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धांधली के बावजूद जारी हो गए 14 करोड़

लोकसभा चुनाव-2019 में महज तीन माह का समय शेष है और चुनाव आयोग एक माह के भीतर अधिसूचना कभी भी जारी कर सकता है। स्पष्ट है कि अधिसूचना के जारी होते सरकार की तरफ से किसी प्रकार की लाभकारी योजनाओं की न तो घोषणा की जा सकती है और न ही किसी प्रकार का बजट इस्तेमाल में लाया जा सकता है। ऐसे समय में सर्वाधिक फायदा उसी पार्टी को मिलता है जो सत्ता में रहती है। अधिसूचना जारी होने की जानकारी उसके पास पहले से होती है और वह यह भी जानती है कि चुनाव जीतने के लिए उसे किस प्रकार का चारा कब और कैसे फेंकना चाहिए।
भाजपा को केन्द्रीय सत्ता में दोबारा वापसी के लिए अब देश के विकास और राम मन्दिर निर्माण जैसे वायदों को भूलकर ऐसा दांव खेलना होगा जिससे उसे सीधा फायदा मिले। शायद भाजपा इसके लिए तैयार भी है, यही वजह है कि ऐन चुनाव से पूर्व यूपी सरकार ने अल्पसंख्यक वर्ग, दलित व पिछड़े वर्ग को ध्यान में रखते हुए कई योजनाओं को अधिसूचना जारी होने से पूर्व मूर्त रूप देने का मन बना लिया है। विगत दिनों कानपुर की शहरी जनता के लिए खासतौर से अल्पसंख्यक बाहुल्य क्षेत्रों और नगरीय मलिन बस्तियों में ‘आसरा आवास योजना’ के तहत बनने वाले 844 आवासों के सापेक्ष पहली परियोजना की दूसरी किश्त (चैदह करोड़ सोलह लाख बासठ हजार तीन सौ मात्र) स्वीकृत कर दी गयी है। ज्ञात हो यह किश्त पिछले कई महीनों से अटकाकर रखी गयी थी, वजह यह थी कि पहली किश्त को बाटे जाने और आवास योजना के लाभार्थियों के चयन में धांधली को लेकर जांच का स्वांग चल रहा था। कितने लाभार्थी फर्जी पाए गए? जांच का क्या हश्र हुआ? जांच में किसे दोषी पाया गया? क्या कार्रवाई हुई? इसकी जानकारी किसी अधिकारी के पास नहीं फिर भी दूसरी किश्त स्वीकृत कर दी गयी। स्पष्ट है कि चुनाव से पूर्व सरकार कोई कोर-कसर नहीं रखना चाहती जिससे भाजपा की वापसी में व्यवधान उत्पन्न हो। खासतौर से अल्पसंख्यक और दलित-पिछड़े इसलिए क्योंकि यही वह वग है जो चुनाव के दौरान सर्वाधिक संख्या में मतदान में हिस्सा लेता है।
लोकसभा चुनाव तैयारियों के ऐन वक्त पर अल्पसंख्यकों और दलित-पिछड़ों को खुश करने की गरज से सरकारी खजाने से 14 करोड़ से भी ज्यादा की रकम स्वीकृत तो कर दी गयी है लेकिन इससे पूर्व आवास योजनाओं में धांधली को लेकर चल रही जांचों का कोई पुरसाहाल नहीं। बताते चलें के ‘आसरा आवास योजना’ पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल 2014 में शुरु की गयी थी। शुरुआती दौर में ही यह योजना लूट-खसोट का साधन मात्र बन गयी थी। तभी से कई योजनाओं में भ्रष्टाचार की जांच को लेकर एक-दूसरे पर उंगली उठायी जा रही थी।
राज्य की आवास योजनाओं में भ्रष्टाचार से सम्बन्धित एक मामले का खुलासा जुलाई 2018 में भी हो चुका है। डूडा-सूडा के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत ने ऐसा संजाल बिछाया कि करोड़ों की योजनाओं का अधिकतर धन बंदरबांट में ही चला गया।
