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दिल्ली की हार पर रार, गांधी परिवार के खिलाफ बगावत का बजा बिगुल 

दिल्ली की हार पर रार, गांधी परिवार के खिलाफ बगावत का बजा बिगुल 

दिल्ली में कांग्रेस की हुई करारी हार अब पार्टी में रार का कारण बन चुकी है। पहले से ही कई गुटों में बट चुकी पार्टी अब बगावत की ओर जाती हुई नजर आ रही है। इसका शंखनाद किया है दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के पुत्र पूर्व सांसद संदीप दीक्षित ने। संदीप दीक्षित ने एक अख़बार में बयान देकर बगावत का ऐलान कर दिया है।

दीक्षित ने कहा कि इतने महीनों के बाद भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नया अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर सके। इसका कारण यह है कि वह सब यह सोचकर डरते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा? मतलब यह है कि कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी को संदीप दीक्षित की यह सीधी सीधी ललकार है कि पार्टी में अब वह जान नहीं डाल पा रही है। उनका अपरोक्ष रूप से कहना यह भी है कि गांधी परिवार के बिना अब पार्टी चलाई जानी चाहिए। जिसका अध्यक्ष कोई गांधी परिवार के अलावा दूसरा हो।

लेकिन गांधी परिवार के अलावा दूसरा पार्टी अध्यक्ष कौन होगा ? यह वह अभी क्लियर नहीं कर पाए। दूसरी तरफ पूर्व सांसद संदीप दीक्षित के सुर में सुर मिलाते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर भी नजर आए। शशि थरूर ने संदीप दीक्षित के बयान का खुला समर्थन किया और कहा कि कांग्रेस में आलाकमान के खिलाफ नाराजगी चरम पर है जो दबी जुबान से निकलती भी नहीं है और लोग इसका प्रतिकार भी नहीं करते हैं।

यही नहीं बल्कि थरूर ने एक ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा कि संदीप दीक्षित ने जो कहा है वह देश भर में पार्टी के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं। इनमें से कई नेता पार्टी में जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं। जबकि बहुत से ऐसे हैं जो बोल नहीं रहे हैं। उन्होंने कहा कि मैं सीडब्ल्यूसी से फिर आग्रह करता हूं कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने और मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए नेतृत्व का चुनाव कराएं।

देखा जाए तो शशि थरूर यही चाहते हैं कि कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी की बजाय अब कोई पार्टी का नया नेतृत्व सामने निकल कर आए। पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत नेता शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित ने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बयान देकर जाहिर कर दिया है कि वह खुली बगावत के लिए तैयार है। वह यह भी कहते नजर आए कि कांग्रेस में नेताओं की कमी नहीं है। फिलहाल कांग्रेस में अभी भी 6-8 नेता ऐसे हैं जो अध्यक्ष बनकर पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं।

इसी के साथ संदीप दीक्षित ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाते हुए कहा कि वह नहीं चाहते कि नए नेता पार्टी के लिए सक्रिय रहे। वह चाहते हैं की निष्क्रियता पार्टी की बनी रहे। क्योंकि अगर निष्क्रियता बनी रहेगी तो उनकी वेल्यू भी पार्टी में बनी रहेगी।दीक्षित का कहना है कि मुझे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से निराशा हो रही है। राज्यसभा में बैठे कई नेता, कई मुख्यमंत्री और कई वरिष्ठ नेता ऐसे हैं जिन्हें इस समय आगे आना चाहिए। अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, कमलनाथ, पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद और अहमद पटेल जैसे नेताओं का नाम उन्होंने लिया।

उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने कांग्रेस के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन अब इनका राजानीति में कम ही समय बचा है। ऐसे में कम से कम उन्हें बौद्धिक रूप से तो पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए योगदान करना ही चाहिए। दीक्षित का कहना है कि राहुल गांधी ने स्वयं पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अध्यक्ष तलाशने को कहा था और वह नाकाम रहे। इसके लिए किसी एक नेता पर उंगली उठाना बहुत आसान है, लेकिन बाकी के 40-50 नेता क्या कर रहे हैं?

उनको एक चुनौती दी गई है। अब ये उनकी जिम्मेदारी थी कि सभी को साथ लाएं और एक सहमति बनाकर कांग्रेस का नया अध्यक्ष चुने। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की मौजूदा स्थिति यही दर्शाती है कि हम कोई भी निर्णय लेने से डरते हैं। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास नेता नहीं है, बस हमारे पास नए लोग नहीं है। गौरतलब है कि गत दिनों हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी गत सामने आई है। जो कांग्रेस लगातार दिल्ली में तीन बार अपनी सरकार बना कर हैट्रिक लगा चुकी थी उस पार्टी के कैंडिडेट अपनी जमानत तक नहीं बचा पाए । यह पार्टी के लिए काफी शर्मनाक है।

हालांकि, इसकी जिम्मेदारी लेते हुए दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने परिणाम आने के पहले दिन ही अपना इस्तीफा दे दिया था। जबकि तीन दिन बाद पार्टी के प्रदेश प्रभारी पीसी चाको ने भी अपना इस्तीफा पार्टी अध्यक्ष को भेज दिया था। लेकिन देखा जाए तो सिर्फ इस्तीफे भर से ही पार्टी पर लगा का धब्बा नहीं छूट सकता। आखिर क्या वजह रही कि पिछले 5 साल में पार्टी उभरने की बजाय दिनों-दिन डूबती चली गई। शीला दीक्षित दीक्षित की मौत के बाद तो जैसे कांग्रेस मृत प्राय ही हो गई। शायद इसका दर्द ही अब उनके पुत्र संदीप दीक्षित को सता रहा है। तभी तो वह पार्टी सुप्रीमों सोनिया गांधी के खिलाफ मुखर हो गए।

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