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नहीं चला प्रियंका का जादू

प्रियंका गांधी के चेहरे में उनकी दादी देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चेहरा देखने वाले लोगों पर आखिर प्रियंका का जादू क्यों बेअसर रहा यह पार्टी के लिए शोध का विषय है। बावजूद इसके कि प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में विट्टानसभा चुनावों के दौरान 167 रैलियां और 42 रोड शो किए जिनमें भीड़ बहुतायत में होती तो थी लेकिन चुनाव आते-आते यह भीड़ पार्टी के लिए मतदाताओं में परिवर्तित नहीं हो पाई। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के दौरान सबसे ज्यादा मुद्दे भी प्रियंका गांधी ने ही उठाए। चाहें वह कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों का हो या अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी। हाथरस कांड हो या लखीमपुर खीरी का मामला सब जगह प्रियंका गांधी फ्रंट फुट पर खेलती रहीं। लेकिन चुनाव परिणाम में जनता ने उन्हें बैकफुट पर डाल दिया

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पूरे दमखम के साथ मैदान में उतरी थीं। उन्होंने किसान आंदोलन के साथ यूपी में एंट्री ली। इसके बाद वह कभी झाड़ू लगाते तो कभी गंगा में डुबकी लगाते हुए दिखीं। प्रियंका गांधी टैगलाइन ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ की हुंकार भर आगे भी बढ़ी। लेकिन इन सब का उत्तर प्रदेश की जनता पर कोई खास असर नहीं पड़ा। चुनावों में लगभग डेढ़ सौ करोड़ खर्च करने वाली कांग्रेस को यूपी में महज 2 सीटों से संतोष करना पड़ा। यूपी के विधानसभा चुनावों में मिली हार बाद अब आरोप- प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चला है। विरोधियों के निशाने पर प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और प्रियंका के निजी सचिव संदीप सिंह हैं। पिछले तीन दशक से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक वनवास झेल रही कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले एक नया प्रयोग किया। जिसमें प्रियंका गांधी को यूपी का प्रभारी बनाकर चुनाव की जिम्मेदारी दी गई। लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी का सबसे ज्यादा फोकस अमेठी सीट पर रहा। लेकिन यह सीट भी वह बचा नहीं पाईं। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी की जाने लगी। तब कांग्रेस ने जोर-शोर से प्रचार किया कि इस बार प्रियंका के नेतृत्व में यूपी फतह कर लेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। पिछले 10 सालों में पार्टी की 26 सीटें कम हो गई। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 28 सीटें मिली थी जहां वह इस बार 2 सीटों पर ही सिमट गई। यही नहीं बल्कि 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का मत प्रतिशत 6 .25 था वह घटकर अब 2 .34 रह गया।

गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 7 सीटें मिली थी। तब कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था और 114 सीटों पर चुनाव लड़ा था । लेकिन इस बार पूरे 403 विधानसभा सीटों पर पार्टी ने प्रियंका के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। महिला सशक्तिकरण के दावे के साथ प्रियंका गांधी ने टिकटों में 40 प्रतिशत आरक्षण महिलाओं के लिए किया था। जिसके चलते 144 महिलाओं को टिकट दिए गए। लेकिन कांग्रेस को सिर्फ रामपुर खास से ही आराधना मिश्रा के रूप में एकमात्र महिला की जीत हासिल हो पाई। इस दौरान चुनावों में कांग्रेस का नारा ’लड़की हूं लड़ सकती हूं’ खूब जमकर चला। लेकिन कांग्रेस मुख्य मुकाबले से बाहर ही रह गई। यूपी में कांग्रेस की करारी हार के बाद प्रियंका गांधी के नेतृत्व को लेकर अब सवाल उठने शुरू हो गए हैं। विपक्षी दल कांग्रेस के साथ ही प्रियंका गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के पास इन सवालों के कोई जवाब नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यूपी के विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी के अलावा किसी भी नेता का दखल क्यों नहीं था? पार्टी के नेताओं का ही आरोप है कि सिर्फ प्रियंका गांधी को यूपी में आगे करने के उद्देश्य से पार्टी के सभी बड़े नेताओं को दरकिनार कर दिया। शायद यही वजह रही कि पार्टी के वरिष्ठ नेता आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद और ललितेश त्रिपाठी समेत कई बड़े नेता चुनाव से पहले ही पार्टी को अलविदा कह गए। यूपी में फिलहाल कांग्रेस की स्थिति को देखें तो उसके पास कोई बड़ा चेहरा भी नहीं है जो पार्टी को राज्य में खड़ा कर सकें। लोगों का आरोप है कि कांग्रेस में ही ज्यादातर नेता पार्टी की राजनीति को गांधी परिवार के इर्द-गिर्द रखना चाहते हैं। वह समझते हैं कि गांधी परिवार के कारण इन नेताओं का वजूद बचा हुआ है। इस कारण, कांग्रेस में सक्रिय और जमीनी नेताओं को पार्टी में कोई तवज्जो नहीं मिल पा रही है।


