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बोल कि लब आजाद हैं तेरे ….

पीरियड्स लीव को लेकर एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। इसमें मांग की गई है कि छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को पीरियड के समय छुट्टी दी जाए। उन्होंने लंदन की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा है कि 4-5 दिनों में महिलाओं को काफी दर्द होता है। कुछ को हार्ट अटैक के बराबर का दर्द होता है। इस दर्द के चलते ऑफिस जाने वाली या दूसरी कामकाजी महिलाओं के काम की क्षमता भी प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट में कहा गया है कि कई कंपनियां पेड पीरियड लीव देती हैं। कई राज्य भी माहवारी छुट्टी देते हैं लेकिन इस पर स्पष्ट निर्देश होने चाहिए

‘पी रियड्स… के मुद्दे पर यह क्या बात करेगी, नहीं इस पर यह कुछ नहीं कहेंगी।’ यह शब्द एक पति के हैं जो महिलाओं से जुड़े मुद्दे पर उसे न बोलने का आदेश दे रहा है। अक्सर ऐसी बातें कहकर पुरुष सत्तात्मक समाज स्त्री की अभिव्यक्ति पर अपने आदेशों की टोकरी का भार दे खुद आगे बढ़ जाता है और पीछे रह जाती हैं महिलाएं। हम चाहे चीख- चीखकर कितना ही कह लें कि समाज बड़ी तेजी से बदलाव की ओर बढ़ रहा है। समाज बदलते दौर के साथ महिलाओं के प्रति काफी संवेदनशील हो रहा है। फिर भी कहीं न कहीं हम इस बात को नकार नहीं सकते कि अभी भी समाज का एक हिस्सा महिला संबंधी मुद्दों पर बातचीत को मितव्ययी घोषित करने की चाह रखता है। हरियाणा में ‘लाडो पंचायतों’ के माध्यम से माहवारी में महिलाओं को छुट्टी देने की बात हो रही है। पर सड़कों पर महिलाओं के बीच इसे लेकर चुप्पी देखने को मिल रही है। ‘दि संडे पोस्ट’ की टीम जब खुद इस बात को जमीनी स्तर पर देखने निकल पड़ी तो सच स्पष्ट सुनाई-दिखाई देने लगा।

हम सभी जानते हैं कि महिलाओं को पीरियड्स आना स्वाभाविक प्रक्रिया का एक हिस्सा है, बावजूद इसके आज भी पीरियड्स को लेकर खामोशी खत्म नहीं हुई है। जबकि होना यह चाहिए कि इसे लेकर जागरूकता फैले क्योंकि यह मुद्दा उनके स्वास्थ्य से जुड़ा है। बावजूद इसके आज भी देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खुलकर इस विषय में बात करने से कतराते नजर आए। जो बताता है कि पीरियड्स को लेकर समाज की सोच में कितना बदलाव हुआ है।

क्या पीरियड्स पर चर्चा गलत है? महिला स्वास्थ्य से जुड़े इस विषय पर चर्चा से शर्म कैसी? शायद इसलिए कि शरीर की एक स्वाभाविक स्थिति को हमने टैबू बना दिया है। कोई उस पर बात करना नहीं चाहता। हमारे समाज में यह इस कदर हावी है कि आप घर में, चर्चाओं में मासिक धर्म यानी पीरियड का जिक्र होते कभी नहीं सुनेंगे। यह तो कुछ नहीं है हाल यह है कि टीवी पर विज्ञापन आता है तो लोग चैनल बदल देते हैं। घर तो घर हैं। लेकिन जब हमारी टीम हरियाणा के गांवों की सड़कों पर इस मुद्दे पर महिलाओं के बीच बात करने पहुंची तो देखा कि कोई इस पर बात करने में सहज नहीं है। इसकी वजह हमारी सोच है। वक्त बदल चुका है लेकिन हम पुराने ढर्रे पर ही चले जा रहे हैं। हालांकि अब इसकी चर्चा देश के सुप्रीम कोर्ट में हो रही है।

