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उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार आम लोगों को इलाज मुहैया करने के लिए चलाई गई आयुष्मान योजना को लेकर अपनी पीठ थपथपा रही है। हकीकत यह है कि यह योजना महज पांच महीने में ही दम तोड़ गई है। योजना के तहत जिन लोगों को इलाज के लिए कार्ड दिए गए प्राइवेट अस्पताल उन्हें अपने यहां भर्ती नहीं कर रहे हैं। नतीजतन इलाज के अभाव में लोगों की जानें जा रही हैं। जिन लोगों को प्राइवेट अस्पताल गलती से भर्ती कर भी देते हैं, तो उन्हें मोटा बिल थमा दिया जाता है। आयुष्मान योजना का कार्ड दिखाने पर इलाज के बजाए बहानेबाजी कर टरका दिया जाता है। योजना पर भ्रष्टाचार का घुन भी लग चुका है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर उत्तराखण्ड में अटल आयुष्मान योजना का शुभारंभ किया था। पिछले वर्ष इस योजना का शुभारंभ करते समय केंद्र और राज्य सरकार ने दावा किया था कि अब किसी भी गरीब की पैसे के अभाव में जान नहीं जाएगी। हमने सभी गरीबों के लिए ‘प्रधानमंत्री जन कल्याण आरोग्य योजना’ यानी आयुष्मान भारत का शुभारंभ कर दिया है। लेकिन इस दावे की हवा सिर्फ पांच माह में तब निकल गई जब पिंकी और सचिन कुमार बिना इलाज के बेमौत मर गए। ऐसे में सवाल उठने स्वाभाविक हैं जब उनके पास सरकार का दिया गोल्डन कार्ड था तो फिर उनकी मौत क्यों हुई? अस्पतालों ने उनका इलाज नहीं किया? क्या डबल इंजन की सरकार के पास इसका जवाब होगा? क्या सरकार पिंकी और सचिन की मौत की जांच कराएगी?
कोटद्वार निवासी 30 वर्षीय पिंकी को दिल की बीमारी थी। उसके इलाज में लगभग तीन लाख रुपये का खर्चा आ रहा था। गोल्डन कार्ड से पिंकी को एक उम्मीद जगी कि अब उसका इलाज आसानी से हो सकेगा। वह अपने दो मासूम बच्चां और परिजनों के साथ आराम से रहेगी। लेकिन राज्य में प्रधानमंत्री आयुष्मान योजना को भी 15 लाख रुपए के जुमले की तरह बना दिया। बीमार पिंकी आयुष्मान योजना के कार्ड को लेकर अस्पताल पंहुची। अस्पताल प्रशासन ने आयुष्मान कार्ड पर इलाज करने से मना कर दिया। जिसके बाद पिंकी और उसका परिवार इलाज कराने के लिए कोटद्वार तहसील परिसर में धरने पर भी  बैठने को मजबूर हुआ। पिंकी के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही थी। जिसमें स्थानीय प्रशासन ने पिंकी को उठाकर देहरादून के एक अस्पताल में भिजवा दिया, परंतु वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पिंकी मरने से पहले जीने की हर कोशिश करती रही। अपना गोल्डन कार्ड लेकर देहरादून के नामी- गिरामी संस्थागत अस्पताल में इलाज के लिए भटकती रही। उसे अस्पताल ने स्वास्थ्य कार्ड योजना का लाभ देने से इंकार कर दिया था। पिंकी के पति का कहना है कि उन्होंने कई जगह फोन किए गए और हेल्पलाइन नंबर पर फोन करने के बाद उसे महंत इंद्रेश अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन कुछ समय बाद मंहत इंद्रेश अस्पताल ने पिंकी के इलाज में दो लाख साठ हजार का इस्टीमेट थमा दिया। परिजनों को कहा गया कि जब वह पूरी रकम जमा करेंगे तभी इलाज हो सकेगा।
 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तराखण्ड का हर नेता आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रदेश के प्रत्येक परिवार को 5 लाख तक का मुफ्त इलाज देने के दावे कर रहा है। लेकिन जिस तरह से इस योजना को लेकर अस्पतालों की मनमानी सामने आ रही है उससे एक बात तो साफ है कि सरकार की यह योजना भी जुमला साबित हो रही है। अकेले पिंकी की मौत का मामला नहीं है, बल्कि और भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं जब लोग इलाज के लिए मोहताज हो गए। लेकिन डबल इंजन की सरकार अस्पतालों के विरुद्ध कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।
