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प्रीतम के बहाने इंदिरा पर निशाना

प्रीतम के बहाने इंदिरा पर निशाना

त्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी अपने नए अध्यक्ष बंशीधर भगत के स्वागत में व्यस्त है। दूसरी तरफ कांग्रेस के बयानवीर अपने बयानों से पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। ढाई वर्षों के लंबे इंतजार के बाद प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह की नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा क्या हुई कि एक नया जिन्न बाहर निकल गया। प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा के साथ ही असहमति, असंतोष के स्वर उभरने लगे। बयानों के साथ तीर छोड़ने का सिलसिला शुरू हो गया।

खास बात यह कि इसमें निशाना प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह की जगह नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश हैं और निशाना साधने वाले हैं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के शिष्य धारचूला से विधायक हरीश धामी। संतुलन साधने को नीयत से बनी जम्बो प्रदेश कार्यकारिणी भी कांग्रेस नेताओं को संतुष्ट नहीं कर पाई है। 152 पदाधिकारियों और 90 विशेष आमंत्रित सदस्यों के साथ 242 सदस्यों वाली कार्यकारिणी में सभी गुटों को स्थान देने के बावजूद संतुलन साधने की कोशिश पूरी तरह फेल हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस की कार्यकारिणी 51 सदस्यों की है। बताया जाता है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के निर्देश पर कार्यकारिणी छोटी रखी गई है। कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि उत्तराखण्ड में प्रीतम सिंह भी छोटी कार्यकारिणी के पक्ष में थे, परंतु सभी नेताओं के समर्थकों को समायोजित करने की कवायद ने कार्यकारिणी को भारी भरकम बना दिया। पार्टी कार्यकारिणी की घोषणा होते ही सबसे पहले बगावत के सुर हरीश रावत कैंप से उभरे हैं।

चारधूला से विधायक हरीश धामी खुद को प्रदेश सचिव बनाने से नाराज हैं। उन्होंने सूची जारी होते ही सचिव पद को अपनी गरिमा के विपरीत बताकर इस्तीफे का ऐलान करते हुए कांग्रेस छोड़ने तक की बात कर डाली। हालांकि पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव प्रकाश जोशी भी नई टीम से संतुष्ट नहीं हैं। उनके दो करीबियों संजय किरौला और दीप सती को इस टीम में बतौर सचिव जगह दी गई लेकिन दोनों ने ही पद लेने से इंकार कर दिया है।

पार्टी सूत्र बताते हैं कि सचिव पद पर इनकी पैरवी प्रकाश जोशी ने ही की थी। बताया जाता है कि इन दोनों का गुस्सा स्वयं को सचिव बनाने से कम, कभी बागी होकर कालाढूंगी विधानसभा का चुनाव लड़े महेश शर्मा को महामंत्री बनाने पर ज्यादा है। खास बात ये है कि जहां प्रकाश जोशी खुलकर सामने नहीं आ रहे, हरीश धामी का आक्रोश प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के प्रति कम नेता प्रतिपक्ष डॉ इंदिरा हृदयेश के प्रति ज्यादा दिखा।

उन्होंने इंदिरा हृदयेश पर कई आरोप मढ़ते हुए उन्हें नेता प्रतिपक्ष पद से हटवाने की बात तक कर डाली। प्रदेश सचिव के पद पर अपनी नियुक्ति पर उनका प्रीतम सिंह के प्रति नरम व इंदिरा हृदयेश के प्रति गरम रवैया कई शंकाओं को जन्म देता है। कायदे से धामी को संगठन के मुखिया के नाते प्रीतम सिंह से शिकायत होनी चाहिए थे। ‘दि संडे पोस्ट’ से बातचीत में प्रदेशाध्यक्ष प्रीतम सिंह का कहना था कि विधायक होने के नाते हरीश धामी का नाम विशेष आमंत्रित की सूची में 16वें नंबर पर था।

