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पॉलिटिकल किस्सा : जब संसद में बोलते-बोलते रो पड़े थे योगी आदित्यनाथ

यहां ध्यान देने वाली एक बात यह  थी  कि एक व्यक्ति जिसे धार्मिक और राजनीतिक नेता के बजाय बहादुर ठाकुर के रूप में देखा जाता है वह 12 मार्च 2007 को लोकसभा में उस समय रो पड़े जब प्रशासन ने उनसे और उनके संगठन से निपटने के लिए थोड़ा साहस दिखाया।
योगी आदित्यनाथ और हिंदू युवा वाहिनी द्वारा चलाए गए नफरत भरे प्रचार के कारण गोरखपुर और उसके आसपास के इलाकों में हिंदू-मुस्लिम दंगा होने पर पुलिस ने सख्ती से कार्रवाई की थी।  इन दंगों में दो व्यक्ति मारे गए थे और करोड़ों की संपत्ति जलकर खाक हो गई थी। जनवरी के अंत और फरवरी 2007 के प्रारंभ में हुए इन दंगों के बाद शांति कायम करने के लिए इन इलाकों में कई दिन तक कर्फ्यू लगा रहा था।
यह पहला दंगा नहीं था जिसमें हिंदू युवा वाहिनी स्पष्ट रूप से शामिल थी ।असल में मार्च 2002 में हिंदू युवा वाहिनी के गठन के बाद से गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में अक्सर ही सांप्रदायिक दंगे होने लगे थे। इन सभी घटनाओं में किसी न किसी रूप में हिंदू युवा वाहिनी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल थी। दो समुदाओं के दो व्यक्तियों में हो रहे झगड़े में योगी आदित्यनाथ अथवा हिंदू युवा वाहिनी के नेताओं के कूदते ही यह सांप्रदायिक दंगे की शक्ल ले लेता था ।
इनमें हिंदू युवा वाहिनी के गठन के पहले ही साल में इस क्षेत्र में कम से कम छह बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए। यह घटनाएं कुशीनगर जिले के मोहन मुंडेरा गांव, गोरखपुर जिले के नथुआ गांव और गोरखपुर शहर के तुर्कमानपुर इलाके में जून 2002 में हुए । इसी तरह महाराजगंज जिले के नरकटिया गांव में अगस्त 2002 में और महाराजगंज जिले के भेदाही गांव तथा संत कबीर नगर जिले के धान घाटा इलाके में सितंबर 2002 के पहले सप्ताह में हुए। स्थानीय प्रशासन निष्प्रभावी बना रहा इसलिए आने वाले वर्षो में भी सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा ।
इस क्षेत्र में सांप्रदायिक गड़बड़ी की घटनाओं को सिलसिलेवार तैयार करने वाले स्थानीय पत्रकार मनोज कुमार बताते हैं, “2007 में आदित्यनाथ की गिरफ्तारी होने तक गोरखपुर पड़ोस के जिलों में कम से कम 22 बड़े दंगे हो चुके थे। “
योगी आदित्यनाथ और हिंदू युवा वाहिनी के एक दर्जन से अधिक नेताओं को 28 जनवरी 2007 को उस समय गिरफ्तार कर लिया गया था जब वे गोरखपुर के दंगा ग्रस्त इलाके की ओर मार्च कर रहे थे। इससे एक दिन पहले ही आदित्यनाथ ने छोटे से झगड़े को पूरी तरह से सांप्रदायिक रंग देने के इरादे से बनाने वाला भाषण दिया था। ये गिरफ्तारी ठीक समय पर की गई थी जिसकी वजह से हिंदू युवा वाहिनी 29 जनवरी को ताजिया जलाने और उन्हें नष्ट करने की धमकी पर अमल नहीं कर सकी। ताजिया इराक में इमाम हुसैन के मकबरे की प्रतिकृति होता है और मुहर्रम के ताजिया का भारतीय मुसलमानों में रिवाज है। इन गिरफ्तारियों के बावजूद गोरखपुर और उसके पड़ोसी जिलों में कई स्थानों पर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे आदित्यनाथ को 11 दिन जेल में रहना पड़ा और 7 फरवरी को उनकी जमानत मंजूर हुई या पहला और एकमात्र अवसर था जब स्थानीय प्रशासन ने आदित्यनाथ और उनके गुर्गों के खिलाफ तत्परता से कार्यवाही की थी ।
