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सज्जन को सजा के सियासी सबक

सिख विरोधी दंगों के मामले में पूर्व सांसद सज्जन कुमार को हुई सजा इस देश की सियासत के लिए एक सबक है। राजनीतिक पार्टियों को सोचना होगा कि उनके बीच आपसी मतभेद हो सकते हैं, मगर आम जनता जानबूझकर किसी नेता को कटघरे में खड़ा नहीं करती। यदि जनभावनाओं को दरकिनार कर ऐसे नेता को टिकट मिलता रहे तो इससे जनता का राजनीति से विश्वास उठना स्वाभाविक है

राजनीति बहुत ऊंची चीज है। नेता का मतलब होता है नेतृत्व करने वाला। एक अच्छा नेता अपने समाज और देश का प्रतिनिधित्व करते हुए जनता को सुखद और सुरक्षित वातावरण मुहैया कराने के लिए प्रयासरत रहता है। जनता को एक पथ प्रदर्शक के तौर पर सही रास्ता दिखाता है। लेकिन जब जनता का कोई चुना हुआ प्रतिनिधि ही अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस कदर हिंसक हो जाए कि उसकी करतूतों से मानवता कराह उठे, चारों तरफ हाहाकार मच जाए, मासूम और निर्दोष लोग जान बचाने को तड़प जाएं तो जाहिर है कि ऐसी राजनीति से हर कोई नफरत करेगा। आज इस देश की राजनीति के लिए सोचने का विषय है कि 1984 के सिख विरोधी दंगों के मामले में सजा सुनाते हुए माननीय हाईकोर्ट ने क्या टिप्पणी की है। दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि ‘यह आजादी के बाद की सबसे बड़ी हिंसा थी। यह सियासी फायदे के लिए करवाई गई। आरोपी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठाकर सुनवाई से बच निकले।’

यदि जनता का कोई जिम्मेदार प्रतिनिधि ही भड़काऊ भाषण देकर हिंसा भड़काने का काम करे और उसके बावजूद उसका राजनीतिक करियर बिना किसी संकोच के आगे बढ़ता रहे तो निश्चित ही कोई भी मानेगा कि उसे कहीं न कहीं से उच्च राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। यह सच है कि महज आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन एक सुलझे हुए नेतृत्व के लिए यह देखना भी जरूरी होता है कि आखिर दंगा पीड़िता यूं ही तो किसी राजनेता को कटघरे में खड़ा नहीं कर रहे होंगे। राजनीतिक पार्टियों के बीच द्वेषपूर्ण भावनाएं हो सकती हैं, लेकिन आम पीड़ित को संदेह की नजर से नहीं देखा जा सकता है।

