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डेढ दशक पहले घटित ‘कासना कांड’ की याद दिलाता शोपियां फर्जी एनकाउंटर

आपको उत्तर प्रदेश के जिला गौतम बुद्ध नगर में वर्ष 2005 का एक खाकी का जघन्य अपराध याद तो होगा। याद नहीं है , तो हम स्मरण कराते है। इस वर्ष जिले के ग्रेटर नोएडा में स्थित कासना थाने में पुलिस ने 3 बेकसूर लडको को फर्जी एनकाउंटर में मार दिया था। तब प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी । यादव सरकार के दौरान तत्कालीन कासना थाने के प्रभारी आलोक शर्मा ने दादरी के तीन 16 – 17 साल के लड़के आशिफ, अरशद और मेहरबान को पुलिस लॉकअप में हत्या कर दी थी।

 

तब करीब 6 महीने तक मृतकों के परिजन दर – बदर घूमते रहे थे। जब भी परिजन थाने जातें थे, पुलिस उन्हें बार-बार लॉलीपॉप दे थाने से भेज देती थी। आखिर में ‘दि संडे पोस्ट’ ने यह सनसनीखेज मामला उजागर किया था। तब गौतम बुद्ध नगर के इतिहास में पहली बार पूरा का पूरा थाना सस्पेंड किया गया था। यही नहीं बल्कि तत्कालीन कासना थाना अध्यक्ष आलोक शर्मा सहित आधा दर्जन पुलिसकर्मियों पर तीनों लडको की हत्या का मामला दर्ज हुआ था।

 

इसके बाद प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार ने मृतक के परिजनों को दस – दस लाख का मुआवजा दिया । साथ ही उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन भी दिया गया। तब यह मामला सीबीसीआईडी को सौंपा गया था। लेकिन आज 15 साल बाद भी मृतक के परिजनों को न्याय नहीं मिल पाया है । जबकि,दूसरी तरफ आरोपी दरोगा आलोक शर्मा पर सीबीसीआईडी आरोप सिद्ध नहीं कर पाई और वह पुनः पुलिस नौकरी में ज्वाइन कर करा दिए गए।

 

इससे ही मिलता – जुलता एक मामला जम्मू-कश्मीर के शोपियां में सामने आया है। जहां अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लड़कों को सेना ने आतंकवादी बताकर एनकाउंटर में ढेर कर दिया है। गत 18 जुलाई को सेना ने कश्मीर के शोपियां में 3 तथाकथित आतंकियों को एनकाउंटर में मार गिराया था। मारे गए तीनों लड़को पर आरोप लगाया गया कि वह आतंकी गतिविधियों में संलिप्त थे। इसके साथ ही उनके पास से गोला बारूद और हथियार भी बरामद दिखाए थे । इनकाउंटर में मरे युवक इम्तियाज अहमद ( 21 ), मोहम्मद अबरार ( 16 ) और अबरार अहमद ( 25 ) थे। जो राजोरी से शोपियां में आकर मजदूरी कर रहे थे।

 

परिवार वालों को अपने बच्चों के सेना और पुलिस द्वारा  एनकाउंटर में मारे जाने की खबर भी नहीं चली थी कि मृतकों का मेडिकल कराकर उन्हें दफन कर दिया गया। तब सेना ने एनकाउंटर करने के बाद कहा कि सेना की 62 राष्ट्रीय राइफल में इनपुट के आधार पर शोपियां के अंशीमपोरा गांव में आतंकियों की मौजूदगी की जानकारी मिली थी । इसके बाद स्थानीय पुलिस से मिलकर एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया गया। जिसमें 3 आतंकी मारे गए। आतंकियों के पास से हथियार और गोला-बारूद भी बरामद बताए गए। तीनों को पोस्टमार्टम के बाद बारामुला में दफन कर दिया।

 

यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब कुछ परिवारों ने राजौरी जिले के पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उनके परिवार के तीन सदस्य शोपिया के अशीमपोरा से 17 जुलाई से लापता हैं । जहां पर वे सेब और अखरोट के बागान में बतौर मजदूर काम करते थे। परिवारों ने संयुक्त रूप से शिकायत दर्ज कराई और तस्वीर दी और बताया कि 21 वर्षीय मोहम्मद इबरार, 18 वर्षीय इबरार अहमद और 25 वर्षीय इम्तियाज अहमद लापता हैं । जिसके बाद यह जानकारी मामले की जांच के लिए कश्मीर पुलिस को सौंप दी गई।

 