ऊधमसिंह नगर जिले के अंतर्गत गूलरभोज में भी एक दुखद मामला सामने आया है। यहां मजदूरी करने वाले एक व्यक्ति संजय सिंह के पुत्र 17 वर्षीय सचिन कुमार को 31 जनवरी 2019 के दिन बुखार हुआ। उसकी सांस फूलने लगी। डॉक्टर ने बताया कि इसे खून की कमी है, जल्दी एडमिट कराना पड़ेगा। तब उसे गदरपुर के जनता हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां वह एडमिट रहा। लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं हुआ। इसके बाद सचिन को रुद्रपुर स्थित महाराजा अग्रसेन हॉस्पिटल ले जाया गया। जहां डॉक्टरों ने उसकी हालत गंभीर देखते हुए हल्द्वानी स्थित बृजलाल हॉस्पिटल रेफर कर दिया। बृजलाल में सचिन को बाकायदा डॉक्टरों ने एडमिट किया और कहा कि इसका इलाज 40,000 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से होगा। इसी के साथ उन्होंने सचिन को जरूरी दवाइयां दी और ऑक्सीजन लगा दी। इसी दौरान जब हॉस्पिटल ने सचिन के परिजनों से पैसा जमा कराने को कहा तो उन्होंने हॉस्पिटल के मैनेजमेंट को आयुष्मान योजना का गोल्डन कार्ड दिया। गोल्डन कार्ड को देखते ही बृजलाल हॉस्पिटल के डॉक्टरों के बयान बदल गए। उन्होंने कहा कि आपका इलाज इस हॉस्पिटल में नहीं हो सकेगा। इसे आप बरेली ले जाइए। परिजनों ने डॉक्टरों के हाथ जोड़े और बच्चे को बचाने की गुहार लगाई। लेकिन इसका डॉक्टरों पर कोई असर नहीं हुआ। 2 फरवरी 2019 को सचिन की ऑक्सीजन हटा दी गई और उसे हॉस्पिटल से निकाल दिया गया। इसके बाद जब सचिन के माता-पिता उसको लेकर आ रहे थे तो वह अंतिम सांस ले रहा था। रुद्रपुर आने से पहले ही सचिन अपने मां-बाप की बाहों से सदा-सदा के लिए अलविदा हो गया। सचिन के पिता संजय सिंह बहरे हैं। वह मजदूरी करके किसी तरह परिवार पाल रहे थे। उनकी पत्नी कुमकुम कहती है कि हमारे यहां के विधायक और मंत्री अरविंद पाण्डे का बेटा अतुल पांडे संवेदना प्रकट करने घर आया था और कहा था कि वह सरकार से कुछ मदद कराएंगे। लेकिन आज तक उसने लौटकर न इधर देखा, न ही कोई मदद कराई। वह सचिन के गोल्डन कार्ड को दिखाते हुए कहती है कि इस कार्ड की वजह से आज हमारे बेटे की जान चली गई। अगर हमें सरकार इस कार्ड का भरोसा न देती तो हम भीख मांग कर अपने बेटे की जान बचा लेते।
योजना शुरू होने के कई महीने बाद भी प्रदेश में अटल आयुष्मान योजना की हालत ठीक नहीं है। निजी अस्पतालों ने योजना के तहत लोगों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराने में बहानेबाजी शुरू कर दी। कहीं इमरजेंसी मामलों में भी सरकारी अस्पताल से रेफर कराने और कहीं बीमारी पैनल में न होने की बात कहकर मरीजों को टरकाया जा रहा है या फिर उन्हें इलाज नहीं दिया जा रहा है। मजबूरन उन्हें महंगी कीमत चुकाकर इलाज कराना पड़ रहा है।
देहरादून के धर्मपुर क्षेत्र की निवासी वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी शकुंतला नेगी पिछले महीने की 20 तारीख को घर में गिर पड़ीं और उनका पैर टूट गया। परिजनों ने उन्हें सीएमआई अस्पताल की इमरजेंसी में भर्ती कराया। आरोप है कि अस्पताल प्रबंधन ने गोल्डन कार्ड होने के बावजूद सरकारी अस्पताल से रेफर नहीं होने की बात कहकर उन्हें आयुष्मान योजना का लाभ देने से मना कर दिया। अब वह महंगा शुल्क अदा कर ऑपरेशन करा रही हैं। राज्य आंदोलनकारी मंच के जिला अध्यक्ष प्रदीप कुकरेती कहते हैं कि सरकार ने इमरजेंसी में भर्ती होने पर निजी अस्पतालों में इलाज की बात कही है। लेकिन निजी अस्पताल ऐसा नहीं कर रहे हैं। यदि राज्य आंदोलनकारी को आयुष्मान योजना का लाभ नहीं मिलेगा तो आम आदमी को कैसे इलाज मिलेगा।
