Country

क्षेत्रवाद की राजनीति

नवरात्र शुरू होते ही पूरे गुजरात में ‘गरबा’ नृत्य जारी है। ‘गरबा’ गुजरात के संस्कृति की खास पहचान है। हर साल की तरह वह इस वर्ष भी धूम-धाम के साथ हर गली -मोहल्लों के पंडालों में जारी है। लेकिन इस बार ‘गरबा’ में पूरबियों की कमी खल रही है- अगर वे हैं भी तो कम संख्या में और जो हैं उनके मन में अब पहले जैसा उत्साह नहीं रहा। हाल में गुजरात में क्षेत्रवाद की तलवार ने एक सूखी लकीर खींच दी है। गुजरात से बड़ी संख्या में बिहार-यूपी के लोग पलायन कर रहे हैं। उन्हें अपने ही देश से भगाए जाने की यह पीड़ा है।

क्षेत्रीयता के उभार के रूप में अब तक महाराष्ट्र और असम में ऐसी घटनाएं घटित होती थी। महाराष्ट्र में तो ‘शिवसेना’ की राजनीति का आधार ही क्षेत्रवाद की भावनाओं का उभार है। लगता है शिवसेना का क्षेत्रवाद अब कुछ अन्य राजनीतिक दलों के लिए वोट के वास्ते प्रेरणा का प्रतीक बन रहा है।

गुजरात के नए घटनाक्रम के मूल में राजनीति है। ऐसा लगता है कि एक 14 माह की लड़की के साथ बलात्कार की घटना का राजनीतिकरण कर दिया गया। बच्ची के बलात्कार का आरोपी बिहार का रहने वाला था। इसी घटना के बाद वहां की जनता को बिहार-उत्तर प्रदेश के लोगों के खिलाफ भड़काने का काम शुरू कर दिया गया। इस काम में सबसे बड़ा नाम कांग्रेस के युवा नेता अल्पेश ठाकोर का आया।

अल्पेश ठाकोर

हाल के दिनों में ओबीसी लहर के रूप में तेजी से उभरने वाले अल्पेश ठाकोर तब चर्चा में आए थे जब हार्दिक पाटिल ने पटेल समुदाय के लोगों को ओबीसी कैटेगरी के तहत आरक्षण का आंदोलन किया था। तब अल्पेश ने ओबीसी जातियों को यह कहते हुए एकजुट किया था कि पाटीदारों की तरह आरक्षण मिलता है तो उनका हिस्सा कमजोर हो जाएगा। हार्दिक पटेल और अल्पेश ठाकोर ने खुद को प्रतिद्वंद्वी ताकतों के तौर पर स्थापित किया था, लेकिन बाद में दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के साथ मिलकर तीनों ने भाजपा के सामने चुनौती पेश की। उसके बाद ही अल्पेश विधायक बन गए। कांग्रेस पार्टी में उनका कद भी बढ़ गया।

जिस बिहार के लोगों को गुजरात से भगाने में वह अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं वह कांग्रेस के सह प्रभारी बनने वाले थे। उनको बिहार में पिछड़ों के नेता रूप में प्रकट कर दिया जा रहा था। सूत्रों के मुताबिक अल्पेश को बिहार का सह प्रभारी बनाए जाने के पीछे रणनीति यह कि राज्य में उनको स्थापित कर पिछड़ी जाति के वोटरों को लुभाया जाए।

लेकिन इसी बीच गुजरात में हुए इस कांड ने राजनीति को बदल दिया है। भले ही अल्पेश के लोगों का वीडियो वायरल हुआ है। जिसमें बिहारियों को मारपीट कर गुजरात से भगाया जा रहा है। लेकिन अब अल्पेश डैमेज कंट्रोल कर रहे हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि गुजरात में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। किसी शरीर पर कोई हमला नहीं हुआ। सोशल मीडिया के द्वारा यहां का माहौल बिगाड़ा गया। उन्होंने कहा कि हम न तो क्षेत्रवाद का समर्थन करते हैं, न ही इसे आगे ले जाएंगे। अल्पेश ने सद्भावना उपवास पर बैठने का ऐलान किया। इसमें उन्होंने बिहार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को भी साथ बैठने के लिए आमंत्रित किया है। वह अब बार-बार यह कह रहे हैं कि बिहारियों के गुजरात से भगाने में ठाकोर सेना के किसी भी सदस्य का कोई हाथ नहीं है। यह सब गुजरात को बदनाम करने की साजिश है।

यह भी संयोग है कि 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के चुनाव की तारीखें की घोषणा की। उसी दिन हिंदी भाषी प्रदेशों से आने वाले प्रवासियों को निशाना बनाए जाने की घटनाएं गुजरात में फैलने लगी। इसी दिन एक नेशनल चैनल ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की बढ़ती सर्वे में दिखाई। इस संभावना के बाद ही बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, गुजरात के गृहमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा ने पूरे मामले के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही यह कहा जाने लगा कि अल्पेश ही इस मुहिम के पीछे हैं।

यह इस प्रकरण में भाजपा के लिए गले की हड्डी बन गई। न वह गुजरातियों के पक्ष में खुलकर बोल सकती हैं, न ही बिहार, उत्तर प्रदेश के। उसके लिए एक तरफ कुंआ तो दूसरी ओर खाई है। गुजरात का पक्ष लेने का मतलब है उत्तर प्रदेश बिहार में अपने वोटरों को नाराज करना।

You may also like