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उत्तराखंड के लोकप्रिय लोक गायक हीरा सिंह राणा का दिल्ली में निधन

उत्तराखंड के लोकप्रिय लोकगायक हीरा सिंह राणा का दिल्ली में निधन

उत्तराखंड के लिए एक बेहद दुखद खबर सामने आई है। दिल्ली सरकार में गढ़वाली, कुमाऊंनी, जौनसारी भाषा अकादमी के उपाध्यक्ष उत्तराखंड के महान लोक गायक हीरा सिंह राणा के निधन हो गया है। 77 वर्षीय राणा जी का अपने विनोदनगर, दिल्ली स्थित आवास में कल देर रात करीब 2:30 बजे अचानक दिल का दौरा पढ़ने से स्वर्गवास हो गया है। उनकी मौत का कारण हृदय गति रूकना बताया जा रहा है। उनके निधन से उत्तराखंड कला जगत शोक में डूब गया है। हीरा सिंह राणा के जाने से उत्तराखंड कला जगत को बड़ा झटका लगा है।

राणा जी का जन्म 16 सितंबर 1942 को अल्मोड़ा जिले के मनिला में डढोली गांव में हुआ था। 2019 में सुप्रसिद्ध लोकगायक व जनकवि हीरा सिंह राणा को कुमांउनी, गढ़वाली व जौनसारी भाषा अकादमी का पहला उपाध्यक्ष बनाऐ जाने की घोषणा की थी। माह फरवरी 2020 मे भारत सरकार संगीत नाटक अकादमी ने उन्हे अकादमी सलाहकार नियुक्त किया था। निधन की खबर सुन दिल्ली प्रवास मे निवासरत उत्तराखंडियों व विभिन्न नगरों व उत्तराखंड मे बसे उत्तराखंडी जनमानस के बीच चंद घंटों मे ही निधन की खबर पहुचते ही दुःख की लहर छा गई है।

उत्तराखंड के लोकप्रिय लोकगायक हीरा सिंह राणा का दिल्ली में निधन

महज 15 साल की उम्र से पहाड़ की संस्कृति से जुड़कर लोक गीतों की रचना करने वाले हीरा सिंह राणा का नाम उत्तराँखण्ड के प्रमुख गायक कलाकारो में प्रथम पंक्ति में आता है। उन्हें लोग हीरदा कुमाऊनी के नाम से भी पुकारते हैं। हीरदा ने रामलीला, पारंपरिक लोक उत्सव, वैवाहिक कार्यक्रम से अपने गायन का सफ़र शुरू किया और बाद में आकाशवाणी नजीबाबाद, दिल्ली, लखनऊ ही नहीं अपितु देश-विदेश में भी अपनी बेहद सुरीली आवाज में पहाड़ी लोक गीतों की धाक जमाई है।

हीरा सिंह राणा ने दिल्ली में सेल्समैन की नौकरी की। लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और इस नौकरी को छोड़कर वह संगीत की स्कालरशिप लेकर कलकत्ता चले गए और संगीत के संसार में पहुँच गए। इसके बाद हीरा सिंह राणा ने उत्तराखंड के कलाकारों का दल नवयुवक केंद्र ताड़ीखेत 1974, हिमांगन कला संगम दिल्ली 1992, पहले ज्योली बुरुंश (1971), मानिला डांडी 1985, मनख्यु पड़यौव में 1987, के साथ उत्तराखण्ड के लोक संगीत के लिए काम किया। इस बीच राणा जी ने कुमाउनी लोक गीतों के 6- कैसेट ‘रंगीली बिंदी, रंगदार मुखड़ी’, सौमनो की चोरा, ढाई विसी बरस हाई कमाला’, ‘आहा रे ज़माना’ भी निकाले। राणा जी ने कुमाँउ संगीत को नई दिशा दी और ऊचाँई पर पहुँचाया। राणा ने ऐसे गाने बनाये जो उत्तराखण्ड की संस्कृति और रिती रीवाज को बखुबी दर्शाते हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लोकगायक के अकस्मात निधन को उत्तराखंड की अपूर्णनीय क्षति बताते हुए कहा कि ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तिव बिरले ही होते हैं जो कला के माधयम से समाज में अपनी पहचान बनाते हुए समाज को दिशा देने में सक्षम होते हैं, उन्होंने दिवंगत आत्मा की शांति की कामना करते हुए परिवार को दुःख सहने की कामना प्रभु से की है।

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