माहवारी के समय महिलाओं को छुट्टी देने की मांग करते हुए देश की सबसे बड़ी अदालत में एक जनहित याचिका दायर की गई है। इस विषय पर जब हमारी टीम ने हरियाणा के गुरुग्राम जिले के चक्करपुर गांव में जाकर महिलाओं से उनकी राय जानी तो अधिकांश महिलाओं ने इस विषय पर टिप्पणी करने से ही इनकार कर दिया। कुछ महिलाएं बोलना चाह भी रही थीं लेकिन उनके पुरुष परिजनों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। पास ही में एक प्राइमरी स्कूल था, हमें लगा शिक्षिकाओं से पूछा जाएं। मन में यह भी था ये तो शिक्षित भी हैं इनकार नहीं करेंगी लेकिन ताज्जुब की बात है कि बच्चों को शिक्षित कर उसे हर विषय पर बेबाक बोलना सिखाने वाली टीचर ने भी हमें इस पर कुछ भी राय देने से स्पष्ट इकार कर दिया। हम निराश जरूर हुए लेकिन फिर एक उसी उत्साह के साथ एक और प्राइमरी स्कूल पहुंचे, जो वहां कुछ ही दूरी पर था हमने वहां की कुछ शिक्षिकाओं से बातचीत की। उनका कहना था कि अगर किसी महिला को पीरियड्स में परेशानी होती है तो सरकार क्यों छुट्टी देगी। आपको दिक्कत है तो आप छुट्टी ले सकते हो। जैसे मातृत्व अवकाश सरकारी कंपनियों में मिलता है और निजी दफ्तरों में आपको खुद लेना पड़ता है। इस विषय को बेहद हल्के रूप में लेते हुए उन्होंने हमें अपनी नौकरी और प्रिंसिपल का हवाला देते हुए नाम न लिखने का आग्रह किया जिससे पता चलता है कि लोग बात तो करना चाहते हैं पर साथ ही खुद का बचाव भी चाहते हैं।

एक महिला का कहना था कि ‘कई पुरुष पीरियड्स लीव की अवधारणा का विरोध करते हैं, वो इसे भेदभावपूर्ण कहते हैं। पीरियड लीव पॉलिसी के बारे में बोलते समय वे कहते हैं कि कैसे महिलाएं काम से बचने के लिए पीरियड्स लीव का दुरुपयोग कर सकती हैं। इसलिए ऐसे पुरुषों को पीरियड्स के दर्द के बारे में उनकी बनी धारणा के साथ छोड़ देना बेहतर है। इनके लिए तो मैं यह कहूंगी कि पीरियड पर ‘नो वेजाइना, नो ओपिनियन’ पॉलिसी से उनकी सेक्सिस्ट टिप्पणियों को खारिज किया जाए और पीरियड्स लीव की मांग को मानना चाहिए।’ खरीदारी कर रही सुमैया इस विषय पर कहती हैं कि ‘जरूर पीरियड्स लीव तो मिलनी चाहिए। यह अनिवार्य होनी चाहिए क्योंकि हम सब जानते हैं कि पीरियड्स में महिलाओं के लिए पहला दिन सबसे मुश्किल होता है तो कम से कम महिलाओं को पहले दिन तो पीरियड्स के दौरान एक छुट्टी मिलनी अनिवार्य होनी चाहिए। अगर लीव मिल जाए तो अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करने के लिए यह बेहद राहत भरा होगा। सभी कॉरपोरेट ऑफिस को तो जरूर, लीव देनी ही चाहिए। लोग ही नहीं महिलाएं भी इस मुद्दे पर कम बोलती हैं क्योंकि लोग समझते हैं इस पर बात न हो लेकिन इस पर खुलकर बात होना जरूरी है।’

