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शाह का पूरा होता सपना

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बारे में ऐसा प्रतीत होता है कि वे कांग्रेस मुक्त भारत के अपने लक्ष्य प्राप्ति के नजदीक पहुंच चुके हैं। 2017 में एक चुनावी रैली के दौरान अमित शाह ने महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए कहा था कि राष्ट्रपिता का आजादी बाद कांग्रेस को भंग करने का सुझाव उनकी दूरदर्शिता का परिचायक था। दरअसल, गांधीजी ने अपनी मृत्यु से चौबीस घंटे पहले एक पत्र जारी किया था जिसे उनकी वसीयत भी कहा जाता है। इसमें बापू ने आजादी का लक्ष्य प्राप्त कर चुकी कांग्रेस को भंग कर एक ‘लोक सेवक संघ’ बनाए जाने की बात कही। इसी को कांग्रेस विरोधी गांधी की अंतिम इच्छा कह प्रचारित करते हैं। हालांकि इसी दिन यानी 30 जनवरी, 1948 के ‘हरिजन’ में प्रकाशित महात्मा गांधी के लेख में वे स्पष्ट लिखते हैं कि “Indian National Congress which is the oldest national political organization and which has after many battles fought her non-violent way to freedom cannot be allowed to die. It can only die with the nation.” यानी गांधी स्पष्ट थे कि कांग्रेस तब तक रहनी चाहिए जब तक देश है। गांधी की इस इच्छा का सम्मान वर्तमान में कांग्रेस की दशा देख लगता नहीं कि पूरी होने वाली। हां, अमित शाह जरूर अपने लक्ष्य के करीब पहुंच चुके हैं।

  • राजस्थान की लकवाग्रस्त सरकार भी संकट में
  • रीढ़विहीन, जनाधारविहीन बड़े नेता पूरा कर रहे हैं शाह का सपना
  • बगैर गांधी परिवार नहीं पार होगी कांग्रेस की नैय्या
  • कर्नाटक और गोवा के बाद अब हरियाणा में टूटेगी कांग्रेस


हालिया संपन्न लोकसभा चुनाव में कड़ी मेहनत के बावजूद अपेक्षित नतीजे न मिलने से खिन्न कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का इस्तीफा तेजी से भारतीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता खो रही पार्टी को और गहरे कुंए में डाल चुका है। अभी पार्टी इन चुनावों में मिली करारी शिकस्त से उबरी भी नहीं थी कि कर्नाटक में पार्टी की गठबंधन सरकार गिरने की कगार पर आ पहुंची है। कांग्रेस विधान दल के ग्यारह विधायक सदन की सदस्यता त्याग अपनी ही सरकार को गिराने के भाजपाई खेल का हिस्सा बन चुके हैं। राज्य इकाई इस समय जबरन विधायकों को एकजुट रखने का प्रयास करती नजर आ रही है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस आलाकमान राज्य में कुमार स्वामी संग चल रही गठबंधन सरकार को ‘ऑपरेशन कमल’ के जरिए गिराने के खेल से न वाकिफ रहा हो, समस्या कांग्रेस के वे नेता हैं जो पूरी तरह भ्रष्ट निष्क्रिय और जनाधारविहीन होने के बावजूद दिल्ली दरबार की वफादारी का स्वांग रच जमीनी कार्यकर्ताओं को पार्टी से लगातार दूर करते आ रहे हैं। राहुल गांधी तक इन पुराने कांग्रेसियों के षड्यंत्र का शिकार हैं। न चाहते हुए भी उन्होंने कांग्रेस वर्किंग कमेटी से लेकर ज्यादा राज्य ईकाइयों में इन्हीं थके-हारे नेताओं को प्रमुखता दी, नतीजा कांग्रेस का गर्त में जाना है। गोवा से पार्टी को कर्नाटक के बाद दूसरा झटका लगा है। पंद्रह में से दस विधायक भाजपा संग जा मिले हैं। इसके बाद बारी मध्य प्रदेश, फिर राजस्थान की बारी तय है। पंजाब में जरूर स्थिति थोड़ी बेहतर की जा सकती है जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरकार के साथ-साथ पार्टी पर भी पकड़ मजबूत रखी है। हरियाणा से भी जल्द ही पार्टी नेतृत्व को बुरी खबर के लिए तैयार रहना होगा। पिछले छह बरस से एक पूरी तरह निष्क्रिय नेता को मात्र इसलिए प्रदेश अध्यक्ष यदि बनाए रखा जाता है कि वह दस जनपथ का ज्यादा विश्वास पात्र है तो मजबूत जनाधार वाले भूपिंदर सिंह हुड्डा के पास विधानसभा चुनाव से पूर्व नया क्षेत्रीय दल का गठन ही एकमात्र विकल्प बचता है। राहुल गांधी अपने पिता की तरह एक ईमानदार सोच वाले नेता जरूर हैं लेकिन उनमें कड़े निर्णय लेने की क्षमता नजर नहीं आ रही। यही कारण है कि लोकसभा चुनाव की तैयारियों में भाजपा के बरक्स कांग्रेस सोती रही। करारी पराजय के बावजूद यह कुंभकर्णी नींद अभी तक टूटी नहीं हैं। जिन राज्यों में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, भाजपा बूथ लेवल तक एजेंट नियुक्त कर चुकी है तो दूसरी तरफ कांग्रेस चुनावी टीम तक को तय नहीं कर पा रही है। महाराष्ट्र में शरद पवार इंतजार कर रहे हैं कि कब कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिले ताकि गठबंधन पर बात हो सके। हरियाणा में इतनी रार मची है कि कौन नेता कब भाजपा का दामन थाम ले इसका इंतजार मानो कांग्रेस नेतृत्व कर रहा है। हालात इतने खराब हैं कि जिस चुनाव प्रबंधन कमेटी की घोषणा प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने की उसे राज्य प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने सार्वजनिक तौर पर खारिज कर डाला। उत्तर प्रदेश में पार्टी का नाम तक लेने वाला कोई बचा नहीं है। बड़े जोश-खरोश के साथ मैदान में उतरी प्रियंका गांधी अब मात्र ट्वीट के सहारे पार्टी को पुनर्जीवित करने तक सीमित हैं।

