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क्यों भीड़ ने ली इंस्पेक्टर की जान

गाय के प्रति रक्षा की प्रायोजित भावना ने बुलंदशहर में इंस्पेक्टर समेत की हत्या का सबब बन गई। जिस इंस्पेक्टर को कानून की रक्षा करनी थी, उपद्रवियों को नियंत्रित करना था। वह खुद उपद्रवियों का शिकार बन गया। उसे जान से हाथ धोना पड़ा। मौजूदा मोदी शासन में जारी गोरक्षा के बाबत जारी हिंसक घटनाओं की यह नवीनतम कड़ी है।
बुलंदशहर के जिलाधिकारी के मुताबिक तीन दिसंबर की सुबह 11 बजे पुलिस को चिंगावटी गांव में गोकशी की सूचना मिली। पुलिस और एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट ने तुरंत मौके पर जाकर कार्रवाई शुरू कर दी। इसी दौरान कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया। इस हमले में स्याना थाने के एसएचओ सुबोध कुमार की मौत हो गई।
इस घटना के बारे में कई स्रोत अपने-अपने ढंग से तथ्य दे रहे हंै। कहा जा रहा है कि इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की मौत गोली लगने से हुई। यह भी कहा जा रहा है कि हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ता गोहत्या के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने उग्रता का परिचय देते हुए, सड़क जाम कर दिया। पुलिस ने लाठीचार्ज किया। लेकिन भीड़ ने भगाने के बजाय पुलिस दल पर ही हमला बोल दिया। इस झड़प में स्थानीय युवक की मौत भी हुई, जिसका नाम सुमित बताया जा रहा है। साथ ही इस हिंसा ने एक अन्य पुलिसकर्मी भी घायल हुआ जिसकी हालत स्थिर बनी हुई है।
फिलहाल बुलंदशहर में भारी संख्या में पुलिस बल और अर्द्धसैनिक बलों की तैनाती कर दी गई है। वहां शहर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कृष्णा बहादूर सिंह के मुताबिक स्थिति पर मगर रखी जा रही है। असामाजिक तत्वों की पहचान की जा रही है और किसी भी स्थिति को कानून-व्यवस्था से खिलावाड़ नहीं करने दिया जाएगा।
हमले में मारे गए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार पिछले दिनों माॅल बिल्चिंग का शिकार अखलाक की हत्या की जांच भी कर रहे थे। बुलंदशहर की इस घटना को हिंदू-मुस्लिम राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है।  मोदी शासन में जिस तरह से हिन्दू कट्टरपंथी ताकतों को मनोबल बढ़ा है। इस बढ़ते मनोबल ने समाज को हिंसक बनाने में खतरनाक भूमिका निभाया है। जानकारों की आशंका है कि आगामी लोकसभा चुनाव तक गोरक्षा के बहाने हिंसक घटनाओं के परवान चढ़ने की पूरी उम्मीद है।

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