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जम्मू-कश्मीर में सियासी ड्रामा

सत्ता का अपना खेल होता है। जिसे सियासत कहा जाता है। सियासत सत्ता तक पहुंचाती है, उसे बचाती है और गिराने का भी काम करती है। वह अक्सर घटनाओं में नहीं, उनके पीछे छिपी रहती है। जम्मू-कश्मीर में जिस तरह से वहां के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने सरकार बनने की सक्रियता और संभावनाओं के बीच विधानसभा भंग की वह सतह के पीछे चलने वाली राजनीति ही है।

राज्यपाल मलिक के विधानसभा भंग करने से पहले पीडीपी, एसी कांग्रेस गठबंधन और पीपुल्स पार्टी के प्रमुख सज्जाद लोन की तरफ से अपनी-अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया गया था। सरकार बनाने की दिशा में कांग्रेस, नेशनल कांग्रेस और पीडीपी गठबंधन सबसे आगे था। लेकिन सबकी उम्मीदों पर पानी फेरते हुए यह फैसला लिया- मैं कानून के तहत प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए विधानसभा भंग करता है? ऐसा माना जा रहा है कि जब राज्यपाल को लग गया कि वहां भाजपा के सरकार बनाने की को भी गुंजाईश नहीं बची और भाजपा विरोधी दल लगातार सरकार बनाने की दिशा में सक्रिय हैं तो उन्होंने भाजपा हित में विधानसभा भंग करने का ऐलान कर दिया।

पिछले महीने में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार आपसी तकरारों के चलते गिर गई थी। उसके बाद से असेंबली को कोई दूसरी सरकार बनने की उम्मीद में भंग नहीं किया गया था। राज्यपाल के विधानसभा भंग करने के जवाब में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने लिखा, पिछले पांच महीने से हम लगातार विधानसभा भंग करने की बात कर रहे थे जिससे विधायकों को तोड़ने की कोशिश रोकी जासके। उस वक्त हमारी अपील सुनने वाला कोई नहीं था। लेकिन जैसे ही हमने महागठबंधन बनाने की योजना शुरू की तो यह कदम उठा लिया गया। इसी बाबत नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला ने चुटकी ली। जम्मू-कश्मीर के राजभवन में नई फैक्स मशीन की जरूरत है।

 

असल में महागठबंधन के शक्ल अख्तियार करते ही महबूबा मुफ्ती ने सरकार बनाने की दावेदारी संबंधी पत्र राज्यपाल को फैक्स से भेजा। मेल भी दिया। लेकिन राजभवन की तरह से कहा गया कि उन्हें कोई फैक्स प्राप्त नहीं हुआ शायद मशीन खराब है।

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती

पांच महीने से सो रहे वहां के तमाम दल अचानक जागे। उनके जागते ही भाजपा के होश फाख्ता हो गए। 21 नवंबर को पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने संकेत दिया कि वे मिलकर सरकार बनाने को राजी हैं। इस मामले में फॉर्मूला यह था कि कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस महबूबा मुफ्ती को बाहर से समर्थन देंगे। नेशनल कांफ्रेंस के उमर अब्दुल्ला किसी भी दल को समर्थन देने को राजी हो गए ताकिभाजपा को अपना मुख्यमंत्री बनाने से रोका जा सके। भाजपा के खेल को नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी समझ गई। नतीजतन वे अपनी गहरी रंजिशों को भूलकर साथ आने और महागठबंधन बनाने को तैयार हो गए। उनको यह भी लग रहा था कि जरूरत पड़ने पर भाजपा, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस को तोड़ने में मदद कर सकती है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्यपाल के फैसले को आलोकतांत्रिक बताया। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का अचानक भंग किया जाना पूर्णता अलोकतांत्रिक है। आज कश्मीर से लेकर केरल तक हर जगह लोकतंत्र खतरे में है। देश के सभी विचारवान नागरिकों को एक साथ आना होगा नहीं तो जनतंत्र और जनमत का गला घोंट दिया जाएगा। कांग्रेस नेता सैफउद्दीन सोज ने कहा-महबूबा जी को कोर्ट जाना चाहिए क्योंकि राज्यपाल ने जो किया है वह असंवैधानिक- अलोकतांत्रिक है। विधानसभा भंग हो जाने के बाद अब नया दल चुनाव के बारे में ही सोच रहे है। अब यहां लोकसभा चुनाव के साथ ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उसी वक्त यह तय होगा कि किस दल में क्या क्षमता है। जो भी हो मगर विधानसभा भंग करने के फैसले को जनता सही नहीं मान रही है।

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