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राहुल की राह में रोड़ा हैं मायावती

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर पर सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ 2019 के लिए गठबंधन बनाने की कवायद जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे ही हर राजनीतिक पार्टी यह जताने की कोशिश में है कि गठबंधन का नेतृत्व वही कर सकती है। प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी जताने में कोई भी पीछे नहीं है।
विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए सबसे पहले प्रयासरत रही कांग्रेस लगातार यह जताने की कोशिश करती रही है कि गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण स्वाभाविक रूप से प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही होंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा उसे शायद ही उतनी सीटें दे जितना कांग्रेस चाहती है। इस संबंध में अखिलेश यादव और मायावती अपनी भावनाओं का इजहार भी कर चुके हैं। कांग्रेस की स्थिति आज ऐसी नहीं कि वह गठबंधन दलों पर सीटों के लिए दबाव बना सके। बहरहाल कांग्रेस ने उम्मीद नहीं छोड़ी है। उसे अभी भी विश्वास है कि गठबंधन में उसकी सीटें सबसे ज्यादा आएंगी।
कांग्रेस राहुल को प्रधानमंत्री तो देखना चाहती है, लेकिन उसकी राह आसान नहीं। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को इसके लिए राजी करने की चुनौती है। अखिलेश यादव यूपी में कांग्रेस की स्थिति को लेकर काफी पहले ही कह चुके हैं कि जब उसके उम्मीदवार बहुत कम वोट ला रहे हैं, तो उन्हें किस आधार पर लोकसभा की ज्यादा सीटें दी जाएं? दूसरी तरफ ममता और माया की महत्वाकांक्षाएं भी प्रधानमंत्री बनने के लिए जोर मार रही है।
ममता के सामने दिक्कत यह है कि उनका जनाधार पश्चिम बंगाल के बाहर नहीं है, लेकिन मायावती के वोट बैंक को नजरअंदाज कर पाना गठबंधन दलों के लिए आसान नहीं होगा। सच तो यह है कि आज की स्थितियों में उनके बिना गठबंधन की सफलता की ज्यादा उम्मीदें नहीं की जा सकती। मायावती के वोट बैंक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के प्रमुख शरद पवार उनसे रिश्ते मधुर करने मंे दिलचस्पी ले रहे हैं। इसी क्रम में हाल में उन्होंने मायावती के खास सिपहसालार सतीश मिश्र से मुलाकात भी की। पवार को महाराष्ट्र में बसपा की भारी जरूरत है। रामदास अठावले की रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) के भाजपा के साथ जाने के बाद से एनसीपी को बसपा की जरूरत कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही है।
मायावती भी अपने वोट बैंक की ताकत को बखूबी समझती हैं। यही वजह है कि वे फूंक-फूंक कर कदम रख रही हैं और अपने पत्ते खोलने में जल्दबाजी भी नहीं दिखा रही है। हाल में उन्होंने संकेत दिया कि वे सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही गठबंधन का हिस्सा बन पाएंगी। बहुत संभव है कि वे आगे यह भी मांग कर सकती हंै कि गठबंधन का नेतृत्व वे ही करें। राष्ट्रीय स्तर पर बसपा के वोट बैंक को देखते हुए कांग्रेस यदि न भी चाहे तो अन्य दल मायावती के दबाव में आ सकते हैं।
राजनीतिक तौर पर विश्लेषण करें तो कांग्रेस खुद को बड़ी पार्टी या बड़ा खिलाड़ी मानते हुए गठबंधन की कवायद बेशक कर रही हो। पार्टी राहुल को प्रधानमंत्री देखना चाहती है, लेकिन मायावती भी इस कोशिश में दिखाई देती हैं। एक तरफ मायावती जहां महाराष्ट्र में शरद पवार के प्रति नरम हुई हैं। वहीं उन्होंने कांग्रेस को खुश रखने के लिए अपने उपाध्यक्ष को पार्टी से बाहर का रास्ता भी दिखा दिया। उपाध्यक्ष ने राहुल के खिलाफ बयानबाजी कर दी थी। मायावती के ये कदम सिर्फ गठबंधन में शामिल होने के लिए नहीं हैं, बल्कि साफ है कि उनकी चाहत गठबंधन का नेतृत्व करने की है।

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