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खतरे में प्रचंड का ताज

नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक संकट पैदा हो गया है। एक ओर जहां प्रधानमंत्री पुष्प कमल प्रचंड की सरकार अल्पमत में आ गई है वहीं अपनी सियासी पलटियों से राजनीतिक दलों को झटका देने में माहिर पुष्प कमल दहल को देश के सुप्रीम कोर्ट ने चिंता में डाल दिया है। कोर्ट ने दहल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के खिलाफ दो याचिकाएं रजिस्टर करने का निर्देश दिया है। इन याचिकाओं में पार्टी के साथ-साथ दहल को भी अभियुक्त बनाया गया है 

मौजूदा समय में दुनिया के कई देश आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में भारत के सहयोगी भूटान और बांग्लादेश के अलावा एशिया के अधिकांश देशों के आर्थिक हालात बिगड़ रहे हैं और इससे राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है। नेपाल के हालात भी ठीक नहीं हैं। वर्ष 2008 को नवनिर्वाचित संविधान सभा ने नेपाल को एक संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया था। लेकिन हालात ये हैं कि तब से 11 अलग-अलग सरकारें बन चुकी हैं। ताजा घटनाक्रम की बात करें तो नेपाल में एक बार फिर राजनीतिक संकट पैदा हो गया है। एक ओर जहां प्रधानमंत्री पुष्प कमल प्रचंड की सरकार अल्पमत में आ गई है वहीं अपनी सियासी पलटियों से राजनीतिक दलों को झटका देने माहिर पुष्प कमल दहल को देश के सुप्रीम कोर्ट ने चिंता में डाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दहल की कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) के खिलाफ दो याचिकाएं रजिस्टर करने का निर्देश दिया है। इन याचिकाओं में पार्टी के साथ-साथ दहल को भी अभियुक्त बनाया गया है। मामला देश में चले गृह युद्ध के समय का है। कोर्ट ने गृह युद्ध के दौरान हुई लगभग पांच हजार मौतों के लिए दहल और माओइस्ट सेंटर की जवाबदेह ठहराने की दो वकीलों की याचिका को रजिस्टर करने का निर्देश कोर्ट प्रशासन को दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की इस कार्रवाई से माओइस्ट सेंटर में बेचैनी और घबराहट दोनों देखी जा रही है। पार्टी महासचिव देव गुरुंग ने इस बारे में एक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि माओइस्ट सेंटर ऐसी हर गतिविधि की कड़ी निंदा करती है, जो संविधान के विरुद्ध हो। साथ ही वह विभिन्न राजनीतिक आंदोलनों के जरिए हासिल प्रगतिशील उपलब्धियों के खिलाफ होने वाली गतिविधियों की भी निंदा करती है। दोनों याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि दहल उन हत्याओं के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार थे, इसलिए उनके खिलाफ जरूरी कानूनी कार्यवाही शुरू की जानी चाहिए। एक याचिका में गुजारिश की गई है कि माओवादी विद्रोह के दौरान हुई सभी 17 हजार हत्याओं के लिए दहल को दोषी ठहराया जाए। एक अन्य याचिका में पांच हजार मौतों के लिए उन्हें दोषी ठहराने की दलील दी गई है।

जनवरी 2020 में माघी त्योहार के दिन हुए एक समारोह में दहल ने कहा था कि माओवादी पार्टी के नेता के तौर पर वे पांच हजार मौतों की जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे। बाकी मौतों की जिम्मेदारी सरकार पर डाली जानी चाहिए। नेपाल में दहल के नेतृत्व में एक दशक तक माओवादी विद्रोह चला था। उस दौरान ये सभी मौतें हुई थीं। अब तक यह मामला सत्य और मेलमिलाप आयोग के दायरे में था। अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने अपने दायरे में ले लिया है।