उत्तराखण्ड सरकार आयुष्मान कार्ड धारकों को निशुल्क चिकित्सा देने के कितने ही दावे कर ले, लेकिन मरीजों का इलाज नहीं हो रहा है। ताजा मामला नैनीताल जिले के हल्द्वानी का है। वहां के सुशीला तिवारी अस्पताल में एक मरीज को बिना इलाज किए ही ले जाना पड़ा। परिजनों ने कुमाऊं के इस सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में इलाज न होने पर रोष प्रकट किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि जब आयुष्मान योजना के गोल्डन कार्ड का सरकारी अस्पताल में इ लाज नहीं हो सकता तो सरकार इसको लेकर वाहवाही क्यों लूट रही है। एक मई को जब पूरा देश मजदूर दिवस मना रहा था तो नैनीताल जिले के हल्द्वानी में एक मजदूर इलाज के अभाव हमें जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा था। मरीज का इलाज न होने की वजह सुशीला तिवारी अस्पताल में न्यूरो सर्जन का न होना बताया गया। जानकारी के अनुसार ऊधमसिंह नगर के आजाद नगर वार्ड नंबर एक निवासी धर्मपाल का आयुष्मान योजना के तहत गोल्डन कार्ड बना हुआ है। पिछले दिनों धर्मपाल सड़क दुर्घटना में घायल हो गए थे। उसके सिर पर चोट आने के साथ ही कूल्हें में फ्रेक्चर हुआ था। कुछ दिनों तक बरेली के एक निजी अस्पताल में इलनाज कराया। लेकिन आर्थिक संकट आने के कारण परिजन उसे लेकर हल्द्वानी चले आए। हल्द्वानी के सभी प्राइवेट अस्पतालों में वह धर्मपाल को लेकर घूमते रहे लेकिन किसी भी अस्पताल ने उसका इलाज नहीं किया। आखिर ये थकहार के वह सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचे जहां कई घरों  के इंतजार के बाद भी उसको उपचार नहीं मिल सका। याद रहे कि निजी अस्तालों में इलाज को लेकर कई बार अधिकारियों ने दिशा निर्देश दिए। यहां तक कि निजी अस्पतालों के प्रबंधकों के साथ इस मामले को लेकर उनकी बैठक भी हुई उसके बाद अधिकारी दावा करते रहे कि आयुष्मान कार्ड धारक किसी भी मरीज का इलाज नहीं करने वाले अस्पतालों के खिलाफ कार्यवाही होगी।
याद रहे कि गत वर्ष मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अटल आयुष्मान उत्तराखण्ड योजना की वेबसाइट एवं ऐप की भी औपचारिक शुरुआत की थी। इस अवसर पर उन्होंने कहा, ‘हमारे शास्त्रों में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया’ की बात कही गई है। राज्य सरकार भी इसी भावना पर काम कर रही है। उत्तराखण्ड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में हम तकनीक का उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं। हमने टेली रेडियोलॉजी, टेली मेडिसिन की सुविधा अनेक दूरस्थ चिकित्सा केंद्रों में प्रारंभ की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना को अपनी इस योजना की प्रेरणा बताते हुए मुख्यमंत्री रावत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति धन के अभाव में इलाज से वंचित न रहे। इसीलिए इस योजना में राज्य के सभी परिवारों को कवर किया गया है और इसमें कैशलैस इलाज का प्रबंध किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि इंश्योरेंस में आने वाली दिक्कतों को देखते हुए योजना को ट्रस्ट मोड में संचालित किया जा रहा है और योजना को बहुत ही सरल बनाया गया है।