उत्तराखण्ड की चर्चित शख्सियत प्रिया शर्मा इन दिनों कारावास में है। कभी राज्य के बड़े राजनेताओं और मीडिया संस्थानों की खासमखास इस महिला उद्यमी को अब भू-माफिया और जालसाज माना जाने लगा है। शर्मा की इस अधोगति का आरंभ १२ मई, २०१७ की उस प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हुआ जिसमें उसने राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस समेत कई नौकरशाहों पर रिश्वत मांगने का संगीन आरोप लगा डाला। बस फिर क्या था सबकी आंखों की तारा रही प्रिया शर्मा यकायक ही अछूत में बदल गई। उस पर एक के बाद एक मुकदमे दर्ज होने शुरू हो गए। प्रिया शर्मा की इस पेंचदार कहानी के प्रथम भाग में हमने दो ऐसे ही पुलिस एफआईआर की पड़ताल की थी जिसमें आरोपी तो बनाया जाना था राज्य के एक रसूखदार राजनेता को, लेकिन बलि का बकरा बना दिया गया प्रिया शर्मा को। एक ऐसे ही अन्य मामले में कथित धोखाधड़ी के एक बरस बाद एक शिकायतकर्ता अपनी शिकायत पुलिस को देता है, पुलिस तुरंत मामला भी दर्ज कर लेती है। ‘दि संडे पोस्ट’ की पड़ताल से स्पष्ट है कि मामला दोनों पक्षों के मध्य लेन-देन का है जिसे जालसाजी का जामा पहनाया गया है

उत्तराखण्ड के शहर रुद्रपुर की प्रिया शर्मा आज के दिन भले ही जेल में बंद हो, एक समय वह शहर ही नहीं, बल्कि प्रदेश में अपनी पहचान स्थापित कर रही एक ए्रेसी चर्चित महिला उद्यमी थी जिसे सम्मानित करने वालों में राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री, मंत्री और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान भी शामिल थे। किसी ने उसे ‘प्रतिभा सम्मान’ दिया तो किसी ने ‘रत्न सम्मान’ से नवाजा। फिर आया १२ मई, २०१७ का दिन जिसने इस उभरते सितारे को धूमकेतू में बदल दिया। प्रिया ने इस दिन राज्य की नौकरशाही के खिलाफ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जंग का ऐलान कर दिया। उसने वरिष्ठ आईएएस और तत्कालीन कुमाऊं कमीशनर डी  सेंथियल पांडियन, तत्कालीन एडीएम रुद्रपुर दीप्ती वैश्य और सरकारी वकील हरिमोहन भाटिया पर पांच करोड़ की रिश्वत मांगने एवं उनकी मांग पूरी ना होने पर प्रताड़ित करने का सनसनीखेज आरोप लगा डाला। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का नतीजा यह रहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली राज्य सरकार ने कथित भ्रष्टाचार के आरोपी अफसरों का तो तबादला मात्र करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर डाली, मगर आरोप लगाने वाली प्रिया शर्मा पर शासन-प्रशासन का कहर टूट पड़ा। रुद्रपुर की पुलिस ने एक के बाद एक मुकदमे प्रिया के खिलाफ दर्ज करने शुरू कर दिए। प्रिया शर्मा और उसकी कंपनी एलाइड इन्फ्राप्लस एंड अदर्स में डायरेक्टर सुधीर चावला इन एफआईआर के चलते शहर से फरार हो गए। २० मार्च, २०१८ को इन्हें रुद्रपुर की पुलिस ने हरियाणा के गुरुग्राम से गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान राज्य का जो मीडिया प्रिया शर्मा को प्रतिभा मानता आया था, उसे राज्य का बहुमूल्य रत्न करार देता था, उसी मीडिया ने प्रिया को जालसाज, भगौड़ा, भू-माफिया आदि करार दे डाला। ‘दि संडे पोस्ट’ ने प्रिया शर्मा के खिलाफ दर्ज पुलिस शिकायतों को जब खंगालना शुरू किया तो कई खटकने वाले तथ्य सामने आए। नतीजा ‘प्रिया शर्मा की पेंचदार कहानी’ के रूप में सामने आया। उसके खिलाफ दर्ज दो एफआईआर एक ऐसे मामले की थी जिसमें आरोपी तो उसे बनाया गया, जबकि उसका गुनाह इतना मात्र था कि जिस कंपनी पाल मिनरल इंडस्ट्री में वह नौकरी करती थी उस कंपनी की तरफ से वह जमीनों के सौदे में शामिल रही। असल में यह शिकायत दर्ज होनी चाहिए थी पाल मिनरल इंडस्ट्री के खिलाफ। ऐसा लेकिन हुआ नहीं क्योंकि उक्त कंपनी के मालिक राज्य के रसूखदार राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखने वाले एवं वर्तमान में सत्तारूढ़ भाजपा के सदस्य मोहन पाल हैं। बहरहाल ‘दि संडे पोस्ट’ की खबर के बाद इस मामले में पुलिस द्वारा दायर चार्जशीट में मोहन पाल को भी अभियुक्त बना दिया गया है। प्रिया शर्मा को एक एफआईआर में जमानत भी मिल गई है। हालांकि अभी प्रिया शर्मा और सुधीर चावला न्यायिक हिरासत में ही हैं क्योंकि उन पर कई अन्य मुकदमे दर्ज हैं।

