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राहुल के लिए आगे की राह आसान नहीं

नई दिल्ली। उत्तर भारत के तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता को लेकर पार्टी में उल्लास का वातावरण है। राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के एक साल बाद ही मिली इस जीत को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त उत्साह है कि अब राहुल के नेतृत्व में पार्टी अपना खोया हुआ जनाधार वापस पा लेगी और वे 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व संभालेंगे। गठबंधन के सत्ता में आने पर राहुल प्रधानमंत्री भी होंगे। कार्यकर्ताओं का उत्साह स्वाभाविक है और यही उत्साह कांग्रेस को मजबूती देगा। लेकिन इसके बावजूद राहुल की राह आसान तो नहीं लगती है। तमाम चुनौतियां उनके सामने हैं।
तीन राज्यों के नतीजों के बाद मध्य प्रदेश में सपा-बसपा ने कांग्रेस के पक्ष में समर्थन तो दिया, लेकिन साथ ही अपनी राय भी जाहिर कर दी। सपा के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव ने दो टूक कहा कि राहुल यूपी में विपक्षी गठबंधन के नेता नहीं होंगे। बसपा सुप्रीमो मायावती तो यूपी में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें देने की बात करती रही हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश जहां से होकर प्रधानमंत्री की गद्दी का रास्ता बनता है वहां कांग्रेस को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए राहुल को सोचना होगा कि वे कौन सी राह पकड़ें। अकेले चलें या गठबंधन के नेताओं को मनाएं, यह चुनौती उनके सामने बनी रहेगी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उन्हें गठबंधन का नेता स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी यही कहती रही है कि गठबंधन में शामिल जिस पार्टी के ज्यादा सांसद चुनकर आएंगे उसी का प्रधानमंत्री होगा। यहां तक कि आम आदमी पार्टी भी कह चुकी है कि जिस राज्य में जो पार्टी मजबूत है वहां गठबंधन में उसी को महत्व मिले।
चुनौती केवल बड़े नेताओं की सहमति या असहमति की नहीं, बल्कि राहुल को जमीनी समीकरणों का जायजा लेकर भी फैसले लेने होंगे। उन्हें देखना होगा कि आखिर तेलंगाना विधान सभा चुनाव में राज्य की जनता ने कांग्रेस-टीडीपी गठबंधन को क्यों नकार दिया। यह भी कि वर्ष 2014 की तुलना में राज्य में कांग्रेस का वोट बेस इस विधान सभा चुनाव में घटा है। राहुल कहीं न कहीं यह समझने में चूक कर गए कि जिन चंद्रबाबू नायडू ने तेलंगाना के निर्माण का विरोध किया था उनके साथ गठबंधन का नुकसान हो सकता है। खुद कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि अगर तेलंगाना में टीडीपी के साथ गठबंधन नहीं किया जाता तो पार्टी की स्थिति ज़्यादा अच्छी रहती। अब देखना है कि 2019 के चुनाव से पहले कांग्रेस टीडीपी के साथ गठबंधन पर फिर से विचार करेगी या नहीं। पार्टी की दुविधा रहेगी कि अगर टीडीपी के साथ गठबंधन तोड़ा गया तो आंध्र में क्या होगा और जारी रखा तो तेलंगाना में समस्या खड़ी हो जाएगी। अन्य राज्यों में भी इसी तरह के जमीनी समीकरणों पर ध्यान रखना होगा।

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