किसी कंपनी, फैक्ट्री में काम कर रही महिलाओं को पीरियड लीव मिलने को लेकर एक महिला ने कहा कि पीरियड के पहले दिन महिलाओं को काफी परेशानी होती है। इसलिए महिलाओं को एक-दो दिन का अवकाश तो जरुर दिया जाना चाहिए। उन्हें कम से कम एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए। पीरियड्स को लेकर लोगों को ओपन माइंडेड होने की जरूरत है। क्योंकि यह नॉर्मल है, संभवतः इसीलिए आजकल महिलाएं बच्चों के माध्यम से भी सेनेटरी पैड मंगा लेती हैं। उन्होंने फैक्ट्री में काम और मजदूरी करने वाली महिलाओं को पीरियड लीव दिए जाने को लेकर कहा कि इस तरह की महिलाओं को दुगनी समस्यों का सामना करना पड़ता है। उनकी आजीविका के साधन पहले से ही कम होते हैं ऐसे में जब वे मजबूरन पीरियड्स लीव लेती है तो उनकी सैलरी काट ली जाती हैं। इसके अलावा ज्यादातर ऐसी महिलाओं में पीरियड्स हाइजीन को लेकर कोई जागरुकता नहीं है, वे माहवारी के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं जिससे उन्हें कई तरह के इन्फेक्शन होने का खतरा बना रहता है। इसके अतिरिक्त इन महिला ने अक्षय कुमार की फिल्म पैडमैन का जिक्र करते हुए कहा कि लोगों में पीरियड्स के प्रति जागरुकता लाने के लिए यह फिल्म भी आई। उसके बावजूद लोग इस चीज पर खुल कर बात नहीं करना चाहते, अक्षय कुमार खुद इस पर बात करने के लिए तैयार हैं लेकिन लोग नहीं।

ऐसे ही अपने दो बच्चों के साथ स्कूल बस का इंतजार कर रही मोनीसा नाम की एक महिला ने ‘दि संडे पोस्ट’ से कहा कि ‘पीरियड्स लीव तो मिलनी ही चाहिए। स्वास्थ्य मुद्दे को ध्यान में रखते हुए देखा जाए तो महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर कोई भी जागरूक नहीं है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज के लिए औरतों को कई तरह के सैक्रिफाइस करने पड़ते हैं जिसमें सबसे बड़ा सैक्रिफाइस अपने परिवार को छोड़ना है। इसके अलावा अगर महिला वर्किंग है तो उसे घर और बाहर के काम समेत बच्चों को देखना पड़ता है। हालांकि कुछ ऐसे जेंट्स भी हैं जो महिलाओं की मदद करते हैं। लेकिन उनकी संख्या कम है और वे भी उनके मूड पर डिपेंड करता है। लेकिन महिलाओं को हमेशा ही काम और परिवार की ओर ध्यान देना होता है। इसके बावजूद औरतों को और उनसे जुड़े स्वास्थ्य मुद्दों को नजरअंदाज किया जाता है।’ मोनीसा के मुताबिक ऐसी कई महिलाएं भी हैं जो वूमेन कार्ड खेलती हैं जिनसे उन्हें सहानुभूति मिलती है। लेकिन ज्यादातर महिलाएं असल जिंदगी में टॉर्चर और डिप्रेशन को झेलती हैं जिससे उनकी लाइफ काफी डिस्टर्बिंग हो जाती है।

महिलाओं को पीरियड्स के दौरान मूड स्विंग, डिप्रेशन जैसी समस्याएं होती हैं यह अवस्था इनके लिए काफी दर्दभरा रहता है। इस दौरान अगर महिला वर्किंग है तो उसे बाहर और घर का काम दोनों ही संभालना होता है। उसे अपना स्वास्थ्य भी देखना होता है। ये समस्याएं महिलाओं के साथ गर्भावस्था में भी रहती है। जिसका असर परिवार और बच्चों पर भी पड़ता है। इस वजह से महिलाओं के न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इसलिए पीरियड्स लीव की मांग जायज है। पीरियड्स जुड़े मुद्दों पर लोग खुल कर बात क्यों नहीं करना चाहते। इस सवाल का जवाब देते हुए मोनीसा का कहना है कि ‘समाज ही ऐसा है इसलिए इससे जुड़े किसी भी मुद्दे पर खुल कर बात नहीं की जाती, इसे शर्म के नजरिये से देखा जाता है।’