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने यह भी दावा किया कि इस योजना से 23 लाख परिवार लाभान्वित होंगे और 1350 गंभीर बीमारियों का इसमें उपचार हो सकेगा। 99 सरकारी व 66 निजी चिकित्सा संस्थान इसमें चयनित हैं। उन्होंने एक और घोषणा करते हुए कहा था कि 26 जनवरी 2019 से राज्य में पूरी तरह से समर्पित एयर-एम्बुलेंस सेवा शुरू की जाएगी। लेकिन यह एयर एम्बुलेंस सेवा तो शुरू हुई नहीं, उल्टे सरकार ने उत्तराखण्ड की जीवनदायिनी कहे जाने वाली 108 इमरजेंसी सेवा को भी बंद कर दिया है।
सवाल सिर्फ आयुष्मान योजना का नहीं है, बल्कि 2017 में उत्तराखण्ड में एक महिला की जान चली जाने के बाद मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना को भी बंद किया जा चुका है। इस महिला को देहरादून के हरिद्वार रोड स्थित जगदंबा ट्रामा सेंटर में भर्ती कराया गया था। कुछ समय पहले ही सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने खुद इस ट्रामा सेंटर का उद्घाटन किया था। महिला के परिजनों का आरोप था कि अगर हॉस्पिटल प्रशासन मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना एमएसबीवाई कार्ड को समय से पंच कर लेता, तो उनके मरीज की जान बच जाती। मरीज की मौत के बाद परिजनों के हंगामे को देख डीएम देहरादून ने एसीएमओ डॉ केके सिंह को मामले की जांच सांप दी थी। इसके साथ ही परिजनों ने नेहरू कॉलोनी थाने में हॉस्पिटल प्रबंधन के खिलाफ तहरीर भी दे दी थी।
गौरतलब है कि स्वास्थ्य विभाग खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत संभाल रहे थे। इसलिए इतनी बड़ी योजना जिसमें सीधे तौर पर प्रदेश के लाखों गरीब जुड़े हैं, उसका नवंबर 2017 में यूं बंद हो जाने से सरकार की कार्यप्रणाली पर उंगली उठ रही है। यह योजना बंद होने के बाद अब लोगों का जीवन राम भरोसे ही है, क्योंकि पैसा उनके पास है नहीं और मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना बंद हो चुकी है। सीएम प्रदेश के सूदूरवर्ती इलाकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा देने की बात करते रहे हैं। मगर प्रदेश की राजधानी देहरादून में ही लोगों की पैसे के अभाव में मौत हो जाना अच्छा संकेत नहीं है। 10 नवंबर 2017 को मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत इलाज न मिलने के कारण पटेलनगर इलाके में स्थित ब्रह्मपुरी वार्ड निवासी 60 वर्षीय कमला देवी जान चली गई थी। दरअसल, 60 साल की कमला देवी को 9 नवंबर को हरिद्वार रोड स्थित जगदंबा ट्रॉमा सेंटर में एंबुलेंस 108 की मदद से भर्ती कराया गया था। महिला के पास एमएसबीवाई कार्ड होने के बावजूद जगदंबा ट्रॉमा सेंटर मरीज को भर्ती कराने में आनाकानी करने लगा था। अगले दिन करीब 8 बजे महिला की मौत हो गई। हैरानी की बात यह है कि हॉस्पिटल प्रशासन ने मौत का कारण हार्टअटैक बताया था, जबकि इलाज कर रहे डॉक्टर को पता ही नहीं है कि मौत किस वजह से हुई। मौत के बाद का आलम ये है कि शव को ले जाने के लिए न तो एम्बुलेंस हॉस्पिटल ने दी और न उत्तराखण्ड सरकार की सेवा ने। लिहाजा एक टेम्पो में ही लाश को परिजन अपने घर ले गए थे। तब मुख्यमंत्री की इस मामले में खूब छीछालेदार हुई थी। जिससे परेशान होकर उन्होंने यह योजना ही बंद कर दी थी। असल में यह योजना हरीश रावत सरकार के दौरान शुरू हुई थी और इसे त्रिवेंद्र सरकार द्वारा बंद कर दिया गया।

अटल आयुष्मान योजना में घोटाला