राज्य के वरिष्ठ नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के बाद प्रिया शर्मा पर दर्ज एक अन्य एफआईआर भी खासी रोचक है। एक मार्च, २०१८ को किच्छा थाने में दर्ज यह एफआईआर भी जल्दाबाजी में दर्ज की गई प्रतीत होती है। किच्छा कोतवाली में कई महीनों, यहां तक कि साल भर से भी ज्यादा समय बीत चुका है, उन शिकायतों को जिन पर कार्यवाही करने का समय थाना पुलिस निकाल नहीं पा रही है। ये शिकायतें उन लोगों की हैं जिन्हें एक द्घोषित हिस्ट्रीशीटर गिरधारी लाल साहू ने छलपूर्वक जमीनें बेची लेकिन कब्जा नहीं दिया। ऊधमसिंह नगर की पुलिस एक चिह्नित भू-माफिया के खिलाफ तो आमजन की शिकायतों पर सुनवाई करने से किनारा करती है क्योंकि गिरधारी लाल साहू राजनीतिक रसूख वाला व्यक्ति है, लेकिन प्रिया शर्मा के खिलाफ बगैर छानबीन किए तुरंत एफआईआर दर्ज कर लेती है।

एफआईआर नं ००८०

केसर इंटरप्राइजेज के इसी भूखंड को लेकर है विवाद

बहेड़ी, जिला बरेली, उत्तर प्रदेश की एक कंपनी मैसर्स केसर इंटरप्राइजेज लिमिटेड के अपर महाप्रबंधक एएम गर्ग की तरफ से दर्ज कराई गई इस एफआईआर के मुताबिक किच्छा तहसील के गांव बन्डिया में कंपनी की एक जमीन का सौदा मैसर्स एलाइड इंफ्राप्लस एंड अदर्स के साथ २१ अक्टूबर, २०१६ में किया गया, जिसे एक मार्च, २०१७ में सौदे की शर्तों का पालन प्रिया शर्मा द्वारा न किए जाने के चलते कैंसेल भी कर दिया गया। बकौल एएम गर्ग, प्रिया शर्मा ने दस जनवरी, २०१७ को फर्जी कागजात के आधार पर एक बिजली का कनेक्शन इस भूखंड में केसर इंटरप्राइजेज के नाम पर ले लिया। इस एफआईआर में कहा गया है कि जब मई, २०१७ में यानी प्रिया शर्मा की कंपनी संग सौदा समाप्त होने के बाद, केसर इंटरप्राइजेज को इस फर्जीवाड़े का पता चला  तो कंपनी ने इस बिजली कनेक्शन को बंद भी करा दिया। यानी कथित धोखाधड़ी हुई १० जनवरी, २०१७ को, इस धोखाधड़ी का पता कथित तौर पर चला मई २०१७ में, लेकिन कंपनी को पुलिस शिकायत करने की सुध आई पूरे दस माह बाद एक मार्च, २०१८ को। रुद्रपुर की पुलिस ने भी पूरी चुस्ती-फुर्ती के साथ अपने कर्तव्य का पालन किया। एफआईआर दर्ज की गई एक बजकर पचास मिनट पर, दिन था एक मार्च, २०१८। अमूमन शिकायत दर्ज की जाती है तो पहले उसे जनरल डायरी यानी रोजनामचे में दर्ज किया जाता है। इसके बाद पूरी छानबीन की जाती है। यदि पुलिस को शिकायत में दम नजर आता है तभी उसे एफआईआर में बदला जाता है। किच्छा थाने का कमाल देखिए कि गिरधारी लाल साहू के खिलाफ शिकायतों को रोजनामचे तक में दर्ज नहीं किया जाता है तो दूसरी तरफ प्रिया शर्मा के खिलाफ तुरंत ही रोजनामचे में दर्ज शिकायत को गंभीर धाराओं के अंतर्गत एफआईआर में बदल दिया जाता है। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक केसर इंटरप्राइजेज की शिकायत एक मार्च, २०१८ को पहले रोजनामचे यानी जीडी में दर्ज हुई फिर उसी दिन उसे एफआईआर में बदल दिया गया। यह रुद्रपुर की पुलिस पर बड़ा सवालिया निशान है जो ‘दि संडे पोस्ट’ की इस आशंका को पुष्ट करता है कि वरिष्ठ नौकरशाहों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाने के चलते प्रिया शर्मा को येन-केन-प्रकारेण फंसाने का खेल खेला गया है।