राजस्थान में गहलोत बनाम पायलट का युद्ध पूरी सरकार को लकवाग्रस्त कर चुका है। केंद्रीय नेतृत्व के कमजोर हो जाने के चलते राज्य सरकार के मंत्री अपनी ही सरकार के खिलाफ धरने में बैठ जाने का दुस्साहस करते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस के खलनायक भले ही कांग्रेस नेतृत्व भाजपा के धन बल और केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, ईवीएम में धांधली और हिंदू वोट की गोलबंदी की बात लाख कहे, सच है कि पार्टी में जमीनी और समर्पित नेताओं का टोटा हो चला है। गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मोतीलाल बोरा, मुकुल वासनिक आदि कांग्रेस वर्किंग कमेटी के वे नेता हैं जो नई पौध को आगे आने नहीं देना चाहते। कांग्रेस अध्यक्ष के आस-पास भी ऐसे सलाहकारों का जमावड़ा है जिन्हें न तो राजनीति की समझ है न ही वे भारतीय राजनीति के धर्म और जाति समीकरण को समझते हैं। राहुल और प्रियंका गांधी तक पहुंचने के लिए आम कार्यकर्ता तो क्या बड़े नेताओं तक को इन्हीं के आगे गुहार लगानी पड़ती है। प्रियंका गांधी का कुछ अर्सा पहले तक कामकाज संभाल रहे सेवानिवृत्त अधिकारी धीरज श्रीवास्तव प्रियंका गांधी और कांग्रेस कार्यकर्ता के बीच दीवार बन खड़े थे। ऐसे ही राहुल गांधी के चारों तरफ बिखड़े पड़े हैं।

कुल मिलकार कांग्रेस तेजी से सिकुड़ रही है। इसका सिकुड़ना हाल-फिलहाल तब तक जारी रहेगा जब तक दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में बैठे रीढ़विहीन, जनाधारविहीन नेताओं को राहुल गांधी बाहर का रास्ता नहीं दिखा देते। हालांकि ऐसा होता नजर आ नहीं रहा। कहा जा सकता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लक्ष्य की पूर्ति को साधने में स्वयं कांग्रेस जुट चुकी है।

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