दूसरी तरफ संसद में नेपाल के दूसरे सबसे बड़े राजनीतिक दल सीपीएन-यूएमएल ने बीते दिनों प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार से अपना समर्थन वापस लेने से सरकार अल्पमत में आ गई है। यह फैसला राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उभरे मतभेद के बाद लिया गया। इसके बाद नेपाल में एक बार फिर से सत्ता संकट साफ दिखाई दे रहा है। नेपाल की 275 सदस्यीय संसद में यूएमएल 79 सांसद हैं।  नेपाल में सीपीएन (माओवादी सेंटर) सीपीएन (यूनिफाइड सोशलिस्ट) और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के क्रमशः 32, 10 और 20 सदस्य हैं।

गौरतलब है कि नेपाल में एक ही चीज स्थिर है और वो है देश की राजनीतिक अस्थिरता। पिछले आठ वर्षों में जनता कई प्रधानमंत्री देख चुकी है। बीते दिसंबर पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ की नई सरकार बनने के साथ ही सबके मन में एक सवाल था कि क्या एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़कर संसद में पहुंचीं पार्टियां साथ मिलकर सरकार चला पाएंगी? उत्तर मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। राष्ट्रपति चुनाव ने सीधे और सरल ढंग से सरकार बदलने का ये मौका मुहैया करा दिया, वरना यही काम कुछ दिन बाद शायद ज्यादा कटुता के साथ होता। मौजूदा राष्ट्रपति विद्या भंडारी का कार्यकाल पूरा होने वाला है। पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली द्वारा जिस तरह आम चुनाव से डेढ़ साल पहले नेपाली लोकतंत्र का तमाशा बनाया गया था उसमें एक बड़ी भूमिका विद्या भंडारी की भी रही । ऐसे में राष्ट्रपति पद एक बार और ओली की ही मर्जी पर छोड़ना किसे मंजूर होता?

अभी नेपाल में नई सरकार को बने करीबन दो माह ही हुए हैं कि वहां के सत्तारूढ़ गठबंधन की सियासी उठापटक शुरू हो गई। ये उठापटक दो कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच हुई है। नेपाल में ये दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां राज कर चुकी हैं। पिछले चुनाव में नेपाली कांग्रेस को 89 सीटें हासिल हुई थी। जबकि पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ की कम्युनिस्ट पार्टी को सिर्फ 32 और के.पी. ओली की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 78 सीटें मिली थी।

 इन दोनों मुख्य कम्युनिस्ट पार्टियों ने कुछ और छोटी-मोटी पार्टियों को अपने साथ जोड़कर भानुमती का कुनबा जोड़ लिया। लेकिन शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस केवल ताकती ही रह गई। लेकिन पिछले दो माह में ही दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों में इतना तनाव हो गया कि प्रधानमंत्री प्रचंड द्वारा नेपाली कांग्रेस के साथ हाथ मिला लिया गया और अब राष्ट्रपति पद के लिए ओली की पार्टी को दरकिनार करके उन्होंने नेपाली कांग्रेस के नेता रामचंद्र पौडेल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दिया है। जिसके कारण नेपाल की राजनीति में मानों भूचाल की स्थिति पैदा हो गई है।

 नेपाली कांग्रेस के नेता रामचंद्र पौडेल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने पर ओली क्रोधित हो गए और उन्होंने दावा किया कि प्रचंड अपने वादे से मुकर रहे हैं। इसलिए वे सरकार से अलग हो रहे हैं। उनके उप प्रधानमंत्री सहित आठ मंत्रियों द्वारा इस कड़ी में इस्तीफा दे दिया गया है। इन इस्तीफों के बाद भी प्रचंड की सरकार के गिरने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है, क्योंकि अभी भी नए गठबंधन को संसद में बहुमत प्राप्त है। नेपाली संसद में इस समय प्रचंड के साथ 141 सांसद हैं जबकि सरकार में बने रहने के लिए उन्हें कुल 138 सदस्यों की आवश्यकता है। केवल तीन सदस्यों के बहुमत से यह सरकार कितने दिन चलेगी? अन्य लगभग आधा दर्जन पार्टियां इस गठबंधन से कब खिसक जाएगी, कुछ पता नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव 9 मार्च को निर्धारित हैं। अगले एक हफ्ते में कोई भी पार्टी किसी भी गठबंधन में आ-जा सकती है। नेपाल की इस उठापटक में भारत की भूमिका ज्यादा गहरी नहीं है, क्योंकि दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां कभी पूरी तरह भारत-विरोधी रही हैं।

