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विधानसभा के भीतर तक पहुंची राजनीतिक हिंसा 

पश्चिम बंगाल में इन दिनों हाल ही में हुई बीरभूम हिंसा का मुद्दा गरमाया हुआ है। राज्य  की राजनीति में कुछ समय को अगर छोड़ दें तो  1950 के दशक की शुरुआत से ही हिंसा का बोलबाला रहा है। इस हिंसा का आलम यह है कि अब विधानसभा सदन तक राजनीतिक हिंसाएं देखने को मिल रही हैं।

 

दरअसल ,राज्य की विधानसभा में कल 28 मार्च को सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भाजपा के विधायक आपस में भिड़ गए। दोनों पार्टियों के नेताओं के बीच नौबत मारपीट तक आ गई। बताया गया है कि टीएमसी विधायक असित मजूमदार और भाजपा के मनोज तिग्गा ने एक-दूसरे पर हमला किया। इसमें टीएमसी नेता घायल हो गए। इस मामले में स्पीकर ने बंगाल के नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी समेत भाजपा के पांच विधायकों को सस्पेंड कर दिया।

 

इस बात पर हुआ था विवाद

 


पश्चिम बंगाल विधानसभा में  विपक्ष ने कानून व्यवस्था के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान की मांग की । इसी को लेकर टीएमसी के विधायक भड़क उठे और दोनों पक्षों के बीच कहासुनी शुरू हो गई। देखते ही देखते ये बहस मारपीट में बदल गई। भाजपा विधायकों ने आरोप लगाया कि वे बीरभूम में हुई कथित हत्याओं पर चर्चा चाहते थे, जिस पर हंगामे के बाद टीएमसी विधायकों ने धक्कामुक्की-मारपीट की। बाद में स्पीकर ने कार्रवाई करते हुए पांच विधायकों को अगले आदेश तक निलंबित कर दिया। जिन नेताओं को सस्पेंड किया गया है, उनमें शुभेंदु अधिकारी, मनोज तिग्गा, नराहरी महतो, शंकर घोष, दीपक बरमन का नाम शामिल हैं । इसके बाद विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में लगभग 25 भाजपा विधायकों ने विधानसभा से वॉकआउट किया और दावा किया कि सदन के अंदर तृणमूल कांग्रेस के विधायकों द्वारा उनकी पार्टी के कई विधायकों के साथ मारपीट की गई।

 

क्या बोले भाजपा नेता

 


भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने मारपीट की घटना और स्पीकर द्वारा सस्पेंड किए जाने के फैसले पर टीएमसी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा, “सदन का आखिरी दिन होने के चलते हमने राज्य के कानून व्यवस्था पर चर्चा की मांग की। ऐसा न होने के बाद संवैधानिक तरीके से विरोध किया जिसके बाद सिविल ड्रेस पहने पुलिस कर्मी और टीएमसी के विधायकों ने हमारे  विधायकों को मारा।” उन्होंने कहा, “तृणमूल कांग्रेस, के  गुंडे और पुलिस के खिलाफ हमारा मार्च है। इसको लेकर हम स्पीकर के पास भी जाएंगे। बंगाल में जो हालत है उसको लेकर केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए।”

अधिकारी ने कहा, ‘‘विधायक, सदन के भीतर भी सुरक्षित नहीं हैं। तृणमूल के विधायकों ने सचेतक मनोज तिग्गा सहित हमारे कम से कम 8-10 विधायकों के साथ मारपीट की, क्योंकि हम कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान की मांग कर रहे थे।’’

 

ममता बनर्जी क्या छिपाना चाहती हैं : बीजेपी

 

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ट्विटर पर लिखा, ”पश्चिम बंगाल विधानसभा में बेहद खराब हालात, पहले गवर्नर और अब बीजेपी विधायकों से टीएमसी ने की बदसलूकी. चीफ व्हिप मनोज तिग्गा के साथ भी बदतमीजी हुई. ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बीजेपी रामपुरहाट में हुई हिंसा पर चर्चा की मांग कर रही थी, ममता बनर्जी क्या छिपाना चाहती हैं ।

 

कांग्रेस ने की अनुच्छेद 355 लगाने की मांग

 

हिंसा को लेकर कांग्रेस भी टीएमसी पर हमलावर है । पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने सीएम ममता के शासन में कानून और व्यवस्था की स्थिति चरमरा जाने का आरोप लगाते हुए राज्य में अनुच्छेद 355 लागू करने की मांग की है. अधीर रंजन ने कहा कि हिंसा की घटनाएं राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति ध्वस्त होने और अपराधियों के साथ टीएमसी की मिलीभगत का संकेत देती हैं।  संविधान का अनुच्छेद 355 आपात स्थिति से संबंधित है, जिसके तहत केंद्र बाह्य आक्रमण या आंतरिक अशांति से किसी राज्य की रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।

 

टीएमसी का क्या बयान

 

तृणमूल कांग्रेस के नेता एवं राज्य के मंत्री फिरहाद हकीम ने प्रेसकांफ्रेंस कर  कहा कि भाजपा, विधानसभा में अराजकता फैलाने के लिए नाटक कर रही है। सदन में हमारे कुछ विधायक घायल हो गए हैं। हम भाजपा के इस कृत्य की निंदा करते हैं।’

पश्चिम बंगाल में लगातार बढ़ रहे राजनीतिकहिंसाओं को लेकर  राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बेरोजगारी, गरीबी, राजनीतिक दलों पर निर्भरता और लंबे समय तक एक पार्टी के सत्ता में रहने से लगातार हिंसा को बढ़ावा मिला।

