नफरत फैलाने वाली सभी सामग्रियों पर अंकुश लगाती है। फेस बुक का स्पष्टीकरण अपने हिसाब से जायज हो सकता है, लेकिन इस बात को कैसे नजरंदाज किया जा सकता है कि यह पहला मौका नहीं है जब फेसबुक की नीति और कार्यशैली को लेकर विवाद हुआ हो,  बल्कि दुनिया के तमाम मुल्कों में समय-समय पर फेसबुक के खिलाफ कठोर कदम उठाने तक की मांग उठी है। कुछ मुल्कों ने कठोर कदम उठाए भी। वर्ष 2016 में सउदी अरब ने यह कहकर फेसबुक नेटवर्किंग साइट के मैसेंजर सर्विस को ब्लॉक कर दिया था कि वह अपनी टेलीकॉम कंपनियों को नुकसान नहीं होने देगा।

माना जा सकता है कि साउदी अरब के इस कदम के पीछे राजनीतिक कारण नहीं था, बल्कि उसे अपनी टेलीकॉम कंपनियों की चिंता थी, लेकिन दुनिया के कुछ प्रमुख देशों से फेसबुक पर किसी खास राजनीतिक पार्टी के पक्ष में झुकाव रखने या यूजर्स के निजी डाटा की सुरक्षा में कोताही के आरोप लग चुके हैं। इन आरोपों के चलते विवाद भी खड़े हुए।

इस साल मई माह में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर नकेल कसने के लिए एक कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर तक किये। अमेरिका में भारतीय मूल की पहली अमेरिकी सांसद कमला हैरिस जो कि अमेरिका में इसी साल नवंबर माह में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से उप राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हैं, उन्होंने  पिछले वर्ष 2019 में  फेसबुक के रेग्युलेशन की बात उठाई थी। उन्होंने कहा था कि फेसबुक ने अपने कारोबार की वृद्धि को उपभोक्ताओं के हितों, खासकर उनकी निजता के अधिकार के ऊपर रखा है। बेशक इस सेवा का हर क्षेत्र में उपयोग हो रहा हो, लेकिन इसे नियमन के दायरे में लाना होगा। इसके अनियमित रूप से चलने पर रोक लगनी चाहिए। उन्होंने इसे बांटने की सलाह दी थी। हैरिस की तरह ही एक और सांसद एलिजाबेथ वॉरेन ने भी फेसबुक को बांटने की संभावना तलाशने पर जोर दिया।

फेस बुक के को- फाउंडर रहे क्रिस ह्यूज ने भी इन दोनों सांसदों जैसी ही बात कही कि अब फेसबुक को अलग-अलग भागों में बांटने का समय आ गया है क्योंकि जकरबर्ग के पास अनियंत्रित शक्ति आ गई है। ह्यूज ने आरोप लगाया कि फेसबुक के यूजर्स की सिक्यॉरिटी से समझौता किया गया है। जकरबर्ग का दुनिया पर प्रभाव हैरान करने वाला है। उन्होंने इसे उद्यमिता के लिए खतरा बताते हुए कहा कि मार्क के पास लोगों की अभिव्यक्ति पर एकतरफा नियंत्रण है। उन्होंने अमेरिकी सरकार से अपील की कि वॉट्सऐप और इंस्टाग्राम को फेसबुक से अलग कर दिया जाए।

हालांकि फेसबुक के (सीईओ) मार्क जकरबर्ग ने कंपनी को बांटने की मांग यह कहते हुए खारिज कर दी कि फेसबुक का आकार वास्तव में अपने यूजर्स और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सुरक्षा के लिए फायदेमंद है। उन्होंने कहा, ‘इसलिए मुझे लगता है कि अगर आप लोकतंत्र और चुनावों की चिंता करते हैं, तो हमारी जैसी कंपनी को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर का निवेश करने में सक्षम होना होगा, जैसे हम चुनावी दखल से निपटने के लिए आधुनिक औजार बनाने में प्रयासरत हैं।’