सन् 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। विश्वासघात का यह सबसे बड़ा मामला था, लेकिन इसकी सजा उन आम लोगों को दिए जाने का कोई अर्थ नहीं था जो हत्यारे अंगरक्षकों की बिरादरी के थे। लेकिन अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिए तत्कालीन कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार ने भीड़ को सिख समाज के निर्दोष लोगों की हत्या के लिए भड़काया। पीड़ितों की इस पीड़ा को गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि एक चुने हुए जनप्रतिनिधि ने भीड़ को उकसाया कि ‘इन्होंने हमारी मां को मारा है। इन सरदारों को खत्म कर दो।’ राजनीति का चेहरा इतना कुरूप भी हो सकता है, यह समझ पाना वाकई बहुत ही मुश्किल है। इससे भी ज्यादा मुश्किल यह समझ पाना है कि जिन सज्जन को लेकर पीड़ितों में भयंकर आक्रोश हो, जिन्हें सजा दिए जाने की मांग को लेकर पीड़ित निरंतर सड़कों पर आंदोलन करते रहे, उन्हें कांग्रेस आलाकमान ने 1991 और 2004 में भी लोकसभा चुनाव में उतारा और वह सांसद भी बन गए। जाहिर है कि इसमें राजनीति ही नहीं, बल्कि वह जनता भी कम दोषी नहीं जो उन्हें जितवाती रही। जो भूल गई कि 1984 में निर्दोष सिखों के साथ कितनी बड़ी क्रूरता हुई। जिसे याद नहीं रहा कि किस कदर सिखों के मासूम बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक को जिंदा ही आग की लपटों के हवाले कर दिया गया था? यह सब किसके इशारे पर हुआ था? क्या दंगाइयों को सिखों की दुकानें और संपत्तियां लूटने की छूट दी गई थी? सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाला तंत्र क्यों असफल रह गया था? क्षुद्र राजनीति ने दंगा भड़काने का ऐसा कुचक्र रचा कि उस वक्त पूरा देश हिंसा की लपटों का शिकार हुआ। जगह-जगह सिख समाज के निर्दोष लोगों पर क्रूरता हुई। अकेले दिल्ली में सिख समाज के 2,733 लोगों की बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई। उनके घरों को जला दिया गया। निर्दोष लोगों की हत्या और उनके घरों-दुकानों की लूटपाट का यह कुचक्र उन नेताओं के इशारे पर हुआ जो सत्ता की छत्रछाया में थे। इनको पुलिस का भी साथ मिला। सज्जन कुमार को जिस मामले में सजा मिली वह दक्षिण-पश्चिम दिल्ली की पालम कॉलोनी का है। कॉलोनी के राजनगर पार्ट-1 क्षेत्र में सिख परिवार के पांच सदस्यों की हत्या, की गई थी और राजनगर पार्ट-2 में एक गुरुद्वारे को जला दिया गया था। इस मामले में माननीय हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस मुरलीधर और न्यायमूर्ति विनोद गोयल ने सज्जन को उम्रकैद और पांच लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनायी। सज्जन कुमार को हत्या साजिश, दंगा भड़काने और भड़काऊ भाषण देने का दोषी पाया गया। 31 दिसंबर तक उन्हें आत्मसर्पण करना होगा। उनके अलावा नेवी के रिटायर्ड कैप्टन भागमल, पूर्व कांग्रेस पार्षद बलवान खोखर और गिरधारी लाल को भी इस मामले में उम्र कैद की सजा हुई है। पूर्व विधायक महेंद्र यादव और किशन खोखर को निचली अदालत से तीन साल की जो सजा मिली थी वह हाईकोर्ट ने बढ़ाकर 10 साल कर दी है।

माननीय हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि दंगों को अंजाम देने वाले राजनीतिक संरक्षण के कारण बचते रहे और पुलिस ने उनकी मदद की। दस कमेटियों और आयोगों की जांच के बाद आखिर जिम्मेदारी 2005 में सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने दंगों के 21 साल बाद जांच शुरू की। दंगाइयों को सजा दिलाने की मांग करते रहे पीड़ितों का संघर्ष सफल हुआ। अंततः 34 साल बाद सज्जन कुमार को सजा मिलने पर पीड़ितों ने राहत की सांस ली है। वे अब सज्जन को फांसी दिए जाने की मांग कर रहे हैं।