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा कुछ समय के लिए ही सही जनवरी 2007 में आदित्यनाथ के प्रति तुष्टिकरण की नीति से हटना चर्चा का विषय बना रहा ।
हो सकता है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया हो क्योंकि आदित्यनाथ उसी साल अप्रैल-मई में राज्य विधानसभा के होने वाले चुनाव से पहले एक बड़े साम्प्रदायिक उन्माद को उकसा रहे थे । स्थानीय लोगों का तर्क है कि उस आधार पर यदि लड़ाई होती तो मुलायम सिंह और कमजोर होते क्योंकि ऐसी स्थिति में मुसलमान उनके प्रतिद्वंदी राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी की मायावती को चुनाव में मत देने के लिए मजबूर हो जाते।
 कारण जो भी रहा हो परंतु आदित्यनाथ को गिरफ्तार करने और उनकी सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षाकर्मियों को हटाने के सरकार के निर्णय से ऐसा लगता है कि आदित्यनाथ इतने हतोत्साहित हो गए कि जब उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को इस घटना का विरोध बताया तो उनकी आंखें भर आई, आंखों से आंसू टपकने लगे। उन्होंने इस घटना को अपने खिलाफ राजनीतिक षड्यंत्र बताया ।
‘द हिंदू’ समाचार पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया, “सांसद जिन्होंने गोरखपुर जेल में 11 दिन बिताने के बाद सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया, राज्य सरकार द्वारा किए गए आचरण के अपने अनुभव बताते हुए रोने लगे और आरोप लगाया कि यह मुझे बदनाम करने और यातना देने के लिए ही किया गया था। उस समय गोरखपुर निर्वाचन क्षेत्र से तीसरी बार निर्वाचित होने वाले सांसद को अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने जब शून्यकाल में यह मामला उठाने की अनुमति दी इस मामले पर गौर करने का आश्वासन दिया तो वह सुबकने  लगे।उन्होंने अध्यक्ष से जानना चाहा क्या हमें संरक्षण मिलेगा या हमारी हालत भी सुनील महतो जैसी होगी!  झारखंड मुक्ति मोर्चा के सदस्य सुनील महतो की उस के पिछले सप्ताह ही जमशेदपुर के निकट हत्या कर दी गई थी।”
आदित्यनाथ की आंखों से आंसू टपकने का दृश्य देखकर उनके समर्थक ठाकुर हतप्रद थे। इसे कमजोरी की निशानी के रूप में देखा गया जो इस लड़ाकू जाति के किसी पुरुषके मामले में अस्वीकार्य थी।शीघ्र ही हिंदू युवा वाहिनी में उनके अधीनस्थ समर्थक उनकी छवि बनाने में जुट गए और उन्होंने दलील दी कि वह भावनाओं से भरपूर एक संवेदनशील व्यक्ति हैं।जबकि अनेक स्थानीय लोग उन्हें कायर बताते थे जो सिर्फ भीड़ में हिंसा फैलाने में सक्षम थे।
 बहरहाल एक तेजतर्रार नेता के रूप में आदित्यनाथ की छवि के साथ ही उनके संगठन की गतिविधियों को भी  पूर्वी उत्तर प्रदेश में जबरदस्त धक्का लगा था। हिंदू युवा वाहिनी अस्त-व्यस्त  नजर आई और आदित्यनाथ ने भी अपनी आदत से इतर किसी भीड़ का नेतृत्व करने और मुसलमानों का पर आक्रमण होने की गतिविधियों में शामिल होने से गुरेज किया।

अब योगी आदित्यनाथ , उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और मुलायम सिंह यादव का हाल-चाल लेने नियमित रूप से उनके घर जाते हैं ,सत्ता का खेल ऐसा ही है।  पर मुलायम सिंह यादव , राजनीति  में कल के प्रतिद्वंदी थे और अब उनका बेटा  अखिलेश यादव,  योगी आदित्यनाथ के आज के प्रतिद्वंदी हैं।

साभार:  धीरेंद्र के मोहरे द्वारा लिखित क़िताब ‘हिंदुत्व के मोहरे’

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