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चाचा के पदचिन्हों पर भतीजा

एनसीपी में अजित पवार और कई विधायकों की बगावत ने पार्टी की बुनियाद हिलाकर रख दी है। एनसीपी नेता अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो चुके हैं। अजित के समर्थन में 53 में से करीब 32 विधायक हैं। महाराष्ट्र के इतिहास पर नजर डालें तो इस तरह की बगावत नई नहीं है। जहां एक साल पहले ऐसा ही शिवसेना के साथ हुआ तो करीब पांच दशक पहले शरद पवार भी कुछ ऐसा ही करके मुख्यमंत्री बन चुके हैं। इस सियासी घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अजित पवार भी चाचा के पदचिन्हों पर चल रहे हैं

महाराष्ट्र की सियासत में गत सप्ताह एक बार फिर से सियासी भूचाल आ गया है। एनसीपी में अजित पवार और आठ विधायकों की बगावत ने पार्टी की बुनियाद हिलाकर रख दी है। एनसीपी नेता अजित पवार अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो चुके हैं। अजित ने एनसीपी के 53 में से 40 विधायकों के समर्थन का दावा किया है। हालांकि केवल 8 विधायकों ने ही उनके साथ एकनाथ शिंदे सरकार में शपथ ली है। लेकिन अब उनके समर्थन में करीब 32 विधायक बताए जा रहे हैं। वहीं शरद पवार के पक्ष में केवल 16 ही विधायक हैं। जबकि कुछ विधायक किसी भी गुट की बैठक में शामिल नहीं हुए। कुछ रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि अजित पवार ने इसे लेकर राज्यपाल को एक पत्र लिखा है। इसमें 40 से ज्यादा विधायकों के समर्थन और उनके हस्ताक्षर हैं। लेकिन इस दावे को लेकर भी कई विधायकों ने आरोप लगाया है कि उनसे अनजाने में हस्ताक्षर कराया गया।

अगर महाराष्ट्र के इतिहास पर नजर डालें तो इस तरह की बगावत नई नहीं है। जहां एक साल पहले ऐसा ही शिवसेना के साथ हुआ तो करीब पांच दशक पहले शरद पवार भी कुछ ऐसा ही करके मुख्यमंत्री बन चुके हैं। ऐसी स्थिति में राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अजित पवार भी चाचा के पदचिन्हों पर चल रहे हैं। इसका उदाहरण है जब आपातकाल के बाद कांग्रेस पार्टी दो गुटों में बंट गई थी। एक का नाम कांग्रेस (आई) और दूसरी का कांग्रेस (यू) पड़ा। शरद पवार कांग्रेस यू में शामिल थे। 1978 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का बड़ा नुकसान हुआ क्योंकि वह दो गुटों में बंटी थी और दोनों ही अलग-अलग चुनाव लड़ रही थी। ऐसे में जनता पार्टी को जबरदस्त फायदा मिला और 288 में से इसे 99 सीटों पर जीत मिली। हालांकि वह भी बहुमत के आंकड़े से बहुत दूर थी।

जनता पार्टी को रोकने के लिए कांग्रेस नेताओं ने योजना बनाई और दिल्ली पहुंच गए। यहां पीएम इंदिरा गांधी की सहमति से ही कांग्रेस और इंदिरा कांग्रेस की सरकार बनाने पर बात बनी। नई सरकार ने 7 मार्च 1978 को शपथ ली और वसंतदादा पाटिल सीएम बने। सरकार बन तो गई, लेकिन इंदिरा कांग्रेस के नाशिकराव, जो कि डिप्टी सीएम भी थे, लगातार अड़ंगेबाजी कर रहे थे। शरद पवार इस सरकार में उद्योग मंत्री थे और उन्हें नाशिकराव का रवैया बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। बाद में उन्होंने इसका फायदा उठाकर 40 विधायकों के साथ बगावत कर दी। इसके बाद 40 विधायकों को लेकर जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने का एलान कर दिया।