‘दि संडे पोस्ट’ की पड़ताल से सामने आया है कि यह पूरा मामला दरअसल एक ऐसे भूखंड को लेकर है जो पहले से ही खासा विवादित रहा है। केसर इंटरप्राइजेज ने किच्छा तहसील के गांव बन्डिया में जिस भूखंड को बेचने का सौदा प्रिया शर्मा की कंपनी संग किया, उस भूखंड के मालिकाना हक को लेकर कंपनी का लंबा कानूनी विवाद पन्ना शाह पुत्री स्व जीवन लाल शाह संग चला है। न्यायालय में चल रहे मुकदमे के दौरान ही प्रिया शर्मा की कंपनी संग केसर इंटरप्राइजेज ने इस जमीन का सौदा कर लिया था। रुद्रपुर पुलिस को चाहिए था कि एफआईआर दर्ज करने से पूर्व वह इस भूखंड के विवादित मामले की पूरी छानबीन करती। इतना ही नहीं केसर इंटरप्राइजेज और प्रिया शर्मा के मध्य इस भूखंड के भुगतान को लेकर विवाद रहा है। प्रिया शर्मा की मानें तो केसर इंटरप्राइजेज ने २१ अक्टूबर, २०१६ को एक एनओसी जारी किया था जिसमें उक्त भूखंड में निर्माण कार्यों के लिए बिजली कनेक्शन लेने, प्लॉट काटने, बाउंड्री वॉल बनाने आदि के लिए सहमति दी गई थी। बाद में जब सौदे के एमओयू अनुसार केसर इंटरप्राइजेज को प्रिया शर्मा की कंपनी ने तय समय पर भुगतान नहीं किया तो मामला अदालत जा पहुंचा। एक मार्च, २०१७ को केसर इंटरप्राइजेज ने एक कानूनी नोटिस अपने बकाया भुगतान के लिए प्रिया शर्मा को भेजा। इसके बाद मामला रुद्रपुर के सिविल जज (सीनियर डिविजन) के यहां पहुंच गया। कोर्ट के आदेश पर एक मध्यस्थ (आरबिटे्रटर) इस मामले में नियुक्त किया जा चुका है। इन सब महत्वपूर्ण तथ्यों को भी केसर इंटरप्राइजेज ने अपनी एफआईआर में बताना उचित नहीं समझा। इससे स्पष्ट होता है कि उसका उद्देश्य किसी भी तरह से आपराधिक मुकदमा प्रिया शर्मा के खिलाफ दर्ज कराना मात्र था ताकि उसे या तो उसके भूखंड के लिए हुए सौदे में मिले एडवांस को वापस ना करना पड़े, या फिर उसे प्रिया शर्मा से बकाया पैसा मिल जाए। फर्जी तरीके से यदि बिजली कनेक्शन लिया गया होता तो यह एफआईआर एक बरस पहले ही हो जानी चाहिए थी। हुई लेकिन  तब जब प्रिया शर्मा ने राज्य के एक वरिष्ठ आईएएस संग पंगा ले शासन-प्रशासन से दुश्मनी मोल ली। रुद्रपुर पुलिस का इस एफआईआर को दर्ज करने में ठीक उसी प्रकार की जल्दबाजी का प्रदर्शन करना पुलिस की मंशा पर संदेह पैदा करता है, जिस प्रकार पाल मिनरल इंडस्ट्री के मामले में बजाए कंपनी मालिक मोहन पाल, प्रिया शर्मा को अभिुक्त बना डाला था। इस एफआईआर को दर्ज करने से पूर्व पुलिस ने संबंधित बिजली विभाग के अधिकारियों से तथ्यों की पूरी जानकारी लेनी चाहिए थी। केसर इंटप्राइजेज ने अपनी शिकायत में बिजली विभाग के अफसरों पर भी धोखाधड़ी का आरोप लगाया लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज केवल प्रिया शर्मा और एक अन्य व्यक्ति गोपाल के नाम ही की। यहां यह भी गौरतलब है कि मात्र केसर इंटरप्राइजेज के कहने मात्र पर पुलिस ने मान लिया कि बिजली कनेक्शन लिए जाने के लिए प्रिया शर्मा ने केसर इंटरप्राइजेज के लेटर पैड चुराए अथवा छपवाए तथा कंपनी के चेयरमैन के जाली हस्ताक्षर भी कर डाले। यहां यह बेहद अहम तथ्य है कि बिजली कनेक्शन उस समय लिया गया जब केसर इंटरप्राइजेज और एलाइड इंफ्राप्लस के बीच भूखंड को लेकर सौदा हो चुका था और संबंध मधुर थे। ऐसे में फर्जी हस्ताक्षर कराने का कोई तर्क संगत कारण नजर नहीं आता है। उत्तराखण्ड इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कोड, रेग्युलेशन २००७ के अनुसार राज्य में बिजली कनेक्शन के लिए स्पष्ट प्रावधान है कि उसे या तो भूखण्ड के मालिक के नाम पर या फिर यदि ऐसे किसी भूखंड का सौदा हो गया हो तो खरीददार अपने नाम पर सीधे ले सकता है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि प्रिया शर्मा अपनी कंपनी के नाम भी इस कनेक्शन को इस एक्ट के अनुसार ले सकती थी क्योंकि उसकी कंपनी का लिखित में केसर इंटरप्राइजेज संग इस भूखंड का सौदा हो चुका था। ‘दि संडे पोस्ट’ ने इस एक्ट का अध्ययन किया। इसमें स्पष्ट लिखा है कि बिजली का कनेक्शन मांगने वाला यदि जमीन का मालिक नहीं भी तो वह कनेक्शन ले सकता है यदि उसके पास जमीन के मालिक का एनओसी हो। बकौल प्रिया शर्मा उनके पास केसर इंटरप्राइजेज द्वारा जारी किया गया एनओसी है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि क्योंकर प्रिया शर्मा जाली हस्ताक्षर कर बिजली कनेक्शन लेने का काम करेगी।

