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‘उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड’ में भ्रष्टाचार की कहानियों का संग्रह है। सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों की संख्या में शिकायतों के आधार पर जांच में दोषी पाए गए अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाइयां भी की जा चुकी हैं। इसके बावजूद निगम में भ्रष्टाचार अनवरत बरकरार है। निगम में भ्रष्ट अधिकारियों के हौसलों का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि पिछले साढे़ तीन वर्ष के दौरान साढे़ सात सौ से अधिक अधिकारियों के खिलाफ सरकार की गाज गिर चुकी है। साढे़ सात सौ में से ऊर्जा विभाग के ही 169 अधिकारियों के खिलाफ की गयी कार्रवाई यह बताने के लिए काफी है कि ये विभाग आकंठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है।

‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ नीति के आधार पर साढे़ तीन वर्ष के दौरान 775 भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही किए जाने के दावे किए जा रहे हैं। ये आंकड़ा निश्चित रूप से मौजूदा योगी सरकार की उपलब्धियों में से एक माना जा सकता है। इसके विपरीत सच यह भी है कि हजारों नहीं अपितु लाखों की संख्या में भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों की तादाद से सूबे की जनता के साथ ही सरकारी कर्मचारी और सरकारी योजनाएं तक प्रभावित हैं। मुख्यमंत्री की सख्त हिदायत के बावजूद परियोजनाओं के लिए राजकोष से निकले धन पर सरकारी डकैत अभी भी मालामाल हो रहे हैं। कई तो ऐसे हैं जिनके खिलाफ पुख्ता सुबूतों के आधार पर जांचोपरांत कार्यवाही की संस्तुति भी की जा चुकी है इसके बावजूद पाॅवरफुल भ्रष्ट अधिकारी साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाकर बचे हुए हैं। ऐसे ही एक अधिकारी हैं उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के अधीक्षण अभियन्ता सुरेश चन्द्र बुनकर। श्री बुनकर के खिलाफ निगम के प्रबन्ध निदेशक ने कार्यवाही की संस्तुति की है लेकिन ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ की सरकार में भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का सिलसिला अभी भी बना हुआ है।

सत्ता से करीब का सम्बन्ध रखने वाले कुछ कथित भ्रष्ट अधिकारी अपने आला अधिकारियों पर भारी पड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि आला अधिकारियों के आदेशों को वे रद्दी के टुकड़े के अतिरिक्त कुछ नहीं समझते। ऐसा तब है जब मौजूदा सरकार ने ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ की व्यवस्था लागू कर रखी है। सख्त आदेश हैं कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करते वक्त किसी प्रकार की लापरवाही न बरती जाए। ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ की व्यवस्था लागू करते वक्त मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि यदि किसी अधिकारी ने भ्रष्ट अधिकारी अथवा कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने में हीला-हवाली की तो वह अधिकारी भी कार्रवाई की जद में आयेगा। सरकार की मंशा और व्यवस्था पर तो उंगली नहीं उठायी जा सकती अलबत्ता सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाले भ्रष्ट अधिकारी कार्रवाई की कमान संभालने वाले अधिकारियों पर भारी पड़ रहे हैं। परिणामस्वरूप मुख्यमंत्री के आदेशों के विपरीत महज कागजी खानापूर्ति से ही काम चलाया जा रहा है जबकि कई अधिकारी ऐसे हैं जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। ऐसे ही एक अधिकारी हैं सुरेश चन्द्र बुनकर। श्री बुनकर तमाम आरोपों को लेकर हुई जांच में प्रथम दृष्टया दोषी पाए जा चुके हैं। जांच कमेटियों ने इनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ विधि सम्मत कार्रवाई किए जाने की संस्तुति भी की है। स्थिति ये है कि श्री बुनकर मौजूदा समय में अधीक्षण अभियन्ता, सम्बद्ध निदेशक (तकनीकी, उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड) के पद पर राजधानी लखनऊ में ही मौजूद हैं। कहना गलत नहीं होगा कि मुख्यालय में तैनाती में बावजूद आरोपी अधिकारी के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की जा रही।


उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक देवराज का एक पत्र अधीक्षण अभियंता (सम्बद्ध निदेशक, तकनीकी) सुरेश चन्द्र बुनकर के कारनामों को उजागर करने के लिए काफी है। श्री बुनकर जल विद्युत उत्पादन खण्ड, माताटीला में भी तैनात रह चुके हैं। इस दौरान इनके खिलाफ तमाम शिकायतें मुख्यालय में उच्च पदस्थ अधिकारियों के साथ ही पूर्ववर्ती सरकार के जिम्मेदार ऊर्जा मंत्री के संज्ञान में भी लायी जाती रहीं। इन्हीं शिकायतों में से एक शिकायत अधिशासी अभियन्ता (जल विद्युत उत्पादन खण्ड, माताटीला) की भी है। अधिशासी अभियन्ता ने श्री बुनकर के खिलाफ भ्रष्टाचार से जुड़ी तमाम शिकायतें (संख्या-02/(14)05ई/09)  एवं उसके साथ ही संलग्न पत्रावलियां (संख्या 2(289)05सी/07(वाल्यूम-1, 5(4)का/2(3), 2(269)05सी/07 एवं 2(31)05द/11) मुख्यालय भेजकर अनुशासनिक कार्रवाई की मांग की थी। भ्रष्टाचार से सम्बन्धित इन पत्रावलियों को श्री बुनकर द्वारा गायब करवा दिया गया। श्री बुनकर के इस खेल में संविदा कर्मी (आशुलिपिक/कम्प्यूटर आपरेटर) बीना बिष्ट की भूमिका खास मानी जा रही है। प्रबंध निदेशक देवराज सिंह के इस पत्र में बीना बिष्ट के बारे में कहा गया है कि उन्हीं के द्वारा पत्रावलियों को हस्तान्तरण के दौरान गायब करवा दिया गया और इसकी जिम्मेदारी प्रबन्ध निदेशक के तत्कालीन निजी सचिव वीरेन्द्र पर डाल दी गयी तकि सुरेश चन्द्र बुनकर की करतूतों पर पर्दा न उठने पाए। प्रबंध निदेश के इस पत्र में स्पष्ट लिखा गया है कि जब सतर्कता इकाई (उत्तर प्रदेश पाॅवर काॅर्पोरेशन लिमिटेड) से जांच करवायी गयी तो पूरा मामला खुलकर सामने आया। जांच में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि पत्रावलियों को गायब करवाने में मुख्य भूमिका सुरेश चन्द्र बुनकर की थी। इन्हीं के आदेश पर संविदा कर्मी श्रीमती बीना बिष्ट ने श्री बुनकर के भ्रष्टाचार से सम्बन्धित पत्रावलियों को गायब कर दिया गया। इन पत्रावलियों का वर्तमान समय तक पता नहीं चल पाया है। कहा जा रहा है कि इन पत्रावलियों के श्री बुनकर के भ्रष्टाचार से सम्बन्धित ठोस सुबूत मौजूद थे।


श्री बुनकर पर आरोप है कि जिन दिनों उनकी तैनाती माताटीला पर थी, वे अक्सर कार्यालय से गायब रहते थे। विभाग के ही अधिकारी के शिकायती पत्र में इस बात का आरोप लगाया गया है कि श्री बुनकर 09 फरवरी 2017 से 07 मार्च 2017 के बीच सिर्फ दो ही दिन कार्यालय में उपस्थित रहे और वह भी बिना किसी पूर्व अनुमति के जबकि माताटीला में उनकी तैनाती के दौरान उनकी उपस्थिति अति महत्वपूर्ण थी। श्री बुनकर के खिलाफ इस शिकायत की जांच भी की गयी। जांच मुख्य अभियंता (परि0 एवं अनु0), उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के स्तर से करवायी गयी। प्रारम्भिक जांच में श्री बुनकर के खिलाफ समस्त आरोपों को सत्य पाया गया था।

उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के प्रबन्ध निदेशक देवराज ने सुरेश चन्द्र बुनकर को सम्बोधित अपने इस पत्र में स्पष्ट लिखा है कि अनियमितताओं के लिए आपको प्रथम दृष्टया दोषी पाया गया है लिहाजा आपके विरूद्ध अनुशासनिक कार्यवाही संस्थित करते हुए (निगम के पत्र संख्या 1436/का0 एवं प्रशा0/जविनिलि/19-19(153)/2019 एवं पत्र संख्या 1206/का0 एवं प्रशा0/जविनिलि/19-19(138)/2017/वाल्यूम-1-11 दिनांक 31 जुलाई 2019) सम्पूर्ण प्रकरण को उत्तर प्रदेश पाॅवर काॅर्पोरेशन लिमिटेड की जांच समिति को सन्दर्भित कर दिया गया है। बताते चलें कि जांच समिति ने अपनी जांच में आरोपों को सत्य पाते हुए बुनकर को आरोप पत्र भी दिया था, साथ ही व्यक्तिगत रूप से सुनवाई के लिए अवसर भी दिया गया था लेकिन श्री बुनकर जांच समिति के समक्ष तय तिथि पर अनुपस्थित रहे। श्री बुनकर की अनुपस्थिति पर जांच समिति ने नियमानुसर जांच सम्पादित करके जांच आख्या उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम को भेज दी। इस जांच आख्या में स्पष्ट लिखा गया कि श्री बुनकर पर लगाए गए समस्त आरोप सिद्ध पाए जाते हैं लिहाजा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

