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लपटों के बीच सुलगे सवाल

आग लगने की हर घटना पर सियासत तेज हो जाती है। मीडिया में सुरक्षा उपायों पर खूब बहसें होती हैं, लेकिन कहीं से भी कोई सबक लेने को तैयार नहीं। नतीजन आग लगने की घटनाओं की पुनरावृत्ति जारी है दिल्ली में एक बार फिर हुए भयंकर अग्निकांड ने गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इस देश के राजनीतिक दल हादसों पर सिर्फ सियासत करेंगे या फिर इससे सबक लेकर कोई ऐसे प्रयास भी कर पाएंगे जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके? दिल्ली विधानसभा के आगामी चुनाव को देखते हुए राजनीतिक पार्टियां रानी झांसी मार्ग स्थित एक फैक्ट्री में लगी आग से 43 लोगों की मौत हो गई। लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर दोष मढ़ने लगी हैं। कांग्रेस इसके लिए दिल्ली सरकार और बीजेपी के अधिकार वाली एमसीडी को जिम्मेदार ठहरा रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि दिल्ली सरकार को रिहायशी इलाके में चल रही फैक्ट्री को समय रहते दूसरी जगह शिफ्ट करना चाहिए था, जबकि आम आदमी पार्टी के नेता कहते हैं कि फैक्ट्री के लिए लाइसेंस देने का काम एमसीडी का है। अगर घर के भीतर अवैध रूप से फैक्ट्री चल रही थी तो उसे रोकने का काम एमसीडी का था जो उसने नहीं किया। एमसीडी में भाजपा का शासन है। कांग्रेस को भी लपेटे में लिया जा रहा है कि उसके शासन में रिहायशी इलाकों में फैक्ट्रियां खुली थी।

राजनीतिक पार्टियां बेशक एक-दूसरे के सिर दोष मढ़ रही हैं, लेकिन वे अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती। जानकार इस मामले में सभी पार्टियों को कठघरे में खड़ा करते हैं कि अतीत में हुई भीषण दुर्घटनाओं को देखते हुए भी सुरक्षा के ठोस उपाय करने में किसी भी तरफ से दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। राजनीतिक लाभ के लिए सियासी पार्टियों में अवैध कॉलोनियों को वैध कराने की होड़ बेशक मची रहती है। अनधिकृत कॉलोनियों को सुविधाएं देने के दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन कोई यह देखने वाला नहीं होता कि दिल्ली में बस्तियां इस तरह बस रहीं हैं कि आग लगने पर फायर ब्रिगेड की गाड़ियों के लिए घटना स्थल पर पहुंचने का रास्ता भी न रहे। जो बहुमंजिला इमारतें बन रही हैं उनमें सुरक्षा के क्या उपाय हैं, इस बारे में देखने की किसी को फुरसत नहीं है।

दिल्ली में पहले 22 वर्षों के दौरान आग लगने की कई घटनाएं हुईं, पर चार हादसे ऐसे हुए जिन्होंने दिल्ली-एनसीआर ही नहीं पूरे देश को दहला दिया। जब-जब दिल्ली में आग ने तांडव मचाया राजधानीवासियों को उपहार सिनेमा अग्निकांड याद आया। दिल्ली के उपहार सिनेमा में 13 जून 1997 को भीषण आग लगी थी। उस समय सिनेमाघर में फिल्म का प्रदर्शन चल रहा था और सिनेमा हाल दर्शकों से भरा हुआ था। इस हादसे में 59 लोगों की जान चली गई थी। इसके बाद दिल्ली के नंदनगरी इलाके में 20 नवंबर 2011 को एक कार्यक्रम के दौरान आग लगने से 14 लोगों की मौत और 30 घायल हो गए थे।

जनवरी 2018 में बवाना की एक अवैध पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से 17 लोगों की मौत हुई। इसी वर्ष 11-12 फरवरी की रात में करोलबाग के होटल अर्पित में आग लगने से 17 लोगों की मौत हो गई और 20 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। 1997 से अब तक आग लगने की कुल पांच बड़ी घटनाओं में 150 लोगों की मौत हो गई है। अग्निकांड के पीछे एक बार फिर लापरवाही उजागर हुई। बताया जाता है कि इन निर्माण इकाइयों के पास दमकल विभाग का अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं था। आस-पास दमकल के वाहनों के आवागमन के लिए पर्याप्त जगह नहीं थी जिससे बचाव अभियान में दिक्कत हुई। बिजली वितरण कंपनी बीवाईपीएल का दावा है कि इमारत के भूतल पर लगे मीटर सुरक्षित हैं। इस दावे से आग शॉर्ट सर्किट होने से नहीं, बल्कि किसी अन्य कारण से लगने की आशंका है।

 

सवाल सिर्फ राजधानी दिल्ली का नहीं, बल्कि देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और अन्य जगहों पर ऐसी घटनाएं होती रही हैं। बीते वर्ष मुंबई के पॉश इलाके में एक बिल्डिंग की छत के ऊपर चलाए जा रहे ‘पब’ या रात्रि दारूखाना और नाच घर में लगी आग ने भयंकर तबाही मचाई थी। 1995 को मंडी डबवाली (हरियाणा) में आग ने तांडव दिखाया था। दिल्ली में 31 मई, 1999 लालकुआं केमिकल मार्केट काम्पलेक्स में लगी आग में 57 लोगों की मौत हो गई थी। करीब 27 लोग घायल भी हो गए थे। 20 नवंबर 2011 को नंदनगरी ई- 2 ब्लॉक में गगन सिनेमा के पास स्थित एक सामुदायिक भवन में अखिल भारतीय किन्नर समाज सर्वधर्म सम्मेलन के दौरान पंडाल में आग लगने की घटना में 15 किन्नरों की मौत हो गई थी और 65 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। सीमापुरी इलाके में स्थित दिलशाद कॉलोनी में 7 जुलाई 2017 को आग लगने की घटना में एक ही परिवार के चार लोगों की मौत हो गई थी।

दिल्ली के बवाना इलाके के औद्योगिक क्षेत्र में 21 जनवरी 2018 को एक पटाखा स्टोरेज यूनिट में भीषण आग लग गई थी। जिससे 17 लोगों की घटना स्थल पर ही मौत हो गई थी और दो लोग घायल हो गए थे। तब भी प्रशासन ने सुरक्षा का इंतजाम करने के निर्देश दिए थे। दिल्ली के जाकिर नगर इलाके में 6 अगस्त को लगी आग में 5 लोगों की मौत हो गई थी और 11 लोग जख्मी हो गए थे। इमारत में शाट सर्किट से आग लग गई थी। सेंट्रल दिल्ली के करोल बाग में 12 फरवरी, 2019 को चार मंजिला होटल अर्पित में तड़के लगी आग में 17 गेस्ट जिंदा जल गए। इनमें एक बच्चा और दो लोग जान बचाने के लिए इमारत से कूद गए थे, लेकिन उनकी भी मौत हो गई। इस घटना में 35 लोग घायल हो गए थे। आग की लगातार जारी घटनाओं के बावजूद किसी भी सरकारी विभाग के चाल, चरित्र और काम- काज के ढर्रे में अब तक कोई फर्क नहीं नजर आया।

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