विगत दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के सफल रोड शो के बाद अब समाजवादियों ने भी यूपी में अपनी धमक का अहसास करा दिया है। कांग्रेस और समाजवादियों की यह धमक लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलायेगी? इसका जवाब तो चुनाव परिणाम के साथ ही मिल जायेगा अलबत्ता कांग्रेस के बाद अब समाजवादियों का आन्दोलन सत्ताधारी दल भाजपा के लिए चिंता का सबब बन चुका है। प्रश्न यह भी है कि ये दो बडे़ दल इस तरह के प्रदर्शन को कब तक और किस स्तर तक बरकरार रख पायेंगे? ये देखने वाला होगा। कहना गलत नहीं होगा कि इन दोनों दलों के साथ ही बसपा भी यदि इसी तरह के प्रदर्शन को चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों तक बरकरार रख पाती है तो निश्चित तौर पर भाजपा के लिए इस बार 74 सीटो वाला नारा तो दूर 30 सीटें हासिल करना भी आसान नहीं होगा। ज्ञात हो प्रियंका के रोड शो वाले दिन भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक में प्रमुख मुद्दा प्रियंका की रैली को लेकर ही था। अंदाज लगाया जाना कठिन नहीं होगा कि जब कांग्रेस की महासचिव के रोड शो को लेकर भाजपा बेचैन हो सकती है तो अन्य विपक्षी दलों के महागठबन्धन को लेकर उसमें कितनी बेचैनी होगी। यहां यह बताना जरूरी है कि विगत दिनों सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि महागठबन्धन में कांग्रेस को भी शामिल किया जायेगा। सपा-बसपा में से कौन अपने हिस्से की कितनी सीटें कांग्रेस को देगा? इसका फैसला भी अगले चन्द दिनों में हो जायेगा लेकिन अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यूपी में भाजपा के लिए मुसीबत का सबब बन चुके महागठबन्धन की धार कांग्रेस का संभावित साथ मिलने के बाद और तेज होने वाली है।
गत दिनों सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव को एयरपोर्ट पर रोके जाने के बाद हुए समाजवादी उपद्रव ने यूपी की योगी सरकार को इस बात का अहसास जरूर करा दिया होगा कि आखिर समाजवादी पार्टी के नेता से लेकर कार्यकर्ता और पदाधिकारी तक सिर पर लाल टोपी क्यों धारण करते हैं।
वैसे तो लाॅ एण्ड आर्डर के नाम पर विपक्षी दल के नेताओं को चुनावी तैयारियों के दौरान रोके जाने की यह प्रथा कोई नयी नहीं है। इससे पूर्व अखिलेश सरकार के कार्यकाल में भी तत्कालीन सांसद (गोरखपुर) और अब मौजूदा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी एक धार्मिक कार्यक्रम में लाॅ एण्ड आर्डर के नाम पर जबरन रोका गया था। इस बार मौका योगी के हाथ में था लिहाजा वे कब चूकने वाले थे। बदले का स्वरूप नजर आया। ऐसा लगा जैसे कोई पुरानी पिक्चर पात्रों को बदलकर दोबारा दिखायी जा रही हो लेकिन इस बार की पिक्चर के बाद का नजारा पुरानी पिक्चर जैसा नहीं था। अखिलेश यादव को रोके जाने से सपाईयों का पारा सातवें आसमान पर था, मानों किसी ने उनके प्रिय नेता पर हमला कर दिया हो। राजधानी लखनऊ समेत इलाहाबाद और अन्य जनपदों में सपाईयों का गुस्सा देखते बनता था। हालांकि सरकार ने सख्ती बरतने में कोताही नहीं बरती लेकिन सिर पर लाल टोपी धारण कर सपा कार्यकर्ता किसी सूरत में मानने को तैयार नहीं थे। आन्दोलन में बदायूं सांसद धर्मेन्द्र यादव की शिरकत ने मानो आग में घी जैसा काम किया। पुलिस की लाठी से घायल हुए सांसद के सिर से खून बहता देख सपाइयों का जोश सातवें आसमान पर था। हर कोई अपने सांसद की आंखों के सामने कुर्बानी देने को बेताब था। जहां तक मेरी ढाई दशक की पत्रकारिता का अनुभव है, मैंने सपाईयों के ऐसे आन्दोलन अनेको बार देखे हैं। मैंने सपाइयों को पुलिस की लाठियां खाने के बावजूद अपने स्थान पर डटे हुए देखा हैं। मैने पूर्व सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के उस हल्ला बोल आन्दोलन को भी कवर किया है जिसमें स्वयं मुलायम सिंह यादव पुलिस के समक्ष बेखौफ डटे रहे थे। कहने का तात्पर्य यह है कि योगी सरकार ने शायद सपाइयों को पहचानने में थोड़ी चूक कर दी। यदि उन्हें यह मालूम होता कि उनके निर्णय से सपाईयों में और जोश भर जायेगा तो शायद सरकार ऐसा करने से बचती और लाॅ एण्ड आॅर्डर के नाम पर विपक्षी दल के नेता को रोके जाने से बाज आती। गौरतलब है कि अखिलेश यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के एक नेता के शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भाग लेने प्रयागराज जा रहे थे। इस सम्बन्ध में मुख्यमंत्री का कहना है कि स्थानीय प्रशासन ने आशंका जतायी थी कि यदि अखिलेश यादव प्रयागराज आए तो लाॅ एण्ड आॅर्डर की समस्या आ सकती है, इसी वजह से अखिलेश यादव को जाने से रोका गया।
अब प्रश्न यह उठता है कि क्या एक विपक्षी दल के प्रमुख के आगमन से लाॅ एण्ड आॅर्डर संभाल पाने की हैसियत स्थानीय प्रशासन में नहीं थी? यदि ऐसा है तो मुख्यमंत्री को चाहिए कि स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों को नाकारा मानते हुए उन्हें उनके पद से तत्काल बर्खास्त कर दिया जाए और उनके स्थान पर किसी ऐसे योग्य अधिकारी को बिठाना चाहिए जो ऐसे छोटे-मोटे आन्दोलन को अपने ही स्तर से काबू करने की क्षमता रखता हो।
फिलहाल जानते सभी हैं कि ऐसा नहीं है, यह कृत्य मात्र राजनीतिक कारणों से है। सरकार नहीं चाहती कि विपक्षी दल ऐन चुनाव तैयारियों के वक्त किसी प्रकार का समर्थन हासिल कर सके। बस सरकार की यही चूक उसके लिए आत्मघाती सिद्ध होती नजर आ रही है। अखिलेश यादव को रोके जाने के बाद से पूरे प्रदेश में न सिर्फ सपाईयों के हौसले बुलन्द हैं बल्कि सपाई इसी तरह के और मौकों की तलाश में हैं ताकि उन्हें खुलकर अपनी धमक का अहसास कराने का मौका मिल सके।
समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं की मानें तो इस घटना के बाद से सपाइयों के हौसले तो बुलन्द हैं ही साथ ही इसी तरह के अन्य कार्यक्रम भी तैयार किए जा चुके हैं। आने वाले कुछ दिनों में यदि इस तरह के आन्दोलन होते हैं तो किसी प्रकार का आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
1 Comment
  1. SammyHog 6 days ago
    Reply

    Read our in-depth iPhone XS Max review
    Read our hands-on iPhone XR review
    link
    Read our hands-on Apple Watch 4 review
    iPhone XS price and release date
    iPhone XS

Leave a Comment

Your email address will not be published.

You may also like