गुरुग्राम जिले के चक्करपुर गांव की एक महिला कुसुमलता ने जरूर इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय जाहिर की उनका मानना है कि पहली बात औरत को घर भी देखना है दूसरी बात दोनों कमाएंगे तभी घर चल पायेगा। आज के समय में एक की कमाई से गुजारा होता नहीं है। लेकिन लड़कियों को नौकरी के दौरान अपने शरीर को भी देखना होता है। उनके साथ ऐसा नहीं कि पुरुष जॉब से आता है टांग पर टांग रखकर बैठे हुए हैं और ऑर्डर दे दिया मिल गई चाय। खाना तो लेडीज को ही बनाना है बहुत से पुरुष ऐसे भी होते हैं जो अपनी पत्नियों पर ध्यान देते हैं लेकिन अधिकतर बीवी पर ऑर्डर झाड़ते हैं। जबकि नौकरी दोनों करके आते हैं, थकता तो दोनों का शरीर है। इसमें लेडीज का शरीर ज्यादा थकता है। क्योंकि पीरियड्स के दौरान लड़की के शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है। यदि शादीशुदा है तो उसे और दिक्कत होती है।

मेरे कहने का साफ अर्थ है कि लड़के-लड़की दोनों ही बराबर काम करते हैं इससे नकारा नहीं जा सकता है। लेकिन लड़कियों को पीरियड्स होते हैं उसमें दो दिन ऐसे होते हैं जो बहुत मुश्किल भरे होते हैं। कमर में दर्द, पैरों में दर्द और पेट दर्द। मैं इन सब चीजों को झेल चुकी हूं। इसमें बॉस की डांट सुननी पड़ती है। काम थोड़ा-सा भी गलत हो जाए तो बॉस डांटता है यह नहीं देखता कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है जबकि चेहरे से पता लग जाता है। लेकिन सब चाहते हैं वह सहन कर ले। लड़की सहन करती भी है। उसे इस दौरान डर रहता है मेरे कपड़े गंदे न हो, कई बार पैड चेंज करने के लिए उसे टॉयलेट जाना पड़ता है। इसलिए दो छुट्टी तो मिलनी ही चाहिए। मेरा तो यही मानना है कि ‘सरकार को इस विषय पर सोचते हुए दो दिन की पीरियड्स लीव तो देनी ही चाहिए।’

अब गेंद सुप्रीम कोर्ट में
पीरियड्स लीव को लेकर एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। इसमें मांग की गई है कि फीमेल स्टूडेंट्स और कामकाजी महिलाओं को पीरियड के समय छुट्टी दी जाए। उन्होंने लंदन की एक स्टडी का हवाला देते हुए कहा है कि 4-5 दिनों में महिलाओं को काफी दर्द होता है। कुछ महिलाओं को हार्ट अटैक के बराबर का दर्द होता है। इस दर्द के चलते ऑफिस जाने वाली या दूसरी
कामकाजी महिलाओं के काम की क्षमता भी प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट से कहा गया है कि कई कंपनियां पेड पीरियड लीव देती हैं। कई स्टेट भी माहवारी छुट्टी देते हैं लेकिन इस पर स्पष्ट निर्देश होना चाहिए।
पीआईएल में कहा गया है कि महिलाओं को इस पीरियड में छुट्टी नहीं मिलना समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने कुछ साल पहले वीमेन्स सेक्सुअल रिप्रोडक्टिव एंड मेंस्ट्रूअल राइट्स बिल पेश किया था। इसमें मांग की गई थी कि महिलाओं को फ्री में सेनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। इस जनहित याचिका पर अभी सुनवाई होनी बाकी है।

 

  • साथ में प्रियंका यादव

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