नियमानुसार इस योजना का लाभ शहरी गरीब ही उठा सकते हैं लेकिन जिन्हें लाभार्थियों का चयन करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी उन्होंने अपात्रों को लाभ देकर अपना मकसद हल कर लिया। अपात्रों को सरकारी लाभ दिए जाने का मामला कानपुर की बिल्हौर नगर परिषद में सामने आ चुका है। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) में धांधली का आरोप खुद चेयरमैन पर लगा था। शादाब खान नाम का शख्स बिल्हौर नगर पालिका परिषद् का चेयरमैन है। आरोप है कि उसने पात्रों को आवास का पैसा ना दिलवाकर अपात्रों को दे दिया। बताते चलें कि नगर पालिका में बैठक के दौरान पार्षदों ने चेयरमैन पर यह आरोप लगाया था। पार्षदों ने चेयरमैन पर पैसा दिलवाने के नाम पर घूस मांगने का भी आरोप लगाया था। ज्ञात हो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ग्रामीण पात्रों को ढाई  लाख रुपया दिया जाता है। पार्षदों की शिकायत पर एसडीएम ने मामले को संज्ञान में लेते हुए जांच बिठा दी थी। एसडीएम ने यह भरोसा दिलाया था कि दोषी अधिकारियो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी लेकिन छह माह से अधिक समय बीत जाने बावजूद न तो जांच पूरी हो सकी है और न ही किसी दोषी अधिकारी के खिलाफ कार्यवाही।
सितम्बर 2018 में भी ‘पीएम आवास योजना’ में धांधली की शिकायत पर कार्रवाई का झुंझुना थमाया जा चुका है। यह आरोप आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता ने लगाया था। आरोप था कि प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के नाम पर डूडा कार्यालय, कानपुर से सम्बद्ध अधिकारी लूट-खसोट में लगे हैं। आरोप था कि  दो साल पहले शुरू हुई इस योजना के तहत हजारों लोगों ने आवास के लिए आवेदन जमा किए लेकिन अधिकतर लोगों को योजना का लाभ नहीं मिला। पात्र व अपात्रों की सूची भी कार्यालय में नहीं है। जांचकर्ता प्राइवेट कंपनी के कर्मचारी रुपये न मिलने पर सूची से पात्रों का नाम गायब कर देते हैं। हद तो तब हो गयी जब रकाबगंज और गिहार बस्ती लकूला आदि में नगर पालिका की जमीन पर कब्जा जमाए लोगों को भी डूडा ने साठगांठ कर पहली किस्त जारी कर दी। जांच के नाम पर अवैध वसूली की जानकारी भी दी गयी थी लेकिन इस मामले में भी किसी अधिकारी को दण्डित नहंी किया जा सका जबकि डीएम ने इस मामले के दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने का आश्वासन दिया था।
इससे पूर्व नवम्बर 2017 में आसरा आवास योजना को लेकर उंगली उठायी जा चुकी है। कानपुर जनपद के अकबरपुर में आसरा योजना के आवास लगभग तीन वर्ष से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी पूरे नहीं हो सके। स्थिति यह है कि अधकचरे आवास अब जर्जर हो चुके हैं जहां जानवरों का डेरा बन गया है। भ्रष्टाचार की भेंट चढे़ इन इलाकों में नगर पंचायत रसूलाबाद, सिकंदरा, झींझक, डेरापुर, अमरौधा शामिल है। यही हाल रूरा रोड किनाने बनने वाले आवासों का भी है। शासन की मंजूरी के बाद दिसंबर 2014 में अकबरपुर नगर पंचायत के सीमा विस्तार वाले गांवों के आवासहीन गरीबों को छत मुहैया कराने के लिए रूरा रोड़ पर आसरा आवास योजना शुरू हुई थी। कार्यदाई संस्था सीएनडीएस-11 इन आवासों का निर्माण करा रही है। योजना में 22 करोड़ की लागत से 1044 आवास बनाए जाने थे। इन आवासों का निर्माण दिसंबर 2016 में ही पूरा हो जाना था लेकिन निर्माण की कछुआ चाल से अभी तक काम अधर में लटका हुआ है।
उपरोक्त उदाहरण तो महज बानगी मात्र हैं जबकि सच्चाई यह है कि पूरे उत्तर प्रदेश में शहरी गरीबों के साथ ही मलिन बस्तियों में निवास करने वालों के लिए बनायी गयी इन योजनाओं का असली लाभ तो वे विभाग उठा रहे हैं जिन्हें कार्य की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।

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