 इस उथल पुथल के दौरान अब प्रचंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती सदन में अपना बहुमत साबित करना और विश्वास मत पाना है। विश्लेषकों का कहना है कि ओली की पार्टी के समर्थन वापिस लेने के बावजूद प्रचंड के नेतृत्व वाली सरकार को कोई परेशानी नहीं होगी। क्योंकि 275 सदस्यीय नेपाली संसद में यूएमएल के 79 सांसद मौजूद हैं। नेपाल की संसद में सर्वाधिक सीटें 89 नेपाली कांग्रेस के पास हैं। प्रचंड को सरकार बनाए रखने के लिए 138 सांसदों का समर्थन चाहिए। छोटे-छोटे दलों का समर्थन पाकर प्रचंड के पास काफी समर्थन नजर आता है।

 राजनीतिक उथल-पुथल के समय स्थिति क्या करवट लेती है, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है? जनता समाजवादी पार्टी, जनता पार्टी, प्रजातांत्रिक समाजवादी पार्टी और सीपीएन यूनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी और अन्य छोटे दलों के बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि वह प्रचंड का समर्थन करेंगी या नहीं। प्रचंड द्वारा  के.पी. शर्मा ओली की सरकार से समर्थन वापस लेकर उनकी सरकार गिरा दी गई थी और नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन कर शेर बहादुर देउबा को प्रधानमंत्री बनाया गया था। नए चुनावों के बाद प्रचंड की प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने जोर पकड़ा और उन्होंने नेपाली कांग्रेस से गठबंधन तोड़ते हुए ओली से हाथ मिला लिया। के.पी. शर्मा ओली ने चीन की गोद में बैठकर भारत को बहुत परेशान करना शुरू कर दिया था और उनके कार्यकाल में नेपाल में चीन का दखल काफी बढ़ गया था। यह नेपाल की विडंबना है कि माओवादी क्रांति के बाद आज तक वहां स्थिरता स्थापित नहीं हो सकी है।

 90 के दशक में माओवादियों ने नेपाल में लोकतंत्र कायम करने और एक नए संविधान की मांग करते हुए हथियार उठा लिए थे। 10 साल तक चले इस गृहयुद्ध का अंत 2006 में एक शांति समझौते के जरिए हो सका। इसके दो साल बाद नेपाल में संविधान सभा के चुनाव हुए जिसमें माओवादियों को जीत मिली। साथ ही 240 साल पुरानी राजशाही ध्वस्त हो गई।  मगर मतभेदों की वजह से संविधान सभा नया संविधान बनाने में असफल रही। जिसके चलते कार्यकाल को कई बार विस्तार देना पड़ा। आखिरकार 2015 में एक संविधान को स्वीकृति मिल गई। नेपाल में लोकतंत्र बहाल तो हो गया पर उसमें लगातार अस्थिरता बनी रही। नेपाल में संसद बहाल होने के बाद से अब तक दस प्रधानमंत्री हुए हैं। स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं है।

चीन केपी शर्मा ओली को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है क्योंकि उनके इशारे पर ओली ने नेपाल का नया नक्शा जारी कर भारत के साथ सीमा विवाद को बढ़ाने का काम किया। हालांकि प्रचंड भी कम्युनिस्ट हैं, लेकिन अब वे भारत और चीन को संतुलित कर रहे हैं। भारत के लिए नेपाल महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां चीन का प्रभाव बढ़ रहा है। अगर नेपाल के राजनीतिक परिदृश्य में चीन का दखल बढ़ता है तो यह भारत के लिए शुभ नहीं होगा। पिछले तीन दशकों में नेपाल में कई राजनीतिक और सामाजिक उतार-चढ़ाव आए हैं, लेकिन जो नहीं बदला है वह पारंपरिक राजनीतिक दलों का नेतृत्व है।

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