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राज्यसभा में नहीं दिखी विपक्षी एकता

देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में उपसभापति का पद जून माह से खाली था। 9 अगस्त को पद के लिए चुनाव हुआ। सत्ता पक्ष की ओर से जदयू सांसद हरिवंश नारायण सिंह के सामने विपक्ष के उम्मीदवार एवं कांग्रेस सांसद बीके हरिप्रसाद मैदान में थे। हरिवंश को 125 वोट मिले, जबकि हरिप्रसाद के खाते में 105 वोट आए। इसके साथ ही जदयू सांसद हरिवंश राज्यसभा के उपसभापति चुने गए।
पहली बार कोई पत्रकार राज्यसभा के उपसभापति चुने गए हैं।
राज्यसभा सांसद पीजे कुरियन के उच्च सदन से रिटायर होने की वजह से यह पद इस साल जून से ही खाली था। कुरियन केरल से कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद बने थे। अभी तक के इतिहास में 1977 को छोड़ अधिकतर समय सत्ता पक्ष के ही उपसभापति बनते रहे हैं। इस बार 1977 फिर से दोहराने का अनुमान लगाया जा रहा था। पर विपक्ष ऐसा नहीं कर पाया।
सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के कारण विपक्ष के उम्मीदवार का उपसभापति बनने की उम्मीद लगाई जा रही थी। लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी एकता की बात हो रही है। कांग्रेस सहित, एनसीपी के शरद पवार, टीएमसी की ममता बनर्जी और बसपा की मायावती इसके लिए सबसे ज्यादा प्रयासरत हैं।
मगर उपसभापति के चुनाव में विपक्षी एकता नहीं दिखा। कांग्रेस यूपीए से अलग क्षेत्रीय पार्टियों को को अपने साथ नहीं ला पाई। वहीं बीजेपी एनडीए के कुनबे को बचाने के साथ ही दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को भी अपने साथ लाने में कामयाब रही।
बीजेपी को एआईएडीएमके, बीजू जनता दल जैसे दलों ने समर्थन दिया। इसी वजह से सरकार की ओर से उम्मीदवार हरिवंश आसानी से चुनाव जीत गए। अविश्वास प्रस्ताव के बाद एक बार फिर सरकार ने सदन के अंदर विपक्ष को मात दी है।
कांग्रेस के ओर विपक्षी एकता की बात कर रही है। वहीं दूसरी ओर वह समर्थन देने के लिए बैठी आम आदमी पार्टी का वह समर्थन नहीं ले पाई। आम आदमी पार्टी के संसद संजय सिंह ने आरोप लगाया कि हमने कई मौकों पर संसद और सदन के बाहर कांग्रेस का साथ दिया। पर उन्होंने एक बार भी धन्यवाद तक नहीं किया गया। राहुल गांधी यदि हमारे मुख्यमंत्री से बात कर समर्थन मांगते तो हम जरूर देते।
सत्ताधारी एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार हरिवंश जेडीयू से राज्यसभा सदस्य हैं। जेडीयू ने 2014 में उन्हें बिहार से राज्यसभा में भेजा। 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्में हरिवंश जब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा कर रहे थे तभी टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका चयन हो गया। वे साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ में उपसंपादक रहे। लेकिन बाद में कुछ दिनों के लिए बैंक में भी काम किया। फिर पत्रकारिता में वापसी की। वे 1989 तक ‘आनंद बाजार पत्रिका’ की साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ में सहायक संपादक रहे। इसके बाद वो 25 सालों से भी अधिक समय के लिए प्रभात खबर के प्रधान संपादक रह चुके हैं। राज्यसभा में आने से पहले वो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के अतिरिक्त सूचना सलाहकार (1990-91) भी रह चुके हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा में हरिवंश के बारे में कहा, ‘हरिवंश जी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के करीबी थे। चंद्रशेखर के इस्तीफा देने की जानकारी उन्हें पहले से ही थी पर उन्होंने अखबार की लोकप्रियता के लिए इस खबर को लीक नहीं किया।’

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