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सियासत की आग में अफसरों की आहुति

उत्तराखण्ड अलग राज्य बन जाने के बावजूद केन्द्र की सत्ता तक पहुंचने के लिए यूपी की 80 सीटों का महत्व आज भी बरकरार है। जब-जब लोकसभा के चुनाव हुए हैं तब-तब यूपी की 80 सीटों पर फतह के लिए राजनीतिक दलों ने राजनीति के मापदण्डों को दरकिनार कर अपने राजनीतिक दुश्मनों को मात देने के लिए ऐसे-ऐसे हथकण्डे अपनाए हैं जिसकी आग में नेताओं की बलि यदा-कदा ही चढ़ी हो लेकिन सियासत की आग में अफसरों की बलि जरूर चढ़ती रही है। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही नजर आने लगा है। शुरुआत आईएएस अधिकारी बी चन्द्रकला के निवास पर सीबीआई की छापेमारी से शुरु हुई है, राजनीति की यह आग आने वाले कुछ दिनों में कुछ ऐसे अफसरों को भी अपनी आगोश में लेने की तैयारी में है जो पूर्ववर्ती सपा सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार की बहती गंगा में लोटे भर-भरकर अपना घर भरते रहे हैं।
पिछले दिनों आईएएस बी चन्द्रकला के घर पर सीबीआई ने अखिलेश सरकार के कार्यकाल में हुए खनन घोटाले को लेकर छापेमारी के बाद यह दावा किया है कि इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से भी पूछताछ की जा सकती है। आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए भाजपाइयों को उम्मीद थी कि सीबीआई के इन दावों के बाद से सपा-बसपा गठबन्धन खटाई में पड़ सकता है।
यूपी भाजपा ने इस शुरु-शुरु में इस घटना को खूब भुनाया और अपने आईटी सेल के सहारे सोशल मीडिया पर हवा फैलायी कि अखिलेश यादव जल्द सीबीआई की गिरफ्त में आ सकते हैं। कुछ ने पूर्व मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी को लेकर भविष्यवाणियां तक शुरु कर दीं। हवा यह भी उड़ी की आईएएस अधिकारी बी चन्द्रकला ने कथित खनन घोटाले को लेकर सीबीआई की पूछताछ में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नाम लिया है। कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया का असर प्रिंट एवं इलेक्ट्राॅनिक मीडिया से बहुत जल्द नजर आने लगता है, इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। भाजपा की मंशा थी कि ऐन चुनाव के वक्त आईएएस के घर पर सीबीआई के छापे और पूर्व मुख्यमंत्री का नाम सोशल मीडिया पर डालते ही सपा प्रमुख अखिलेश यादव कुछ ऐसी गलती कर जायेंगे जिसका फायदा उसे मिल सकता है। हुआ भी कुछ ऐसा ही। सोशल मीडिया पर चर्चा होते ही अखिलेश यादव ने अपने बचाव के वास्ते वे सारे हथकण्डे अभी अपनाने शुरु ही किए थे कि इसकी भनक भाजपा के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर चुनौती देने वाली बसपा प्रमुख मायावती को लग गयी। कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति के मामले में मायावती अपने राजनीतिक भतीजे सपा प्रमुख अखिलेश यादव से ज्यादा अनुभव रखती हैं। बसपा प्रमुख मायावती का यह अनुभव यूं ही नहीं है, जबसे सीबीआई ने मायावती के खिलाफ आय से अधिक मामले में चार्जशीट तैयार कर केन्द्र सरकार के पाले मे कार्रवाई के लिए दे रखी है तभी से चाहें केन्द्र मंे कांग्रेस की सरकार रही हो या फिर भाजपा की, दोनों ही सरकारों ने सीबीआई के रिमोट से मायावती को खूब नचाया है लिहाजा अब बसपा प्रमुख मायावती ऐसे दंद-फंद से भलीभांति वाकिफ हो चुकी हैं। मायावती का यही अनुभव सपा प्रमुख अखिलेश यादव के काम आया। अखिलेश यादव घबराहट में कोई कदम उठाते इससे पहले ही अखिलेश यादव की सियासी बुआ मायावती ने अखिलेश यादव को व्यक्तिगत फोन करके धैर्य रखने को कहा। मायावती ने फोन पर अखिलेश यादव से स्पष्ट कहा है कि वे भाजपा के हथकण्डों से घबराएं नहीं, उन्हें इस बात की पहले से ही उम्मीद थी कि ऐन चुनाव के वक्त भाजपा कोई न कोई ऐसा कदम अवश्य उठायेगी। बसपा प्रमुख मायावती के सिर्फ एक ही फोन ने भाजपा की समस्त उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यूपी भाजपा में हो रही चर्चा को आधार मानें तो वह इतनी जल्द अपने इस दांव को बेकार नहीं जाने देगी। कहा जा रहा है कि जल्द ही कई अन्य अफसरों के साथ ही सपा सरकार के पूर्व मंत्रियों को भी शिकंजे में लिया जायेगा। शिकंजे में फांसने के लिए पूर्व खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति का नाम सबसे ऊपर है। ज्ञात हो श्री प्रजापति एक अन्य मामले को लेकर जेल में हैं और केन्द्र सरकार प्रजापति को राहत का वचन देकर अपने शस्त्र की धार तेज कर सकती है। यूपी भाजपा के एक नेता की मानें तो भाजपा के कई विश्वसनीय पदाधिकारी गायत्री प्रसाद प्रजापति से मुलाकात कर अपनी मंशा से उन्हें अवगत करा चुके हैं। पूर्व खनन मंत्री गायत्री प्रसार प्रजापति ने भाजपा पदाधिकारियों को क्या जवाब दिया? इसकी पुष्टि तो नहीं हो सकी है अलबत्ता यूपी भाजपा के खेमे में खामोशी अवश्य छायी हुई है।
श्री प्रजापति के अलावा खनन विभाग के कई पूर्व व वर्तमान अफसरों पर भी गाज गिरने की संभावना है और यह गाज एक पखवारे के भीतर ही गिरेगी। कहा जा रहा है कि कुछ ऐसे अफसरों को अर्दब में लिया गया है जो पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए तैयार हो गए हैं। चर्चा यह भी है कि यदि अखिलेश सरकार के कार्यकाल में मुख्यमंत्री के विश्वासपात्र अफसरों में शुमार इन अफसरों ने मुह खोला तो निश्चित तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव एक बार फिर से संकट में घिरते नजर आयेंगे। दूसरी तरफ बसपा प्रमुख मायावती ने गठबन्धन के साथी सपा प्रमुख अखिलेश यादव को बचाने के लिए भाजपा के खिलाफ एक बडे़ आन्दोलन की तैयारी की है। निश्चित तौर पर इस आन्दोलन को भाजपा के इन हथकण्डों की काट के रूप में देखा जा रहा है।
फिलहाल सूबे की 80 लोकसभा सीटों पर सपा-बसपा के बीच हुए गठबन्धन (37-37 सीटों पर समझौता) को तोड़ने की यह भाजपाई चाल आने वाले दिनों में क्या रंग दिखायेगी? यह तो भविष्य के गर्त में है लेकिन भाजपा बनाम सपा-बसपा की यह जंग आने वाले दिनों में काफी रोचक होगी, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। इंकार इस बात से भी नहीं किया जा सकता है कि बडे़ नेताओं को फांसने के खेल में कुछ ऐसे अधिकारी जरूर राजनीति का शिकार बन जायेंगे जो खनन घोटाले में महज खुरचन खाने तक ही सीमित रहे हैं।

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