जांच टीम ने जांच के दौरान पाया कि श्री बुनकर तमाम अनियमितताओं के दोषी हैं। निगम के प्रबन्ध निदेशक एम देवराज ने अपने इस पत्र में श्री बुनकर पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि जब कभी अनियमितताओं के सापेक्ष जांच संस्थित की जाती है तो श्री बुनकर के द्वारा पद और प्रभाव का दुरूपयोग करके जांच से सम्बन्धित अभिलेख और पत्रावलियां गायब करवा दी जाती हैं। बताते चलें कि निगम के कुछ कर्मचारी भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि श्री बुनकर ने अपने पद का नाजायज इस्तेमाल करते हुए पत्रावलियां गायब करवायी हैं और उनके इस खेल में कुछ संविदा कर्मियों के साथ ही कुछ अधिकारी भी हैं जो पर्दे के पीछे से श्री बुनकर की मदद करते चले आ रहे हैं।


निगम के प्रबन्ध निदेशक देवराज का पत्र इस बात की भी तस्दीक करता है कि पत्रावलियों को गायब करवाने में बुनकर का हाथ रहता है लेकिन दोष दूसरे कर्मचारियों पर मढ़ दिया जाता है। श्री बुनकर द्वारा जांच अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपने पक्ष में रिपोर्ट तैयार करवाने की शिकायतें भी अक्सर प्रकाश में आती रही हैं। इस बात का खुलासा भी निगम के प्रबन्ध निदेशक ने श्री बुनकर को भेजे गए पत्र में किया है। जब श्री बुनकर अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाते हैं तो वे जांच अधिकारियों पर ही झूठे एवं आधारहीन आरोप लगाकर जांच अधिकारियों की छवि धूमिल करने का प्रयास करने लगते हैं।

प्रबन्ध निदेशक एम देवराज ने श्री बुनकर को भेजे गए पत्र में स्पष्ट लिखा है कि आप पर सिद्ध पाए गए आरोप गम्भीर प्रकृति के हैं। जांच समिति द्वारा की गयी विवेचना एवं निगम स्तर पर किए गए परीक्षण के सम्यक विचारोपरान्त श्री बुनकर के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली-1999 के नियम-3 के तहत कार्रवाई किए जाने की संस्तुति प्रबन्ध निदेशक एम देवराज द्वारा की जा चुकी है। हालांकि श्री देवराज द्वारा श्री बुनकर को आरोप पत्र प्रेषित करते हुए अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का समय भी दिया गया था लेकिन श्री बुनकर ने जांच समिति को ऐसा कोई जवाब नहीं दिया जिससे उनके खिलाफ प्रत्यारोपित आरोपों को निराधार समझा जाए। बताते चलें कि इसी आधार पर श्री बुनकर के खिलाफ कार्यवाही किए जाने के निर्देश भी दिए गए थे।

जुलाई 2020 का यह पत्र इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है कि श्री बुनकर के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर हैं लिहाजा श्री बुनकर के खिलाफ कार्यवाही की प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए थी लेकिन दो माह से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी श्री बुनकर के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गयी। उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम कर्मचारियों के बीच हो रही चर्चा को आधार मानें तो श्री बुनकर ने सत्ताधारी भाजपा नेताओं से सम्पर्क का लाभ उठाया है। हालांकि ‘भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस’ की नीति पर काम करते हुए श्री बुनकर के खिलाफ कार्यवाही हो जानी चाहिए थी लेकिन समाचार लिखे जाने तक श्री बुनकर के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं की गयी।

सख्ती के बाद भी राहत नहीं

एक रिपोर्ट के मुताबिक योगी सरकार के कार्यकाल में अब तक 775 भ्रष्ट और दागी अधिकारियों पर कार्रवाई की जा चुकी है। इतना ही नहीं आरोपों की जद में आए कई अधिकारियों और कर्मचारियों को जबरन रिटायर कर उन्हें सेवा से बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टाॅलरेंस’ के आधार पर जबरन रिटायर किए गए दागी अधिकारियों व कर्मचारियों की संख्या 325 है जबकि 450 भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों का निलंबन और डिमोशन किया जा चुका है। हाल ही में भ्रष्टाचार के आरोप में दो आईपीएस भी सस्पेंड किए जा चुके हैं।

