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क्या शाहीनबाग संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग है?

क्या शाहीनबाग संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग है?

दिल्ली विधानसभा के लिए चुनाव प्रचार जोर पकड़ा तो शाहीनबाग प्रमुख मुद्दा बन गया। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी शाहीनबाग में जनता के आक्रोश को लेकर भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रहे थे तो अब भाजपा ने भी जोर-शोर से इस बात को उछाला है कि शाहीनबाग में लोगों को कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने चुनावी लाभ के लिए धरना-प्रदर्शन को उकसाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी रैली में बकायदा इसी मुद्दे पर हुंकार भरी कि शाहीनबाग कोई संयोग नहीं, बल्कि प्रयोग है।

गौरतलब है कि शाहीनबाग में सभी धर्मों के लोग धरने में शामिल होकर सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश करते आ रहे हैं। इस आंदोलन को जिस तरह जनसमर्थन मिलने लगा उससे देशभर के बुद्धिजीवी भी प्रभावित हुए। वे भी अपना समर्थन देने जनता के बीच पहुंचे। कुछ लोग तो यहां तक संभावनाएं देखने लगे कि शाहीन बाग के सद्भाव की मिसाल देश में उसी तरह एक नई क्रांति का सूत्रपान कर सकती है जैसे कि सत्तर के दशक में लोक नायक जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्रों ने समग्र क्रांति को अंजाम तक पहुंचाया था।  इन्हीं संभावनाओं के बीच शाहीन बाग सियासत का मुद्दा बना दिया गया?

आम जनता के आंदोलन को हाईजैक करते हुए कुछ बुद्धिजीवियों ने इसे अपनी पहचान बनाने और सियासत करने का हथियार बनाने की कोशिश की तो सियासी पार्टियां भी पीछे न हीं रही तत्काल उन्होंने इस मुद्दे को ऐसे लपक लिया जैसे कि वे इसी फिराक में बैठी हुई थी। मतदान के महज कुछ दिन पहले राजनीतिक पार्टियों की बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप जिस तरह से दिल्ली के जमीनी मसलों की जगह शाहीन बाग पर आधारित हो गए हैं उससे तो कुछ ऐसा ही संदेश जा रहा है। अब यही एक प्रमुख मुद्दा है।

विपक्ष केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ शाहीन बाग को एक बड़े हथियार के रूप में देख रहा था। शायद उन्हें यह भरोसा हो रहा था कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ पिछले डेढ़ महीने से सड़क पर डटी भीड़ सरकार को झुकाने में काम आएगी। केंद्रीय राजनीति में इस पर फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन दिल्ली की राजनीति में यह बड़ा मुद्दा बन गया है। ‘दि संडे पोस्ट’ को रिपोर्टिंग के दौरान भी यह देखने को मिला कि जो औरतें पहले दिन से वहां धरने पर बैठी हैं उनको मानो हांका जा रहा है। बाहर से आई कुछ महिलाओं ने वहां निर्णय लेना शुरू कर दिया है और इसके लिए वहां कभी-कभी आपसी गुटबाजी भी नजर आयी।

जिस दिन अंजना ओम कश्यप, शाहीनबाग आने वाली थीं उस दिन वहां के लोग ‘आज तक’ को अनुमति देने को लेकर दो हिस्सों में बंटे नजर आए। अंजना को 8 से 9 बजे तक वहां अपना लाइव शो करना था। तमाम मतभेदों के बाद अचानक से निर्णय लिया जाता है आयोजकों की ओर से कि आज तक को अनुमति दे दी गयी है क्योंकि हमें अपनी बात कहने के लिए बड़े चैनलों की दरकार है। अंजना ठीक 8 बजे से पहले आती हैं और 9 बजते ही वहां अपना काम करके चली जाती हैं। पर इस सबके बीच महिलाओं खासकर आयोजक समूह में हलचल देखने को मिली।

दिल्ली में चुनावी तारीख की घोषणा होते ही सीएम केजरीवाल ने कहा था कि यहां चुनाव काम पर लड़ा जाएगा, लेकिन उनका दावा कुछ दिनों में फुस्स होता दिख रहा है क्योंकि यह चुनाव बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल और स्कूल की जगह शाहीनबाग पर केंद्रित होता दिखाई दे रहा है। इसकी शुरुआत हुई डेढ़ महीने से बंद पड़ी सड़क के खुलवाने के मुद्दे से, जिसे खोलने का आदेश कोर्ट भी दे चुका है, लेकिन प्रदर्शनकारी टस से मस होने को तैयार नहीं हैं। प्रदर्शन की ये  शृंखला कब तक चलेगी? कब तक सड़कों पर महिलाएं मोर्चा संभालेंगी, इसका जवाब किसी के पास नहीं है, क्योंकि विरोध के स्वर भले ही बुलंद हो जाएं सरकार साफ कर चुकी है कि वह अपने-फैसले वापस नहीं लेेगी।

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