21 दिन बाद 9 अगस्त को एक स्थानीय पत्रकार ने मृतक युवकों के परिजनों को एक समाचार पत्र में छपी उनकी फोटो दिखाई। तब उनके परिजनों ने अपने मृतक बच्चों को पहचाना। तब सेना और पुलिस की इस कार्रवाई पर सवालिया निशान उठाए गए थे । स्थानीय लोग और सोशल एक्टिविस्ट खुलेआम बोले थे कि यह फेक काउंटर है । तब पुलिस भी रहस्यमय चुप्पी साध गई थी।

 

यहा तक कि एनकाउंटर के बाद कश्मीर के आईजी विजय कुमार ने इस मामले पर कोई बयान तक नहीं दिया । हालांकि एनकाउंटर के 1 दिन बाद सेना ने प्रेस को बुलाकर इसकी जानकारी दी और कहा कि आतंकियों के पास से हथियार और गोले बारूद मिले हैं । लेकिन जब पत्रकारों ने सेना से उनका आपराधिक रिकॉर्ड मांगा तो वह नहीं दे सके। हालांकि एनकाउंटर के 22 दिन बाद 10 अगस्त को सेना की तरफ से औपचारिकता पूर्ण जांच शुरू कर दी गई।

 

लेकिन दूसरी तरफ 36 दिन बीत जाने के बाद भी अभी तक भी मृतक तीनों युवकों के परिवार को सेना कोई ऐसा सबूत नहीं दिखा सकती है जिससे यह साबित हो सके कि वह मृतक आतंकवादी थे। मृतकों के परिजन जब सेना और पुलिस के पास पहुंचे तो उन्हें यह कहकर बरगला दिया कि वह अभी तक अच्छी तरह नहीं पहचान सके कि मरने वाले उनके पुत्र ही हैं। लेकिन मुठभेड़ पर सवाल उठे तो तीनों शव कब्र से निकाले गए और डीएनए परीक्षण के लिए नमूने भेजे गए।

 

13 अगस्त को पुलिस ने इस मामले में डीएनए कलेक्ट किए। जिसमें कहा गया कि यह डीएनए तीनों युवकों की पहचान करने के लिए किया जा रहा है । मरने वाले युवक इम्तियाज अहमद, मोहम्मद अबरार और अबरार अहमद ही थे। मृतकों के परिजन कह रहे हैं कि उन्होंने अच्छी तरह अपने बच्चों को पहचान लिया है। मृतक उनके बच्चे ही हैं। ऐसे में पुलिस का मृतकों की पहचान के लिए डीएनए कराने का औचित्य समझ से परे है।

 

13 अगस्त को ही मृतकों के परिजनों से कहा गया कि 10 – 12 दिन में डीएनए की जांच रिपोर्ट आ जाएगी और एनकाउंटर की सच्चाई भी। लेकिन आज 36 दिन बीत जाने के बाद भी ना डीएनए की रिपोर्ट आई है और ने एनकाउंटर की सच्चाई सामने आ सकी है । परिजन न्याय की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं।

 

दूसरी तरफ इस मामले में सेना और पुलिस संदेह के घेरे में है। आखिर किन सबूतों के आधार पर तीनो लडको को मारा गया है। मृतकों से क्या पूछताछ की गई, जिसमें उन्हें आतंकवादी सिद्ध किया गया। पुलिस और सेना तीनों को आतंकवादी कैसे मानती है, इसकी पुष्टि उन्होंने कहा से की ? ऐसे तमाम सवाल है जिनके जवाब मृतकों के परिजन ही नहीं बल्कि पूरा देश चाहता है। लेकिन दूसरी तरफ सेना और पुलिस इस मामले पर लीपापोती करती दिखाई दें रही है।

 

मृतक इम्तियाज अहमद, मोहम्मद अबरार और अबरार अहमद के परिजनों का कहना है कि शोपियां में काम की तलाश में सबसे पहले इम्तियाज अहमद गया था। जहां इम्तियाज अहमद ने एक महीने बाद मोहम्मद अबरार और अबरार अहमद को भी 16 जुलाई के दिन शोपियां में मजदूरी करने के लिए बुला लिया। 17 जुलाई को अबरार अहमद और मोहम्मद अबरार ने बकायदा अपने घर फोन किया और कहा कि वह सही सलामत पहुंच गए है।

 

इसी के साथ मोहम्मद अबरार और अबरार अहमद ने अपने – अपने परिजनों को यह भी बताया था कि उन्होंने कमरा भी ले लिया है। अगले दिन से उनका फोन बंद हो गया। 18 जुलाई को उन तीनों का एनकाउंटर कर दिया गया। तीनों के परिजन यह सोचकर चुप रहे कि कोरोना काल में उन्हें क्वारंटाइन कर दिया गया होगा। जिसके चलते उनका मोबाइल भी बंद कर दिया गया होगा। लेकिन तीनों के ही परिजनों को यह पता नहीं था कि मोबाइल के साथ ही उनकी सांसे भी बंद कर दी गई।

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