कुल मिलाकर एफआईआर संख्या ००८० की पड़ताल से एक बात स्पष्ट रूप से सामने निकल कर आती है कि रुद्रपुर पुलिस ने एक सिविल वाद को क्रिमिनल वाद में बदल डाला। वह भी बगैर मामले की छानबीन किए। मामला दरअसल, दो पार्टियों के बीच लेन-देन का था जिसे फर्जीवाड़े की शक्ल दे दी गई।

बात अपनी-अपनी
जब लगभग ७-८ दिन लाइन निर्माण का कार्य चला तो कोई आपत्ति नहीं हुई। फिर मीटर भी लगा दिया गया। लगभग २० दिन बाद एसएम शर्मा द्वारा लिखित में आपत्ति आई तो कनेक्शन काट दिया गया। राजस्व ५५-६० हजार जमा कर दिया गया था। कागज पूरे थे तो पांच केवीए का कनेक्शन दे दिया।

संजय कुमार, उपखण्ड अधिकारी विद्युत किच्छा

मैं इस मामले में ज्यादा नहीं बता पाऊंगा। कोर्ट में हूं। फिर बात करूंगा। बयान भेजता हूं।
एम.एम. जोशी, विवेचक किच्छा थाना

प्रिया शर्मा ने कंपनी के अध्यक्ष के जाली हस्ताक्षर किए थे। फोटो वाट्सअप से ले ली। जब एनओसी कैंसेल हो गया तो आरबिट्रेटर की जरूरत नहीं रही। इन्होंने एनओसी के अनुसार शर्तें पूरी नहीं की। पेमेंट नहीं दिया गया। क्रिमिनल केस फर्जी हस्ताक्षर करने पर हुआ है। जमीन हमारी है। हमने अगस्त २०१७ को एसएसपी ऊधमसिंह नगर से शिकायत की थी। लेकिन जब कुछ नहीं हो पाया तो १५६/३ में कोर्ट ने एफआईआर के आदेश दिए। तब मुकदमा दर्ज हुआ है।
ए.एम. गर्ग, अपर महाप्रबंधक केसर इंटरप्राइजेज

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