जकरवर्ग बेशक फेसबुक के को- फाउंडर ह्यूज और फेसबुक पर सवाल उठाने वाले दुनिया के राजनेताओं से सहमत न हों, लेकिन अब उनका इस बात से असहज होना स्वाभाविक है कि इस बीच भारत में फेस बुक के खिलाफ कांग्रेस सहित कुछ अन्य पार्टियां ही आक्रामक नहीं हैं, बल्कि खुद फेसबुक के कर्मचारी ही भारत में राजनीतिक सामग्री के नियमन को लेकर अपनी कंपनी और देश में उसके एक्जीक्यूटिव आंखी दास पर सवाल उठा रहे हैं। अमेरिका और दुनियाभर में फेसबुक के कर्मचारी यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या कंपनी की भारतीय टीम सामग्री नियमन की समुचित प्रक्रिया का पालन कर रही है। 11 कर्मचारियों द्वारा आंतरिक मंच पर फेसबुक के शीर्ष नेतृत्व को लिखे खुले पत्र में मांग की गई है कि भारत और अन्य स्थानों पर नीति तय करने वाली टीम में विविधता पूर्ण प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

दो साल पहले यूरोप की 20 न्यूज एजेंसियों ने गूगल और फेसबुक को फटकार लगाई थी कि वे मुफ्ट में उनका कंटेंट इस्तेमाल कर खूब कमाई कर रही हैं, लेकिन इसके एवज में कुछ नहीं देना चाहती हैं। इस संबंध में फ्रांस की एजेंसी फ्रांस प्रेस, ब्रिटेन की प्रेस एसोसिएशन और जर्मनी की डॉयचे प्रेसेंग्चर समेत 20 न्यूज एजेंसियों के सीईओ ने एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर यूरोपियन संसद से नया कॉपीराइट कानून बनाने की भी मांग की थी।

 फेसबुक और चीन के बीच तो टकराव जैसी स्थितियां देखी गई हैं। इसका अंदाजा इसी वर्ष मई माह में मार्क जकरवर्ग की एक चिंता से लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वह चिंतित हैं कि अन्य देश इंटरनेट को विनियमित करने के लिए चीन के दृष्टिकोण की नकल करने की कोशिश कर रहे हैं। एक वीडियो बैठक के दौरान यूरोपियन यूनियन इंडस्ट्री कमिशनर थियरी ब्रेटन के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, मैं इसको लेकर बहुत कुंद हूं, मेरा विचार है कि चीन जैसे देशों से एक मॉडल बाहर आ रहा है। ये मॉडल उन पश्चिमी देशों के मूल्यों से बेहद अलग है जो चीन से कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक हैं। इस समय में दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी फेसबुक का उपयोग करती है, लेकिन  लेकिन यह चीन में ब्लॉक है। चीनी यूजर्स फेसबुक की जगह वी-चेट का उपयोग करते हैं। गौरतलब है कि चीन ने वर्ष 2015 में भी अपने देश में इंटरनेट को नियंत्रित कर दिया था। वहां फेसबुक, ट्विटर जैसी साइट्स अधिकतर लोगों की पहुंच से बाहर हो गई थी। वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) से लोगों ने काम निपटाये तो सरकार ने एप्पल पर चीनी ऐप स्टोर से अपने सभी वीपीएन हटाने का दबाव डाला और कंपनी को ऐसा करना पड़ा। चीनी अधिकारियों ने गूगल तक को ब्लॉक कर दिया था। इसे देश की सुरक्षा से जोड़ा ग

फेसबुक के नियमन को लेकर दुनियाभर से समय-समय पर राय आती रही हैं और फेसबुक इन पर अमल करने की कोशिश भी करेगा, लेकिन फिलहाल भारत में फेसबुक को लेकर सियासी संग्राम चल रहा है। कांग्रेस कह रही है कि पक्षपात, झूठी ख़बरों और नफ़रत-भरी बातों को से लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ नहीं करने देंगे। दूसरी तरफ संघ के विचारक रह चुके गोविंदाचार्य विवाद की जेपीसी से जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट जाने तक कि बात कर रहे हैं। मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी पहले ही फेसबुक के रवैये को गलत ठहरा चुकी है। जाहिर है कि भारत में शोसल साइट्स का विवाद अभी थमने वाला नहीं है। जानकारों के मुताबिक दुनिया के तमाम मुल्कों में सोशल साइट्स को लेकर विवाद घटने के बजाए आगे और बढ़ने की आशंकाएं हैं।

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