दरअसल, सज्जन कुमार का राजनीतिक रुतबा ही कहा जा सकता है कि मामले में जब सीबीआई उन्हें गिरफ्तार करने मादीपुर स्थिति उनके घर गई थी तो जमकर हंगामा हुआ था। नतीजा यह रहा कि उसके बाद सीबीआई और पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। सज्जन से पहले कांग्रेस के ही एक दिग्गज नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत एचकेएल भगत भी एक गवाह के बयान के आधार पर जेल भेजे गए थे, लेकिन उनकी मौत के बाद मामला बंद करा दिया गया। एचकेएल भगत को कभी पूर्वी दिल्ली का बेताज बादशाह कहा जाता था। सन् 1984 के बाद दंगा पीड़ित उन्हें कटघरे में खड़ा कर निरंतर सजा दिलाए जाने की मांग करते रहे। पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश टाइटलर का नाम भी दंगा भड़काने वाले आरोपियों में प्रमुखता से लिया जाता रहा है। नानावटी आयोग ने भी टाइटलर पर उंगलियां उठाई थी। दंगा पीड़ित सज्जन के साथ ही भगत और टाइटलर को भी सजा दिलवाने की मांग करते रहे हैं। भगत अब रहे नहीं, लेकिन जानकारों का मानना है कि सज्जन की तरह ही टाइटलर की वजह से भी कांग्रेस की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। हथियार व्यवसायी अभिषेक वर्मा का आरोप है कि टाइटलर ने गवाहों को खरीदने का प्रयास किया था। वर्मा का हाल में लाई डिटेक्टर टेस्ट हुआ है। यदि रिपोर्ट टाइटलर के खिलाफ आई तो वे मुश्किल में आ सकते हैं। बहरहाल पीड़ित तो टाइटलर के साथ ही मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को भी दोषी ठहराते हुए सजा दिये जाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में 1984 के दंगों पर राजनीति भी तेज हो गई है। लेकिन राजनीति का धर्म केवल दूसरे को कटघरे में खड़ा कर देना भर नहीं होना चाहिए। तमाम राजनीतिक पार्टियों को सजग रहने की जरूरत है कि भविष्य में वे उन नेताओं को आगे न बढ़ाएं जो अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए मानवता के खिलाफ जहर उगलते हैं।

राजनीतिक पार्टियों को यह बात गंभीरता से लेनी होगी कि आम जनता उनके किसी नेता को दोषी मान रही है, तो उसे टिकट क्यों दिया जाए। यदि कोई एक पार्टी ऐसा कर देती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि सभी ऐसा कर दें। आदर्श राजनीति का काम दंगों को भड़कने से रोकना है, लेकिन जब राजनेता ही अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए दंगे भड़काएं तो इसकी देश-समाज में भारी कीमत चुकानी पड़ती है। अतीत में देश दंगों के चलते काफी कुछ भुगत चुका है। कम से कम अब तो सुखद वातावरण की उम्मीद की ही जानी चाहिए।

 

31 अक्टूबर 1984 : तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके निवास पर सिख अंगरक्षकों ने हत्या की।

1 नवंबर 1984 : प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से

आक्रोशित भीड़ ने दिल्ली कैंट के राजनगर एरिया में पांच सिखों की हत्या की।

मई 2000 : एनडीए सरकार ने मामलों की जांच के लिए जीटी नानावटी आयोग गठित किया।

दिसंबर 2002 : जिला अदालत से सज्जन कुमार को एक मामले में बरी कर दिया।

24 अक्टूबर 2005 : जांच आयोग की सिफारिश पर सीबीआई ने सज्जन कुमार के खिलाफ केस दर्ज किया।

1 फरवरी 2010 : जिला अदालत ने सज्जन कुमार एवं अन्य को आरोपी मानते हुए समन जारी कर ट्रायल शुरू किया।

24 मई 2010 : अदालत ने आरोपियों के खिलाफ हत्या, डकैती और आगजनी सहित अन्य आरोप तय किए।

30 अप्रैल 2013 : निचली अदालत ने सज्जन कुमार को बरी किया, जबकि अन्य को दोषी करार दिया गया।

9 मई 2013 : दोषी बलवान खोखर, भागमल और गिरधारी लाल को उम्रकैद एवं दो अन्य को तीन साल कैद की सजा।

19 जुलाई 2013 : सज्जन कुमार को बरी करने के फैसले के खिलाफ सीबीआई ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

22 जुलाई 2013 : हाईकोर्ट ने सीबीआई की अपील पर सज्जन कुमार को नोटिस जारी किया। इसके बाद हाई कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई, जो वर्ष 2018 तक चली।

29 अक्टूबर 2018 : हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा।

17 दिसंबर 2018 : हाईकोर्ट ने मामले में फैसला सुनाया और सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा दी। बलवान खोखर, भागमल और गिरधारी लाल को निचली अदालत से मिली उम्रकैद की सजा बरकरार रखी गई। निचली अदालत से दो अन्य दोषियों को मिली सजा बढ़ाकर दस साल कर दी गई।

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