इसके बाद शरद पवार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वह उस वक्त 38 साल के थे। बाद में जनता पार्टी में भी फूट पड़ गई और इंदिरा गांधी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर शरद पवार की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। यह सरकार डेढ़ साल ही चल सकी। इसके बाद 1986 में राजीव गांधी के सानिध्य में उनकी कांग्रेस में वापसी हुई थी। 1988 में पवार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

फिलहाल की स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में एनसीपी के दो गुट हो चुके हैं। एक गुट जहां एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के साथ है तो वहीं एक गुट अजित पवार के साथ खड़ा नजर आ रहा है। पहले गुट में जहां अनुमानित विधायकों की संख्या अनिश्चित है तो वहीं बागी गुट यह दावा कर रहा है कि उनके साथ 30 से अधिक विधायकों का साथ है। अजित पवार के गुट में जिन लोगों ने बगावत की है उसमें से पार्टी के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल और एक कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल भी हैं। अजित पवार के साथ यह दोनों नेता बगावत होने से पहले तक शरद पवार के सबसे नजदीकी माने जाते थे। इनमें से एक यानी प्रफुल्ल पटेल तो एनसीपी के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर किन वजहों के कारण एनसीपी नेता शरद पवार ने कहा कि वह अदालत नहीं जाएंगे बल्कि जनता की अदालत में अपनी पार्टी फिर से खड़ी करेंगे। हालांकि महाराष्ट्र में कानूनी और राजनीतिक समझ रखने वाले विश्लेषकों की मानें तो पहली वजह यह स्पष्ट होना नहीं है कि आखिर कितने विधायक किस गुट के साथ हैं। दूसरी वजह शिवसेना की बगावत से लिया गया सबक है जहां पर देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के फैसले पर कोई भी सवाल उठाने से इनकार करना था।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनते हुए यह कहा था कि विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराने का अधिकार सिर्फ विधानसभा स्पीकर को है और यह खुद स्पीकर अपने विवेक से तय करेंगे कि उनको कब इस कानून के तहत विधायकों को अयोग्य ठहराना है।

शुरू हुई एनसीपी पर कब्जे की कानूनी जंग

सियासी उलटफेर के बाद अब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी पर कब्जे को लेकर चाचा शरद पवार और भतीजे अजित पवार के बीच कानूनी जंग शुरू हो चुकी है। एक ओर जहां राजनीति के चाणक्य और एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार ने बागी अजित पवार का साथ देने वाले पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और लोकसभा सांसद सुनील तटकरे समेत छह नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों में होने के चलते पार्टी से निकाल दिया है, वहीं प्रफुल्ल और अजित गुट ने अपनी नई टीम बना ली है। इस गुट ने शरद गुट के नेता जयंत पाटिल को महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर सुनील तटकरे को नया अध्यक्ष नियुक्त किया है। अनिल पाटिल को व्हिप की जिम्मेदारी सौंपी है। इससे पहले, शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने अजित के साथ गए सभी विधायकों को अयोग्य घोषित करने का प्रस्ताव पास किया। साथ ही पटेल और तटकरे के अलावा बागियों का साथ देने वाले शिवाजी राव गर्जे, विजय देशमुख, एसआर कोहली और नरेंद्र राणे को भी पार्टी से निकाल दिया। एनसीपी की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने राज्यसभा सांसद पटेल और तटकरे के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए शरद पवार को पत्र लिखा था। तटकरे की बेटी अदिति तटकरे ने भी शिंदे सरकार में मंत्री पद की शपथ ली थी। शरद पवार ने ट्वीट किया, एनसीपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के नाते तटकरे व पटेल को पार्टी विरोधी गतिविधियों में एनसीपी के पंजीकृत सदस्यों की सूची से हटाने का आदेश देता हूं।

एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल की ओर से प्रेस काॅन्फ्रेंस की गई। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सरकार में मंत्री पद की शपथ लेने वाले अजित पवार और आठ अन्य लोगों के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की है। पाटिल ने कहा कि अयोग्यता याचिका स्पीकर राहुल नार्वेकर को भेज दी गई है। इसके साथ ही चुनाव आयोग को भी ईमेल किया गया है।

