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रिपोर्ट; लोग जीवनयापन के लिए व्यक्तिगत ऋण का ले रहे सहारा

‘आमदनी अठन्नी, खर्चा रूपया ‘ ये कहावत तो हम सभी ने सुनी है लेकिन आज के समय में यह कहावत देश के हालातों के चलते बदलकर ‘आमंदनी जीरो, खर्चे हज़ार’ बराबर फिट बैठती है। देश में जितनी तेजी से  कोरोना का प्रसार फैला उतनी ही तेजी से आर्थिक मंदी और बेरोजगारी भी बडी हैं  | कोरोनाकाल को वक़्त रहते काफी हद तक संभाल लिया गया है। लेकिन देश की गिरती आर्थिक अवस्था को संभालना बेहद मुश्किल हो गया है। इस आर्थिक स्थिति से हालात इतने गंभीर हैं कि लोगों को अपनी रोजमराह  की ज़रूरतों के लिए बैंकों से लोन लेना पड़ रहा है। लोन लेने वालो में  न केवल आम व्यक्ति बल्कि बड़े-बड़े
उद्योगपति भी इसमें शामिल  हैं।

एक रिपोर्ट में आये आंकड़ों के मुताबिक तीन साल के अंतर्गत लोगों का व्यक्तिगत ऋण लेने के आंकड़ों में सालाना दोगुनी वृद्धि देखी गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि यह  ऋण जीवन यापन के साथ -साथ  त्यौहार और जश्न मनाने के लिए लिया गया हैं | रिपोर्ट के मुताबिक निजी बैंको से  इस प्रकार के व्यक्तिगत ऋण लेने वालों की संख्या में भारी उछाल देखा गया हैं|

व्यक्तिगत ऋण लेने का बना चलन
भारत की एक बड़ी आबादी बेरोजगार है और आधी आबादी बढ़ती महंगाई के कारण रोजमर्राह के खर्च  करने में  असमर्थ हैं। जिसके कारण  निजी और ज़रूरी कामों के लिए लोगो को  बैंकों से  ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती गयी | क्योंकि लोगों के पास ज़रूरी खर्चों के लिए पैसे ही नहीं हैं  ऐसे में बचत का होना न मुमकिन है। क्रेडिट ब्यूरो, क्रिफ हाई मार्क की रिपोर्ट में
कहा गया है कि मूल्य के संदर्भ में व्यक्तिगत ऋण का आंकड़ा 2018 की दिसंबर  तिमाही के 75,000 करोड़ रुपये की तुलना में दिसंबर, 2021 की तिमाही में दोगुना होकर 1.47 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक हो गया है।  इस प्रकार के ऋण में  चूक भी अधिक होती है, क्योंकि बैंकों के द्वारा व्यक्तिगत ऋण बिना किसी गारंटी के दिया जाता है। इस ऋण में बैंक ऊंचा ब्याज वसूलते हैं जिससे बैंकों को अधिक लाभ होता है। बैंकों के लाभ और लोगों की बढ़ती मजबूरी के कारण बीते तीन सालों में व्यक्तिगत ऋण में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और गैर-बैंक ऋणदाताओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। जबकि निजी क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी में गिरावट आई है। जब मात्रा के संदर्भ में तुलना की गई, तो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हिस्सेदारी में गिरावट आई। जबकि निजी बैंकों और एनबीएफसी के लिए समान रूप में वृद्धि देखी गई है।


क्या कहते हैं आंकड़े ?

2019 के बाद से ही बाज़ारों में आर्थिक मंदी की दर को बढ़ते हुए देखा गया। और आज  भी यह दर कम होने का नाम नहीं ले रही है। बढ़ती बेरोजगारी से शरू हुई यह गंभीर स्थिति आज मुद्रा स्फीति के विशाल रूप में देखी जा सकती है। भारतीय मुद्रा का कमज़ोर होना दर्शाता है कि 1 डॉलर की कीमत 80 रूपये से भी अधिक हो गई है। भारतीय मुद्रा का कमज़ोर होना भी आर्थिक संकट की एक निशानी है।

बीते वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में दोपहिया ऋण मूल्य के संदर्भ में घटकर 15,281 करोड़ रुपये रह गया, जो वित्त वर्ष 2018-19 की समान अवधि में 16,393 करोड़ रुपये था। वित्त वर्ष 2021-22 की दिसंबर तिमाही में आवास ऋण का आंकड़ा 2018-19 की समान तिमाही से 40 प्रतिशत बढ़कर 1.93 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया। बढ़ती ऋण की संख्या से देश की आर्थिक स्थिति का संकट में होना साफ़ दर्शाता है।

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