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गुलाम हुए पूरी तरह ‘आजाद’

एक कहावत पुरानी है कि राजनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है, और न कोई स्थाई दुश्मन। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद को लेकर इन दिनों यह कहावत सत्ता गलियारों में खासी कही-सुनी जा रही है। कारण है राज्यसभा में उनका 15 फरवरी को खत्म होने जा रहा कार्यकाल और पार्टी सुप्रीमो सोनिया गांधी का उन पर समाप्त हो चुका विश्वास। सोनिया गांधी अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों में गुलाम नबी पर बेहद भरोसा करती थीं। 1999 में अपना पहला चुनाव कर्नाटक की बेल्लारी लोकसभा सीट और उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से लड़ने और दोनों सीटों से जीत दर्ज कराने वाली सोनिया गांधी ने बेल्लारी से अपनी विजय का सेहरा गुलाम नबी के सिर बांधा था। उन्हें इसका इनाम भी जबर्दस्त मिला। वे न केवल अपने गृह राज्य जम्मू-कश्मीर के सीएम बनाए गए, बल्कि कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार में भी हमेशा कद्दावर नेता बने रहे। अब लेकिन ऐसा नहीं है। भले ही उनके विदाई में दिए गए भाषण के दौरान पीएम मोदी राज्यसभा में भावुक हो उठे हों, गुलाम नबी आजाद के गांधी परिवार संग रिश्तों में खटास आ चुकी है। 2014 में यूपीए गठबंधन का सत्ता से बाहर होना, 2019 में दोबारा भाजपा से करारी शिकस्त मिलना, राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस का प्रदर्शन उम्मीदों से नीचे रहना आदि कई कारणों के चलते गुलाम नबी भी उन नेताओं के संग हो लिये जिन्होंने गलत समय पर गांधी परिवार की काबिलियत को चैलेंज करने का दुस्साहस कर डाला।

गत् वर्ष 23 वरिष्ठ कांग्रेसियों ने जो पार्टी की आंतरिक कमजोरियों को रेखांकित करने और जल्द से जल्द पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने, पार्टी के पदों को चुनाव के जरिए भरने की मांग करने संबंधी पत्र सेनिया गांधी को लिखा था, उन नेताओं में गुलाम नबी भी शामिल थे। इस पत्र ने कांग्रेस में भारी हाहाकार मचाने का काम किया। इन 23 नेताओं की गिनती अब ‘बागियों’ की श्रेणी में की जाती है। यही ‘बागी’ होना गुलाम नबी आजाद की लंबी राजनीतिक पारी का अंत करने जा रहा है। 71 वर्षीय गुलाम नबी ने 1973 में कांग्रेस के ब्लाॅक कमेटी नेता बतौर शुरू की तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1975 में वे जम्मू-कश्मीर प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बने। 1980 में राष्ट्रीय यूथ कांग्रेस के वे अध्यक्ष बनाए गए। 1980 में ही महाराष्ट्र की वासिम लोकसभा सीट से सांसद चुने गए और 1982 में इंदिरा मंत्रिमंडल में कानून मंत्रालय में उपमंत्री बन गए। 1984 में दोबारा सांसद तो 1990 में महाराष्ट्र से ही राज्यसभा सदस्य बने। इसके बाद से वे लगातार सत्ता के केंद्र का हिस्सा बने रहे। नरसिम्हा राव मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री, मनमोहन सिंह सरकार के दोनों कार्यकाल में कैबिनेटै मंत्री तो अब राज्यसभा में नेता विपक्ष। 15 फरवरी को समाप्त हो रहे उनके राज्यसभा टर्म के बाद अब लेकिन उन्हें कांग्रेस आलाकमान दोबारा राज्यसभा भेजने को इच्छुक नहीं बताया जा रहा है।

खबर है कि गुलाम नबी अप्रैल में केरल से खाली हो रही एक राज्यसभा सीट से अपना नामांकन चाह रहे हैं। कांग्रेस यदि चाहे तो अपने संख्या बल के दम पर आजाद की राज्यसभा में वापसी करा सकती है। सूत्रों की मानें तो न केवल कांग्रेस का एक धड़ा, बल्कि यूपीए के घटक दल भी आजाद की राज्यसभा में वापसी के लिए इच्छुक हैं लेकिन टीम राहुल ऐसा करने के लिए कतई भी राजी नहीं बताई जा रही है। आजाद की जिस प्रकार कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल को राजस्थान से और राॅबर्ट वाड्रा के वकील केटीएस तुलसी को छत्तीसगढ़ से राज्यसभा भेजा गया है, वैसे ही केरल से आजाद को भेजा जाना चाहिए। टीम राहुल लेकिन आजाद की विदाई बाद राज्यसभा में नेता विपक्ष का पद मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंपने का मन बना चुकी है। यदि यह होता है तो आनंद शर्मा की स्थिति विकट हो जाएंगी। वे आजाद के बाद राज्यसभा में सबसे वरिष्ठ नेता हैं। उन्हें लेकिन नेता विपक्ष का पद राहुल गांधी की टीम कतई नहीं देना चाह रही है। आनंद न केवल पत्र लिखने वाले उन 23 नेताओं में शामिल हैं, बल्कि गाहे-बगाहे मोदी सरकार के पक्ष में भी खड़े दिखाई देते हैं। पिछले दिनों कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में जिस प्रकार राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत और आनंद शर्मा के मध्य बहसबाजी की खबरें आई हैं, उससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि शर्मा भी कांग्रेस आलाकमान की नजरों में ‘बागी’ बन चुके हैं। कुल मिलाकर अभी तक के हालात गुलाम नबी आजाद की लंबी राजनीतिक यात्रा के अंत की तरफ इशारा करते दिखाई दे रहे हैं।

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