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राहुल को नेता मानने को राजी नहीं विपक्षी दल

नई दिल्ली। तीन राज्यों के शपथ ग्रहण समारोह के माध्यम से कांग्रेस ने विपक्षी गठबंधन का संदेश देने की कोशिश अवश्य की, लेकिन इन दलों ने कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिए हैं।कांग्रेस ने 25 पार्टियों को राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, कमल नाथ और भूपेश बघेल के शपथ ग्रहण कार्यक्रम के लिए निमंत्रण भेजा, लेकिन तृणमूल कांग्रेस, बसपा एवं सपा जैसी बड़ी पार्टियों ने संकेत दिया है कि तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस बेशक उत्साहित है, लेकिन इसके मायने यह नहीं कि उसे गठबंधन का नेतृत्व करने का अवसर मिल गया।
उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री बसपा सुप्रीमो मायवती और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हुए। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस प्रमुख व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी शपथ ग्रहण समारोह में नहीं पहुंचीं। हालांकि ममता बनर्जी ने पहले ही कह दिया था कि वे पारिवारिक मजबूरियों के चलते शपथ ग्रहण समारोह में शामिल नहीं हो पाएंगी, लेकिन मायावती ने तो कोई कारण भी नहीं बताया। अखिलेश ने भी अपना प्रतिनिधि भेजकर इतिश्री कर ली। राजनीतिक विश्लेषक इसे विपक्षी एकता की कोशिशों में जुटी कांग्रेस के लिए शुभ संकेत नहीं मान रहे हैं।
गौरतलब है कि राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कुछ नेता उम्मीदें करने लगे हैं कि कांग्रेस अध्य़क्ष राहुल गांधी 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर सकते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि अब भी ज्यादातर विपक्षी नेता इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में शपथ ग्रहण समारोह से ठीक पहले चेन्नई में द्रमुक अध्यक्ष एमके स्टालिन ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित कर आग में घी डालने का काम किया है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी में नरेंद्र मोदी को हराने की क्षमता है। हालांकि प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल के नाम की घोषणा का अभी किसी ने खुलकर विरोध तो नहीं किया है, लेकिन सच यह भी है कि विपक्ष के नेता 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए किसी को प्रधानमंत्री का प्रत्याशी बनाए जाने के पक्ष में नहीं हैं।

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