कहना गलत नहीं होगा कि सरकार की सख्ती यह संदेश देने के लिए काफी है कि यूपी में भ्रष्ट अधिकारियों की दाल अब गलने वाली नहीं इसके बावजूद सैकड़ों की संख्या में भ्रष्ट अधिकारियों की फौज सरकार की मंशा पर पानी फेर रही है।
बताते चलें कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ की गयी कार्यवाही में सर्वाधिक संख्या ऊर्जा विभाग की ही है। ऊर्जा विभाग के 169 अधिकारी/कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है जबकि दूसरे नम्बर पर राज्य की सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा संभालने वाला गृह विभाग का नम्बर है। गृह विभाग के 51 अधिकारी/कर्मचारी कार्यवाही की जद में आ चुके हैं।
उपरोक्त के अतिरिक्त परिवहन विभाग के 31, राजस्व विभाग के 36, बेसिक शिक्षा विभाग के 26, पंचायती राज के 25, लोक निर्माण विभाग के 18, श्रम विभाग के 16, संस्थागत वित्त विभाग के 16, कमर्शियल टैक्स के 16,मनोरंजन कर विभाग के 16, ग्राम विकास विभाग के 15 और वन विभाग के 11 अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा चुकी है। ये आंकड़ा सितम्बर माह के शुरूआती दौर का है। इसके अलावा 7 पीपीएस अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार में संलिप्त पाए जाने पर अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई है। सरकार की सख्ती के बाद भी भ्रष्ट अधिकारियों/कर्मचारियों के हौसले बुलन्द हैं।

अधिकारियों अमानवीय चेहरा

ऊर्जा विभाग में उच्च पद पर आसीन अधिकारियों का अमानवीय चेहरा भी विभाग की छवि को धूमिल कर रहा है। उनके इस कृत्य पर अधिकारियों की कार्रवाई नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रही है। मामला उत्तर प्रदेश जल विद्युत निगम लिमिटेड के अधिशासी अभियन्ता रवीन्द्र नाथ सिंह यादव से सम्बन्धित है।
अधिशासी अभियन्ता द्वारा विभाग की छवि को धूमिल करने वाला यह कृत्य मृतक आश्रित कोटे से नौकरी दिए जाने में अनियमितता से सम्बन्धित है। अधिशासी अभियन्ता पर आरोप यहां तक हैं कि उन्होंने मृतक आश्रित कोटे से नौकरी देने के लिए युवक से रिश्वत मांगी। न दिए जाने पर मामले को महीनों लटकाया जाता रहा। जांच में इसकी पुष्टि हो चुकी है। प्रबन्ध निदेशक एम देवराज ने अधिशासी अभियन्ता रवीन्द्र नाथ यादव को दोषी पाते हुए उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली-1999 के नियम -03 के तहत ‘निन्दा प्रविष्टि’ थमायी है।
अधिशासी अभियन्ता रवीन्द्र नाथ सिंह यादव द्वारा मानवीय संवेदनाओं को आहत करने के साथ ही विभाग की छवि को धूमिल करने सम्बन्धी मामला कुछ इस तरह से है। जल विद्युत उत्पादन खण्ड, माताटीला (ललितपुर) में प्यारेलाल नाम का एक कर्मचारी बेलदार के पद पर कार्यरत था। सेवाकाल के दौरान 23 अप्रैल 2018 में उसका निधन हो गया। नियमानुसार प्यारेलाल के बेटे राजेन्द्र कुमार को मृतक आश्रित कोटे से नौकरी दिए जाने सम्बन्धी फाइल तैयार की गयी। फाइल पर अधिशासी अभियन्ता रवीन्द्र नाथ सिंह यादव को कार्रवाई करनी थी लेकिन वे फाइल को अनावश्यक रूप से महीनों लटकाते रहे। आरोप है कि श्री यादव ने राजेन्द्र कुमार से रिश्वत मांगी। गरीबी की रेखा से नीचे का जीवन यापन कर रहे राजेन्द्र ने जब उनकी मांग पूरी करने में असमर्थता जतायी तो उसकी फाइल लटका दी गयी।

विभाग के ही एक अधिकारी ने मामले की जानकारी प्रबन्ध निदेशक एम देवराज तक पहुंचायी। मामला संज्ञान में आने के बाद जब फटकार लगी तो अधिशासी अभियन्ता ने जिस काम को आठ महीने से भी अधिक समय तक लटका रखा था वह काम चंद दिनों में पूरा हो गया। चूंकि मामला मानवीय संवेदनाओं के साथ ही निगम की छवि से सम्बन्धित था लिहाजा प्रबन्ध निदेशक एम देवराज ने अधिशासी अभियन्ता रवीन्द्र नाथ सिंह यादव के खिलाफ नियमों के तहत कार्रवाई करते हुए ‘निन्दा प्रविष्टि’ थमा दी।

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