वही सूची संगठन महासचिव वेणुगोपाल को भेजी गई थी और वहीं से सूची जारी हुई। वहां इस सूची में कैसे फेरबदल हुआ, ये उनकी समझ से बाहर है। हरीश धामी का नाम सचिव के रूप में क्यों और किसने शामिल करवाया इस पर कांग्रेस के बड़े नेता बोलने से बच रहे हैं, लेकिन सूत्रों की माने तो हरीश धामी का नाम हरीश रावत ने सचिव के रूप में डलवाया। जब प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदयेश से इस संबंध में पूछा गया तो उन्होंने इस पर अपनी अनभिज्ञता जाहिर की।

लेकिन सवाल है कि हरीश धामी का प्रदेश सचिव के रूप में नाम सामने आना और उनका संगठन के मुखिया प्रीतम सिंह के बजाए नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश पर हमला करना क्या किसी रणनीति का हिस्सा है या पुराने मतभेदों का रणनीतिक बदला लेने की कवायद? हालांकि हरीश रावत इस विषय पर खामोश हैं और इंदिरा हृदयेश इसे हरीश-इंदिरा की लड़ाई के रूप में नहीं देखती हैं, लेकिन हरीश धामी का इंदिरा हृदयेश पर प्रत्यक्ष हमला 2022 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस के अंदर की उठापटक की ओर इशारा करता है।

इंदिरा हृदयेश का प्रीतम सिंह के साथ मजबूती से खड़े रहना और उनकी आक्रामक शैली पार्टी के अदंर बहुतों को रास नहीं आती है। कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि जिन तेवरों के साथ इंदिरा-प्रीतम की जोड़ी काम कर रही है उससे हरीश रावत खेमे में भारी हलचल है। यही कारण है कि इंदिरा पर निशाना साध प्रीतम को अप्रत्यक्ष रूप से टारगेट में रखा जा रहा है। संगठन के एक नवनियुक्त पदाधिकारी कहते हैं कि नेता प्रतिपक्ष को हटाने की बात करने वाले जब विधायकों के समर्थन की बात करते हैं तो उन्हें ये भी याद करना चाहिए कि विजय बहुगुणा और हरीश रावत के मुख्यमंत्री पद पर चयन के समय निर्णय विशुद्ध रूप से पार्टी हाईकमान का था।  नेता प्रतिपक्ष के चयन में भी इसी प्रक्रिया को अपनाया गया था।

अगर पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो कांग्रेस में आरोप-प्रत्यारोप कोई नए नहीं हैं। बदलते समय के साथ शक्तिशाली होते नेताओं की भूमिका बदल जाती है। जैसे कभी हरीश रावत शक्तिशाली थे आज प्रीतम-इंदिरा की जोड़ी हरीश रावत पर भारी है। रावत-इंदिरा के बीच दशकों की रार के चलते ही कांग्रेस संगठन धरातल से दूर हाता जा रहा है। कुल मिलाकर कांग्रेस की नई प्रदेश कार्यकारिणी गठित होने के बाद जिस प्रकार बवाल मचा है, वो मिशन 2022 के लिए कतई शुभ संकेत नहीं है। संभव है कि घात- प्रतिघात षड्यंत्र के ऐसे किस्से आगे भी चलते रहेंगे भले ही भविष्य में कांग्रेस किस्सों में भी न रहे।

 

फिर रावत पर दांव!

 

उत्तराखण्ड कांग्रेस में दिनों दिन बढ़ रहे तनाव का असर दिल्ली में भी देखने को मिल रहा है। पार्टी आलाकमान हालांकि दिल्ली विधानसभा चुनाव के चलते उत्तराखण्ड के मामले में अभी तक हस्तक्षेप नहीं कर पाया है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अनौपचारिक तौर पर कई वरिष्ठ कांग्रेसियों से उत्तराखण्ड कांग्रेस की बाबत सलाह-मशविरा कर चुकी हैं। राज्य में 2022 की शुरुआत में चुनाव होने हैं।

