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स्थापित हुई राहुल की लीडरशिप

राहुल गांधी के लिए तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत विशेष रूप से अहम है। भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों के भी निशाने पर रहे राहुल ने इस जीत के साथ ही अपनी नेतृत्व क्षमता पर उठने वाले उन तमाम प्रश्न-चिन्हों पर पूर्ण विराम लगा दिया है जो 2014 के बाद से भाजपा के हाथों एक के बाद एक हार के चलते उठे थे। भाजपा के गढ़ माने जाने वाले छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मिली अप्रत्याशित जीत ने राजनीति में पप्पू समझे जाने वाले राहुल को प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले में ला खड़ा किया है
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व पर लगातार बने हुए संशय को दूर कर पाने का सबसे बड़ा कारक बन सामने आए हैं। इस दृष्टि से ग्यारह दिसंबर का दिन व्यक्तिगत तौर पर राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा में एक अहम पड़ाव है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जीत इसलिए भी खासी महत्वपूर्ण हो जाती है कि ये तीनों ही खांटी हिंदी बेल्ट के वे इलाके हैं जहां भाजपा के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मजबूत पकड़ रही है। इन राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों को 2019 का सेमीफाइनल कह पुकारा जा रहा था। कांग्रेस के शानदार और जानदार प्रदर्शन के बाद अब विपक्षी दलों समेत सभी
भाजपा-संघ विरोधी ताकतों को उम्मीद बंधी है कि अगले आम चुनाव में वे एनडीए गठबंधन को सत्ता से बाहर कर सकते हैं।
राहुल गांधी के लिए तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत विशेष रूप से अहम है। भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों के भी निशाने पर रहे राहुल ने इस जीत के साथ ही अपनी नेतृत्व क्षमता पर उठने वाले उन तमाम प्रश्न-चिन्हों पर पूर्ण विराम लगा दिया है जो 2014 के बाद से भाजपा के हाथों एक के बाद एक हार चलते उठे थे। भाजपा के गढ़ माने जाने वाले छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मिली अप्रत्याशित जीत ने राजनीति में पप्पू समझे जाने वाले राहुल को प्रधानमंत्री मोदी के मुकाबले में ला खड़ा किया है। छत्तीसगढ़ में तो राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार वोट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और अब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के अथक प्रयासों के साथ-साथ राहुल गांधी के चेहरे पर मिले हैं। यहां कांग्रेस को नब्बे में से साठ सीटों पर विजय मिली। राहुल गांधी ने प्रदेशभर में अठारह चुनावी सभाओं और रोड शो किए जिनमें उमड़ी भारी भीड़ से साफ हो गया था कि इस बार जनता सत्ता में परिवर्तन चाह रही है। दस दिनों के भीतर किसानों का कर्जा माफ करने की घोषणा कर राहुल गांधी ने भाजपा को बैकफुट में ला दिया। उनकी इस घोषणा का सीधा असर भाजपा को मिले वोट प्रतिशत से समझा जा सकता है। कांग्रेस को पिछले पंद्रह सालों से पराजित करती आ रही भाजपा को इन चुनावों को कांग्रेस से दस प्रतिशत कम वोट मिले हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि कांग्रेस को राहुल गांधी के नेतृत्व में मिली जीत उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के ठीक एक साल बाद मिली है। हालांकि गुजरात और कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनावों के दौरान ही राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और शैली में भारी बदलाव देखने को मिला था। भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ कहे जाने वाले गुजरात में तो ‘विकास पागल हो गया है’ का नारा इतना असरदार रहा कि स्वयं प्रधानमंत्री मोदी को मैदान में उतर कर पार्टी की लाज बचाने के लिए विवश होना पड़ा। गुजरात चुनावों में पहले चरण के लिए हुए मतदान में कांग्रेस ने बड़ी बढ़त ले ली थी। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने खुद मोर्चा संभाला जिनके चलते दूसरे चरण में भाजपा ने बढ़त ले ली।
मध्य प्रदेश में भी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के टीम वर्क ने मृत पड़ी प्रदेश कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम किया तो इसका श्रेय भी काफी हद तक राहुल को जाता है। अनुभव और युवा के मध्य संतुलन बैठा उन्होंने अपनी परिपक्व राजनीतिक समझ को प्रमाणित करने का काम किया है।
इन तीनों ही राज्यों में भाजपा सरकार होने के चलते चुनावी रैलियों में एक बात खासतौर से देखने को मिली। जहां राहुल गांधी ने अपने भाषणों में आम आदमी, दलित और किसानों के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया, वहीं प्रधानमंत्री मोदी का जोर भविष्य की विकास योजनाओं पर रहा। जाहिर है केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के निराशाजनक प्रदर्शन का बोझ उन पर हावी था। राहुल गांधी ने पिछले एक बरस के दौरान राजनीति का ककहरा बहुत तेजी से सीखा है। इन चुनावों में वे भाजपा के हाथों हिंदुत्व का मुद्दा भी छिनने का प्रयास करते दिखे। उन्होंने लगातार मंदिरों में हाजिरी भरी, स्वयं को जनेऊधारी हिंदू बताने से भी गुरेज नहीं किया। तीनों राज्यों में जीत हासिल करने के बाद प्रेस से मुखातिब हुए कांग्रेस अध्यक्ष ने शालीनता का परिचय देते हुए भाजपा सरकार को जन सरोकारी योजनाओं को जारी रखने की बात कही। राहुल अब 2019 के लिए फ्रंट फुट पर बैटिंग करने की तैयारी में जुट गए, नजर आ रहे हैं। राफेल मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद जिस अंदाज में उन्होंने मोदी सरकार पर प्रहार किए, उससे स्पष्ट है कि वे राफेल खरीद में हुए कथित भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने जा रहे हैं।
बहरहाल, इस जीत के बाद विपक्षी गठबंधन के उन नेताओं के तेवर राहुल गांधी के प्रति मुलायम होंगे जो अभी तक उनके नेतृत्व में 2019 के आम चुनाव में उतरने से हिचकिचा रहे थे। राहुल के बढ़ते प्रभाव का पहला प्रमाण चेन्नई में हुई विपक्षी दलों की रैली के दौरान सामने आया है। द्रमुक अध्यक्ष एमके स्टालिन ने साझे मंच से राहुल को अगला प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट कर कांग्रेस अध्यक्ष के पक्ष में माहौल बनाने का काम शुरू कर दिया है। कुल मिलाकर इन चुनावों में मिली जीत न केवल कांग्रेस, बल्कि समस्त भाजपा विरोधी दलों के लिए संजीवनी का काम करती दिख रही है।

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