गौरतलब है कि दल-बदल कानून के मुताबिक कोई भी नेता अयोग्यता से बच सकता है अगर जिस पार्टी को वह छोड़ रहा है, उसका दूसरे राजनीतिक दल के साथ विलय हो जाए। दूसरी शर्त यह रहती है कि कम से कम दो तिहाई सांसद या विधायक उस विलय से सहमत होने चाहिए। अब अजित पवार जो दावे कर रहे हैं, उसे इस कानून से जोड़कर देखें तो प्रदेश की 288 सदस्यों वाली विधानसभा में एनसीपी के पास 53 विधायक हैं, लेकिन अजित पवार के महाराष्ट्र सरकार के साथ आने के बाद दावा किया जा रहा है कि उनके साथ 40 विधायकों ने सरकार को समर्थन दिया है। इसके साथ ही अन्य 21 विधायकों का भी सरकार को समर्थन है। इसमें 12 निर्दलीय विधायक भी हैं।

शरद गुट की कार्रवाई के बाद प्रफुल्ल पटेल ने प्रेस काॅन्फ्रेंस कर एनसीपी पर अपना दावा ठोका है। उन्होंने कहा, शरद पवार के फैसले पार्टी के निर्णय नहीं हैं। अजित पवार एनसीपी के विधानमंडल दल के नेता रहेंगे। हम शरद पवार से आग्रह करते हैं कि ेवेहमें अपना आशीर्वाद दें, क्योंकि वे हमारे गुरु हैं। प्रफुल्ल ने प्रदेश एनसीपी अध्यक्ष पद से जयंत पाटिल को हटाने व तटकरे की नियुक्ति का एलान किया। उन्होंने कहा, तटकरे ही अब राज्य में हर नियुक्ति करेंगे। किसी भी विधायक को अयोग्य ठहराने का फैसला पार्टी या चुनाव आयोग नहीं कर सकता। यह काम सिर्फ विधानसभा स्पीकर कर सकता है।

जारी हैं दांव पेंच

एनसीपी में दो फाड़ के बाद पार्टी के नाम और घड़ी के निशान पर कब्जे की जंग और तेज हो गई है। चाचा भतीजे के बीच पावर गेम की लड़ाई मुंबई से उठकर दिल्ली आ गई है। एक तरफ जहां दोनों गुट चुनाव आयोग में अपना-अपना दावा ठोका हैं, वहीं शरद पवार गुट ने भी दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाई है। बैठक के बाद पीसी चाको ने कहा कि ह शरद पवार जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर निर्वाचित किया है। पार्टी की 27 इकाइयां हैं। इन सभी इकाइयों ने एनसीपी के साथ रहने की बात कही है। किसी भी एक इकाई ने यह नहीं कहा कि वह शरद पवार के साथ नहीं है। इसके अलावा बैठक में 8 प्रस्ताव पारित किए गए। जिसमें प्रफुल्ल पटेल के अलावा 9 विधायकों को पार्टी से हटाया गया है। वहीं दूसरी तरफ शरद पवार के नेतृत्व में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक पर अजित पवार ने सवाल उठाए हैं। अजित पवार ने बयान जारी कर कहा कि पार्टी के विधायक और पदाधिकारियों ने उन्हें अध्यक्ष चुना है। ऐसे में शरद पवार को कार्यकारिणी की बैठक का कोई अधिकार नहीं है, मामला चुनाव आयोग में लंबित है। इसलिए दिल्ली में आयोजित बैठक का कोई आधार नहीं है।

बगावत से ही जन्मी एनसीपी

वर्ष 1996 में पवार कांग्रेस की तरफ से लोकसभा में विपक्ष के नेता बने। उनके समीकरण सोनिया गांधी के साथ अच्छे नहीं थे। ऐसे में उन्होंने 1999 में पार्टी में बगावत कर दी और कहा कि सोनिया गांधी विदेशी मूल की हैं इसलिए उनके हाथ में पार्टी का नेतृत्व नहीं दिया जाना चाहिए। उन्होंने पार्टी में बगावत करके नई पार्टी बना ली। तभी एनसीपी का जन्म हुआ।

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