कांग्रेस का फोकस 2020 में बिहार, 2021 में असम, पुडुचेरी और केरल में तो 2022 में उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, गोवा, हिमाचल, मणिपुर, गुजरात और पंजाब पर है। इन्हीं के साथ होने जा रहे तीन अन्य राज्यों के चुनाव में कांग्रेस का लक्ष्य सम्मानजक सीटें पाना मात्र है। ये राज्य हैं दिल्ली, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु। दिल्ली में तो कांग्रेस ने मैदान पूरी तरह आप के लिए छोड़ दिया है। ताकि भाजपा को सेक्युलर वोटों के बंटने का लाभ न मिल सके। 2021 में एनआरसी और सीएए के सहारे कांग्रेस असम में वापसी के लिए अभी से कमर कस चुकी है।

पुडुचेरी में पार्टी को दोबारा सत्ता पाने की आस है तो केरल में भी कम्युनिष्ट सरकार के खिलाफ पार्टी तीखे तेवरों के साथ मैदान में है। उत्तराखण्ड को लेकर जहां एक तरफ पार्टी को सत्ता वापसी की पूरी उम्मीद है, वहीं कांग्रेस संगठन की गुटबाजी उसकी चिंता दिनों दिन बढ़ा रही है। ऐसे में बताया जा रहा है सोनिया गांधी ने पार्टी की प्रदेश प्रभारी रह चुकीं अंबिका सोनी, पूर्व संगठन महासचिव अशोक गहलोत, राजबब्बर समेत उत्तराखण्ड से जुड़े रहे कांग्रेस नेताओं संग बातचीत का दौर शुरू कर दिया है।

पार्टी सूत्रों की मानें तो वर्तमान में नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश को हटाए जाने की बड़ी मुहिम इन दिनों दिल्ली में चलाई जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह से पार्टी की कमान लेने के बजाए उनकी मुख्य रणनीतिकार इंदिरा हृदयेश पर निशाना साध एक तीर से दो शिकार करने की कवायद यदि परवान चढ़ी तो इंदिरा हृदयेश को दिल्ली चुनाव के बाद कभी भी नेता प्रतिपक्ष से हटाया जा सकता है।

जानकारों का दावा है कि यदि ऐसा हुआ तो पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद कुंजवाल को नेता प्रतिपक्ष बनाया जाएगा। हालांकि कांग्रेस विधायक दल में रानीखेत के विधायक करण माहरा समर्थक ज्यादा हैं, लेकिन वरिष्ठता के आधार पर कुंजवाल का पलड़ा भारी है। क्षेत्रगत् संतुलन की नीयत से प्रीतम सिंह को अध्यक्ष बनाए रखा जाएगा लेकिन हरियाणा और दिल्ली की तर्ज पर चुनाव समिति की कमान हरीश रावत के हवाले की जाएगी।

चर्चा है कि प्रीतम सिंह के साथ एक ब्राह्मण नेता को कार्यकारी अध्यक्ष बना जातिगत समीकरण का संतुलन किया जाएगा। सूत्रों का यह भी दावा है कि राज्य की प्रभारी रह चुकीं वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अंबिका सोनी को नया प्रभारी और डॉ ़ इंदिरा हृदयेश को केंद्रीय कार्य समिति में शामिल कर सोनिया गांधी ­­­प्रदेश संगठन को चुनावी मैदान में एकजुट करने का निर्णय कभी भी ले सकती हैं। इस बीच असम के नए प्रभारी की तलाश भी शुरू होने के समाचार हैं। वर्तमान में पार्टी महासचिव हरीश रावत राज्य के प्रभारी हैं।

 

बात अपनी-अपनी

प्रदेश द्वारा भेजी गई सूची में हरीश धामी का नाम विशेष आमंत्रित सदस्यों में शामिल था, लेकिन दिल्ली के स्तर पर इसमें क्यों और किसके कहने पर परिवर्तन हुआ, इस बारे में हम केंद्रीय नेतृत्व से बात करेंगे।

प्रीतम सिंह, प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस

सूची को लेकर जो भी असंतोष है ये परिवार के भीतर का मामला है। मिल-बैठकर इसे निपटा लिया जाएगा।

डॉ. इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष

लेख: संजय स्वार

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