प्रियंका गांधी के बारे में राजनीतिक पंडितों की राय को मानें तो पार्टी द्वारा उन्हें 2017 के विधानसभा चुनाव में ही यूपी में उतार देना चाहिए था। तब कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने भी पार्टी को ऐसा ही सुझाव दिया था। उन्होंने कहा था कि 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी को पार्टी का नेतृत्व दिया जाना चाहिए। साथ ही प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि प्रियंका गांधी के यूपी में इंचार्ज बनने से कांग्रेस की स्थिति सुधर सकती है। लेकिन तब पार्टी ने प्रियंका गांधी के हाथों में पूरी तरह चुनावी कमान नहीं दी जैसी इस बार के चुनाव में दी गई। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि 2017 में प्रियंका गांधी को यूपी के राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति का अच्छा अनुभव होता। उसके बाद ही वह 2022 के विधानसभा चुनाव में परिपक्वता के साथ मैदान में उतरतीं तो बेहतर परिणाम दे सकती थीं। प्रियंका गांधी के चेहरे में उनकी दादी देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चेहरा देखने वाले लोगों पर आखिर प्रियंका का जादू क्यों बेअसर रहा, यह राजनीतिक पंडितों के लिए शोध का विषय है। बावजूद इसके कि प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में 167 रैलियां की और 42 रोड शो किए। जिनमें भीड़ बहुतायत में होती थी। लेकिन चुनाव आते आते यह भीड़ पार्टी के लिए मतदाताओं में परिवर्तित नहीं हो पाई।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के दौरान सबसे ज्यादा मुद्दे भी प्रियंका गांधी ने ही उठाए। चाहें वह कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों का अपने घरों में लौटना हो या अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी हो। हाथरस कांड हो या लखीमपुर खीरी का मामला। सब जगह प्रियंका गांधी फ्रंट फुट पर खेलती नजर आईं। लेकिन चुनाव परिणाम में जनता ने उन्हें बैकफुट पर डाल दिया। कांग्रेस जिस प्रियंका गांधी को तुरुप का पत्ता समझती थी वह उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बेअसर साबित रहा। इसके पीछे राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पार्टी द्वारा जमीनी स्तर पर चुनाव न लड़ना और स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल न बनाकर चलना रहा। यूपी में हार के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी पर उन्हीं की पार्टी के नेता सवाल खड़ा कर रहे हैं। सवाल उनके निजी सचिव संदीप सिंह पर भी लग रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और राष्ट्रीय सचिव तथा यूपी के सह प्रभारी धीरज गुर्जर को भी लपेटे में लिया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इन सभी नेताओं ने और खुद प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह ने प्रियंका को अंधेरे में रखा। उन्होंने पार्टी के नेता और कार्यकर्ता तक को प्रियंका गांधी से नहीं मिलने दिया।

पार्टी के इलेक्ट्रॉनिक और उर्दू मीडिया संयोजक के पद पर जीशान हैदर नियुक्त थे। उन्होंने भी अपने पद से इस्तीफा देते हुए ऐसे ही गंभीर आरोप लगाए हैं। जीशान ने कहा है कि जब से प्रियंका यूपी की प्रभारी बनाई गई तब से 30 पूर्व सांसद और पूर्व विधायक पार्टी छोड़ चुके हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अपने पुराने लोगों की परवाह न करने से ही कांग्रेस इस हालत में पहुंची है। जीशान ने कांग्रेस छोड़ने वाले वरिष्ठ नेताओं की सूची सोशल मीडिया पर जारी करते हुए कहा है कि जिन्होंने प्रियंका के प्रभार संभालने के बाद कांग्रेस छोड़ी या जिनको निकाला गया। उसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार जेएनयू में पढ़ा एक व्यक्ति है। जीशान हैदर का सीधा निशाना प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह की ओर है। पार्टी के पूर्व प्रदेश महासचिव वीरेंद्र सिंह गुड्डू को ऐसा ही सच बयान करने पर पार्टी से निष्कासित कर दिया गया है। गुड्डू ने प्रियंका गांधी के निजी सचिव संदीप सिंह, प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू और धीरज गुर्जर पर गंभीर आरोप लगाए थे। जिसमें उन्होंने कहा था कि इन तीनों ने प्रियंका गांधी के नाम पर प्रदेश में टिकट बेचने का काम किया।

वीरेंद्र सिंह गुड्डू कहते हैं कि प्रियंका गांधी ने अपनी मेहनत और ईमानदारी में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन उनके निजी सचिव संदीप सिंह कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ताओं और प्रियंका के बीच दीवार बन गए। गुड्डू के अनुसार निजी सचिव को सहारा देने वाले अजय कुमार लल्लू और धीरज गुर्जर थे। इन लोगों ने प्रियंका गांधी से लोगों को मिलने ही नहीं दिया। संगठन एवं टिकट वितरण में जमकर लूटपाट की। जिसका प्रियंका को पता भी नहीं चला। एक तरह से उक्त लोगों ने प्रियंका और कांग्रेस की पीठ में छुरा घोंपा है, इन को पार्टी से बाहर किया जाना चाहिए।

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