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आपकी कमी बहुत महसूस होती है रामनाथ गोयनका जी

 भारत के सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद अखबारों में शुमार इडियन एक्सप्रेस के मालिक और संस्थापक रामनाथ गोयनका का जन्म आज ही के दिन 18 अप्रैल को बिहार के दरभंगा में 1904 को हुआ था। जहां एक तरफ कुछ बड़े मीडिया हाउस और मैन स्ट्रीम मीडिया पर सत्ता के अधीन होने के आरोप झेलने पड़ रहे है वहीं रामनाथ गोयनका सत्ता से बैखोफ होकर उनके खिलाफ लिखते थे। उनके जाने के बाद आज भी पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका नाम पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है। बकायदा उनके नाम पर उभरते पत्रकारों को रामनाथ गोयनका अवार्ड से भी सम्मानित किया जाता है। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने जब देश पर इमरजेंसी को थोपा था, उस समय रामनाथ गोयनका ने सत्ता के आगे झुकने की बजाय सिर उठा कर पूरे मुखर तरीके से सरकार की आलोचना की थी। इमरजेंसी में उन्होंने प्रेस की आजादी के लिए लड़ी लड़ाई को भला कौन भूल सकता है। रामनाथ गोयनका एक सफल पत्रकार होने के साथ-साथ एक अच्छे उद्योगपति भी थे।
किसी भी अखबार को चलाने के लिए सबसे जरुरी होता है विज्ञापन। 1975 से 1977 के बीच लगी इमरजेंसी के समय इडियन एक्सप्रेस के सारे विज्ञापन बंद कर दिए थे। जब अखबार प्रेस में छपने के लिए जाता तो प्रेस की बत्ती तक काट दी जाती थी, ताकि अखबार लोगों तक देरी से पहुंचे। इसी दौरान गोयनका पर अखबार का संपादक बदलने का भी दवाब आने लगा। फिर सेंसरशिप लगवा दी, लेकिन गोयनका पीछे नहीं हटे। बल्कि सेंसर किए गए एडिटोरियल की जगह खाली छोड़ दी। ऐसा पहली बार अखबार की दुनिया में हुआ था। इमरजेंसी के बाद जब मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो उन्होंने कहा था कि हम राजनेताओं की तुलना में रामनाथ गोयनका की लड़ाई हमसे अधिक नाजुक, निर्णायक और महत्वपूर्ण थी।
आज के समय में किसी भी टीवी चैनल या अखबार के संपादक को अपनी आलोचना पंसद नहीं। लेकिन रामनाथ गोयनका इस मामले में भी सबसे आगे थे। वह अपनी आलोचना को भी अखबार के फ्रंट पेज पर जगह देते थे। इमरजेंसी के समय गोयनका लोकसभा के सदस्य थे। इंदिरा गांधी और उनकी सरकार गोयनका को चारों तरफ से घेरने पर लगे हुए थे। संसद में उन पर और बाहर अखबार पर दवाब बनाया जा रहा था। इसके बावजूद वह डटे रहे, चाहते तो अपने अखबार का फायदा उठा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। यहां तक उस समय एक्सप्रेस के संपादक को कहा गया था कि उनके खिलाफ संसद में जो भी आरोप लग रहे है उन अखबार के फ्रंट पेज पर लगाया जाए। एक्सप्रेस के संपादक उस समय मुलगावकर थे जो हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक होते हुए एक मुकदमे की खबर अपने ही अखबार में पहले पेज पर छाप चुके थे। सो उन्होंने इसका बखूबी पालन किया।
गोयनका के बारे में मशहूर था कि वो फिजूलखर्ची नहीं करते थे। पैसे को बिना वजह खराब करना वे पाप समझते थे। गोयनका पर किताब लिखने वाली अनन्या गोयनका बताती हैं, ”एक बार मुंबई के उनके पेंटहाउस में कई मेहमान ठहरे हुए थे। इसलिए मुंबई के दौरे पर गए उनके दोस्त और जनसत्ता के संपादक प्रभाष जोशी ने ठहरने के लिए ओबेरॉय होटल में एक कमरा ले लिया। जैसे ही गोयनका को इसके बारे में पता चला, उन्होंने प्रभाष जोशी से कहा कि वो होटल से तुरंत चेक आउट कर लें। उन्होंने अपने खुद के कमरे में एक फ़ोल्डिंग पलंग डलवाया और उस पर प्रभाष जोशी को सुलवाया। उनकी कंजूसी के और भी किस्से मशहूर हैं।” लेकिन साथ ही वह काफी दरियादिल इंसान भी थे, जब इंडियन एक्सप्रेस की बिल्डिंग बन रही थी तो उन्होंने आदेश दिया कि एक बोरी आलूओं की हर रोज खऱीदी जाए, उसकी पूड़ी सब्जी बनाकर मजदूरों के् बच्चों को बांटी जाए।
इंदिरा गांधी से इतना विरोध होने के बावजूद जब संजय गांधी की मौत हुई थी तो उन्होंने् सिर्फ इंदिरा गांधी को पत्र लिखा, और साथ ही अखबार के मुख्य पृष्ट पर खुद एक लेख लिखा। फोन पर भी इंदिरा गांधी के साथ उन्होंने अपना शोक व्यक्त किया था। गोयनका के साथ कई संपादकों ने काम किया, जिनमें फ्रैंक मोरेस, कुलदीप नैयर, निहाल सिंह नाम शामिल है। लेकिन उनके सबसे फेवरेट संपादको में थे, एस मुलगांवकर। वह उनके अग्रेजी के ज्ञान और उठने बैठने के मुरीद थे। मुलगाँवकर गोयनकाजी के बहुत करीब थे। जब वो मुंबई आते थे तो पेंट हाउस में ठहरा करते थे। वो अकेले शख़्स थे जिनके लिए पेंट हाउस में मछली मंगाई जाती थी।
विवेक गोयनका, द इंडियन एक्सप्रेस अंग्रेजी अखबार के संस्थापक हैं और रामनाथ गोयनका के दत्तक पुत्र हैं। अखबार के अध्यक्ष होने के अलावा वह प्रबंध निदेशक के रूप में भी कार्य करते हैं। इसके अलावा वे यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया के निदेशक के पद पर भी रहे हैं। प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया के निदेशक और ऑडिट ब्यूरो ऑफ़ सर्कुलेशन के काउंसिल सदस्य भी थे। वह समाचार पत्र सोसायटी के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष रहे हैं और विज्ञापन संघ न्यूयॉर्क स्थित भारतीय, विज्ञापन संघ के सदस्य भी रहे हैं। रामनाथ गोयनका पुरस्कार वर्ष 2006 से उन पत्रकारों को दिया जाता है जो मुश्किल हालातों में रहकर उन मुद्दों को उठातें हैं जो कई बार सुर्खियाँ नहीं बन पाते। इस पुरस्कार में शामिल वो खबरें भी होती हैं जिन पर कई बार ध्यान नहीं जाता है जबकि वो जरूरी होती हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रानिक, व्यापार और अर्थशास्त्र, हर श्रेणी के लिए इस पुरस्कार में एक लाख की पुरस्कार राशि दी जाती है।

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