बंगाल में हमेशा से हिंसा को लेकर सवाल उठते रहे हैं।  सत्ता में आने से पहले ममता बनर्जी लेफ्ट पर हिंसा का आरोप लगाती रहती थीं। उसी हिंसा और भ्रष्टाचार के खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया और सत्ता में आई। अब ममता के राज में हिंसा का आरोप लग रहा है। इस बार यह आरोप बीजेपी लगा रही है।  बीजेपी का आरोप है कि तृणमूल के  राज में उसके सैकड़ों कार्यकर्ताओं को मार दिया गया।  इसी प्रकार की हिंसा का आरोप टीएमसी बीजेपी पर लगाती है। भाजपा नेताओं का दावा है कि साल 2018 के पंचायत चुनाव से लेकर अब तक उसके करीब सौ कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस इनके लिए आपसी रंजिश और पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी को जिम्मेदार ठहराती रही है।

 

राजनीतिक हिंसा का आंकड़ा

 

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पूरे साल के दौरान देश में होने वाली 54 राजनीतिक हत्याओं में से 12 बंगाल में हुईं। लेकिन, उसी साल केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार को जो एडवायजरी भेजी थी, उसमें कहा गया कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा में 96 हत्याएं हुई हैं और लगातार होने वाली हिंसा गंभीर चिंता का विषय है। उसके बाद एनसीआरबी ने सफाई दी थी कि उसे पश्चिम बंगाल समेत कुछ राज्यों से आंकड़ों पर स्पष्टीकरण नहीं मिला है। इसलिए उसके आंकड़ों को फाइनल नहीं माना जाना चाहिए। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं। उस साल अगस्त में माकपा ने एक पर्चा जारी कर दावा किया था कि दो मार्च से 21 जुलाई के बीच तृणमूल कांग्रेस ने 62 काडर की हत्या कर दी है। दरअसल, वह दौर तृणमूल कांग्रेस के मजबूती से उभरने का था। नंदीग्राम और सिंगुर में जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के जरिए ममता बनर्जी ने देश-विदेश में सुर्खियां बटोरी थीं और राज्य में उनके कार्यकर्ता वर्चस्व की होड़ में जुटे थे।

वर्ष 1980 और 1990 के दशक में जब बंगाल के राजनीतिक परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस औऱ भाजपा को कोई वजूद नहीं था, अक्सर वाम मोर्चा और कांग्रेस के बीच हिंसा होती रहती थी। 1989 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की ओर विधानसभा में पेश आंकड़ों में कहा गया था कि 1988-89 के दौरान राजनीतिक हिंसा में 86 कार्यकर्ताओं की मौत हुई। उनमें से 34 माकपा के थे और 19 कांग्रेस के। बाकियों में वाम मोर्चा के घटक दलों के कार्यकर्ता शामिल थे।

उस समय माकपा के संरक्षण में कांग्रेसियों की कथित हत्याओं के विरोध में कांग्रेस ने राष्ट्रपति को ज्ञापन देकर बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की थी। पार्टी ने ज्ञापन में दावा किया था कि वर्ष 1989 के पहले 50 दिनों के दौरान उसके 26 कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है।

एनसीआरबी के आंकड़ों से साफ है कि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान देशभर में ऐसी हिंसा में 16 राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हुई थी। उनमें से 44 फीसदी यानी सात घटनाएं इसी राज्य में हुई थीं। राज्य में भाजपा के मजबूती से उभरने के बाद से राजनीतिक हिंसा और हत्याओं का सिलसिला लगातार तेज हुआ है। वर्ष 2018 के पंचायत चुनावों में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, कम से कम 50 लोगों की हत्या हुई थी। हालांकि, भाजपा नेता सौ से ज्यादा होने का दावा करते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हिंसा और राजनीतिक हिंसा के लिए कठघरे में खड़ी तृणमूल कांग्रेस सरकार का बचाव करते हुए पार्टी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने तब कहा था, “पंचायत चुनावों के दौरान हिंसा का इतिहास बहुत पुराना है। 1990 के दशक में माकपा के शासनकाल के दौरान चार सौ लोग मारे गए थे। वर्ष 2003 के चुनावों में भी 40 लोगों की हत्या हुई थी। इसके मुकाबले कुछ दर्जन घटनाएं सामान्य हैं।’

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर इस हिंसा के शिकार तृणमूल कांग्रेस के लोग भी होते रहे हैं। बीते साल 10 फरवरी को नदिया जिले में विधायक सत्यजीत विश्वास की उनके घर के सामने ही सरस्वती पूजा पंडाल में बेहद करीब से गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल राय समेत कई नेता इस मामले में अभियुक्त हैं।

 

कब से शुरू हुआ टीएमसी और भाजपा के बीच झगड़ा

 

तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच झगड़ा कब से शुरू हुआ, यह तो कहना मुश्किल है। लेकिन, इसने तेजी पकड़ी वर्ष 2014 के  लोकसभा चुनावों के बाद। वर्ष 2014 में महज दो सीटें जीतने वाली भाजपा को जब राज्य की 42 में से 18 सीटें मिल गईं तो वह वाम मोर्चा और कांग्रेस को पछाड़ते हुए प्रमुख विपक्ष दल के तौर पर सामने आई। इस दौरान तृणमूल कांग्रेस के कई नेता भी भगवा खेमे में शामिल हो गए। उस झटके के बाद ही तृणमूल कांग्रेस ने साम-दाम-दंड-भेद का सहारा लेते हुए खासकर उन इलाकों में दोबारा पैठ जमाने का प्रयास तेज किया, जहां भाजपा को कामयाबी मिली थी। वर्चस्व की इस लड़ाई में संघर्ष लाजिमी था। नतीजतन राज्य में लगातार हिंसा की खबरें मिल रही हैं।

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