अटल आयुष्मान योजना बहुत जल्द ही घोटाले की भेंट भी चढ़ गई है। इस योजना में वित्तीय अनियमितताओं के पकड़े गए लगभग आधा दर्जन मामलों में 60 लाख रुपए की गड़बड़ी सामने आई है। इन मामलों में योजना के लाभार्थियों को इलाज तो दिया गया, लेकिन रेफर करने के नाम पर चुनिंदा संस्थानों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई। सूत्रों के मुताबिक सरकारी डाक्टरों की मिलीभगत से इस कारनामे को अंजाम दिया गया। अटल आयुष्मान योजना की लॉन्चिंग के पांच माह बाद प्राइवेट चिकित्सा संस्थानों और सरकारी डॉक्टरों की मिलीभगत के मामले सामने आए हैं। सभी मामले ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार जिले के हैं।
ऊधमसिंह नगर जिले में एक सरकारी अस्पताल की महिला विशेषज्ञ डॉक्टर कई दिनों से मरीजों को एक निजी संस्थान में रेफर कर रही थी, जबकि उस संस्थान में कोई महिला विशेषज्ञ चिकित्सक तैनात नहीं थी। पता चला कि सरकारी डॉक्टर शाम को खुद निजी अस्पताल में जाकर सर्जरी करती रही। हरिद्वार में जिले के एक मामले में हायर सेंटर में रेफर करने के नाम पर झबरेड़ा स्थित एक निजी क्लीनिक में मरीजों को रेफर किया जा रहा था। इसी तरह पकड़ में आए एक अन्य मामले में सरकारी विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज को इलाज के लिए जिस क्लीनिक में रेफर कर रहा था, वहां वो खुद इलाज करता था, जिससे क्लीनिक को मोटे बिल का भुगतान हो रहा था। इस तरह की गड़बड़ी वाले कुल 60 लाख रुपए के मामले सामने आए हैं। फिलहाल स्वास्थ्य विभाग ने इसकी रिपोर्ट स्वास्थ्य सचिव नीतेश झा को भेज दी है। सचिव ने सभी मामलों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं। इन प्रकरणों में निजी संस्थानों पर रिकवरी की कार्रवाई के साथ सरकारी डॉक्टरों पर भी गाज गिरना तय है।

बात अपनी-अपनी

आयुष्मान योजना सिर्फ एक चुनावी शिगूफा था। इससे प्रदेश के लोगों को फायदा कम नुकसान ज्यादा हो रहा है। हमारे पास अब तक दस मामले इस योजना से संबंधित आ चुके हैं। जिनमें अस्पतालों ने मरीजों को बिना इलाज किए ही बैरंग लौटा दिया है। इनमें कई लोगों की मौत हो गई है। यह योजना डबल इंजन की सरकार ने शुरू तो कर दी, लेकिन उसके लिए फंड जारी नहीं किया जा रहा है। कई अस्पतालों ने गोल्डन कार्ड के मरीजों को यह कहकर लौटाया है कि उनके कार्ड में पैसे नहीं हैं। मेरे कार्यकाल में भी स्वास्थ्य की योजना शुरू की गई थी जो अच्छी चल रही थी। लेकिन उसको सरकार ने इसलिए बंद कर दिया कि उसमें कांग्रेस सरकार की तारीफ हो रही थी। प्रदेश सरकार आयुष्मान योजना के नाम पर लोगों की जान के साथ खिलवाड़ कर रही है।
हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री
अटल आयुष्मान योजना के लिए साल भर में 400 करोड़ के करीब खर्च होने का अनुमान है। सरकार ने बजट में 150 करोड़ दिए हैं। कर्मियों का प्रीमियम केंद्राश मिलाकर यह राशि 400 करोड़ से ऊपर पहुंच रही है। ऐसे में इस योजना को चलाने के लिए पैसे की कमी आड़े आ रही है। फिलहाल हमने उन सभी अस्पतालों की सूची जारी कर दी है जहां- जहां पैनल हैं। इन अस्पतालों में अगर कोई डॉक्टर इलाज नहीं करता है तो उस पर कार्यवाही की जाएगी।
डीके कोटिया, चेयरमैन अटल आयुष्मान योजना
भाजपा सरकार की यह योजना एक फ्लॉप शो साबित हो रही है। इस योजना को केंद्र ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर जारी किया था। इस योजना के जरिए भाजपा का मकसद सिर्फ गरीब लोगों के वोट पाना था। यह योजना भी जुमला ही साबित होगी।
तिलकराज बेहड़, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री

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