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बंगाल BJP में दो ध्रुवों के बीच शक्ति परीक्षण: कौन भारी,घोष या अधिकारी?

पश्चिम बंगाल में तमाम प्रयासों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी सत्ता के केंद्र में स्थापित नहीं हो पाई । हालांकि वह विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित जीत से उत्साहित है। लेकिन सत्ता हाथ में न आने से हतोत्साहित भी हुई है ।
इस दौरान भाजपा ने 3 विधानसभा सीटों से बढ़कर 74 सीटों का रिकॉर्ड बनाया है। इस रिकॉर्ड को वह आगे कायम रख पाएगी या नहीं यह सोचनीय है। क्योंकि जिन नेताओं को भाजपा टीएमसी से लेकर आई थी वह टीएमसी में वापस जाने लगे हैं। मुकुल राय इसका उदाहरण है।
 भाजपा ने मुकुल राय को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर बड़ा ओहदा दिया था। इसी के साथ ही राय बीजेपी के चुनाव चिन्ह पर बंगाल विधानसभा पहुंचे। लेकिन उनका भाजपा प्रेम 1 माह से ज्यादा नहीं टिक पाया।
 मुकुल राय के भाजपा में जाने के साथ ही कई और विधायकों की तरफ भी शक की सुई हो रही है। कल जब शुभेंदु अधिकारी भाजपा के सभी विधायकों को लेकर राज्यपाल के समक्ष गए तो उनमें 24 विधायक कम थे। भाजपा के 74 विधायकों में से सिर्फ 50 विधायक ही राज्यपाल के समक्ष उपस्थित हो पाए । अब कयासों का दौर शुरू हो गया है। कहा जाने लगा है कि 24 विधायक के अनुपस्थिति का कारण वह भाजपा से नाराज है और कभी भी घर वापसी यानी कि टीएमसी में जा सकते हैं ।
इस दौरान भाजपा एक दूसरे अंतर्द्वंद से भी जूझ रही है। वह है इस पार्टी के दो छत्रपो में आपसी लड़ाई। यह लड़ाई इस बात को लेकर है कि पार्टी में फिलहाल किस का कद बडा है। शुभेंदु अधिकारी का या भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष का।
 दोनों ही फिलहाल शक्ति परीक्षण के जरिए अपने आप को मजबूत दिखाने में जुटे हैं। दिलीप घोष अपने आप को संगठन का नेता मानते हैं।  जबकि शुभेंदु अधिकारी कभी बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खास हुआ करते थे। लेकिन भाजपा ने अधिकारी पर दांव चला और अपनी पार्टी में ले लिया । यही नहीं बल्कि नंदीग्राम विधानसभा से ममता बनर्जी को शुभेंदु अधिकारों के हाथों हरवा दिया ।
इससे सुभेदू अधिकारी मजबूत हुए। लेकिन दूसरी तरफ दिलीप घोष अपने आप को कमजोर समझने लगे। कमजोर तो दिलीप घोष उसी दिन हो गए थे जब केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल में विधानसभा चुनाव में अपनी सक्रियता की थी।  एक तरह से कहा जाए तो बंगाल में शीर्ष नेतृत्व ने ही चुनाव लड़ाया।
दिलीप घोष मौजूदा समय में भाजपा के सांसद और प्रदेश के मुखिया है तो दूसरी तरफ शुभेंदु अधिकारी बड़े नेता के तौर पर भाजपा में स्थापित हो रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच अपने आप को भाजपा का चेहरा बनाने की कवायद चल रही है । देखना यह होगा कि दोनों में से कौन बाजी मारता है

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