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पीके नहीं बनेंगे कांग्रेस के तारणहार

हालिया संपन्न पांच राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद चर्चित चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उर्फ पीके को पार्टी में शामिल करने की कवायद पिछले एक सप्ताह से जारी थी। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ पीके का चिंतन-मनन हो रहा था। कहा जा रहा था कि पीके 2024 के चुनाव में कांग्रेस के लिए जादूगर साबित हो सकते हैं। उनके पिटारे में इसका रोड मैप भी था। स्क्रिप्ट भी लिखी जा चुकी थी लेकिन अचानक से कांग्रेस पार्टी और पीके ने एक-दूजे का साथ छोड़ने की घोषणा कर सबको चौंका दिया है

चुनावी रणनीतिकार से देश में अपनी पहचान बना चुके पीके यानी प्रशांत किशोर अपनी इस छवि को तोड़ना चाहते थे। वह रणनीतिकार से राजनीतिकार बनने की दिशा में काम भी कर रहे थे। जनता दल (यू) में उपाध्यक्ष बनकर उन्होंने अपनी इमेज बिल्डअप करने की कोशिश भी की थी। लेकिन वहां की राजनीति उन्हें रास नहीं आई थी। अब वह कांग्रेस में यह मौका तलाश कर रहे थे। इसके लिए उन्हें कांग्रेस में मौका भी मिल रहा था। कांग्रेस भी इस बार गंभीरता से इसपर विचार कर रही थी। पिछले एक सप्ताह से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रशांत किशोर को पार्टी का हिस्सा बनाने के लिए चिंतन-मनन कर रहे थे। प्रशांत किशोर और पार्टी हाईकमान की भी इस बाबत कई बैठक हो चुकी थी। प्रशांत कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनावों में मजबूत स्थिति में ले जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने बकायदा ‘प्रशांत प्लान’ भी बनाया था। जिसकी करीब 600 स्लाइड वह तैयार कर चुके थे। कहे तो प्रशांत को पार्टी में जिम्मेदारी दिए जाने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार हो चुकी थी। उन्हें जिम्मेदारी दिए जाने की डेडलाइन 2 मई भी घोषित कर दी गई थी। लेकिन डेडलाइन से पांच दिन पहले ही प्रशांत किशोर ने एक ट्वीट करके सारे कयासों और राजनीतिक पंडितां के अनुमानों पर विराम लगा दिया।

प्रशांत किशोर ने अपने ट्वीट में कांग्रेस में शामिल होने से इनकार कर दिया। 26 अप्रैल को किए गए ट्वीट में उन्होंने लिखा कि ‘मैंने ईएजी (एम्पावर्ड एक्शन ग्रुप) के हिस्से के रूप में पार्टी में शामिल होने और चुनावों की जिम्मेदारी लेने के कांग्रेस के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। मेरी विनम्र राय ये है कि मुझसे ज्यादा पार्टी को नेतृत्व और सामूहिक इच्छाशक्ति की जरूरत है ताकि परिवर्तनकारी सुधारों के माध्यम से संरचनात्मक समस्याओं को ठीक किया जा सके, जिसकी जड़ें काफी गहरी हैं।’ इसके बाद पार्टी के प्रवक्ता रणजीत सुरजेवाला ने ट्वीट करके इसपर मोहर लगा दी। उन्होंने ट्वीट में लिखा कि ‘प्रशांत किशोर के प्रजेंटेशन और उनके साथ चर्चा के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक एक्शन ग्रुप 2024 का गठन किया है।
सुरजेवाला के अनुसार सोनिया गांधी ने प्रशांत किशोर को इस ग्रुप के हिस्से के तौर पर पार्टी में शामिल होने का न्यौता दिया था, जिसमें कुछ तय जिम्मेदारियां थी। प्रशांत किशोर ने इससे इनकार कर दिया है।’ साथ ही सुरजेवाला ने लिखा कि हम उनके प्रयासों और पार्टी को दिए उनके सुझावों की सराहना करते हैं।

इसके साथ ही कांग्रेस की राजनीति में पीके की संभावनाओं के द्वार बंद हो गए हैं। हालांकि यह द्वार पूरी तरह तो बंद नहीं हुए है लेकिन जिस तरह से कांग्रेस प्रशांत किशोर के बल पर 2024 में बढ़त बनाने का सपना देख रही थी वह सपना धूमिल हो गया। पिछले एक सप्ताह से प्रशांत को लेकर कांग्रेस में एक नई बहस छिड़ी थी। जिसमें कुछ नेताओं को अगर छोड़ दें तो अधिकतर उनके पार्टी में शामिल होने के पक्ष में थे। खुद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी प्रशांत के पक्ष में खड़े नजर आए। लेकिन अब ऐसे में सवाल यह खड़े हो गए हैं कि आखिर ऐसी क्या वजह रही कि प्रशांत किशोर कांग्रेस के तारणहार बनते-बनते रह गए।

इसको समझने के लिए पांच साल पीछे जाना होगा। तब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव थे। जिसमे प्रशांत किशोर को पार्टी के रणनीतिकार के तौर पर यूपी फतह करने की जिम्मेदारी दी गई थी। उस दौरान प्रशांत का जोश देखने लायक था। तब कहा जाने लगा था कि इस बार कांग्रेस यूपी में सम्मानजनक स्थिति में आ सकती है। इसके मद्देनजर कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन भी किया। गठबंधन में समाजवादी पार्टी को 311 सीट दी गई तो कांग्रेस के खाते में 114 सीट आई थी। लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो कांग्रेस को 114 में केवल सात सीटों पर ही संतोष करने पड़ा था। जबकि समाजवादी पार्टी को 47 सीटों पर जीत मिली थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 37 सीटों पर विजय हासिल हुई थी।
प्रशांत किशोर के चुनावी मैनेजमेंट संभालने के बावजूद कांग्रेस 2012 के मुकाबले 2017 में 30 सीटें कम जीती थी। तब कांग्रेस की करारी हार का ठीकरा प्रशांत किशोर के सिर पर फूटा था। यहां तक कि कांग्रेस के तत्कालीन उत्तर प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने तो प्रशांत किशोर को ‘साउंड रिकॉर्डिस्ट’ तक कह दिया था। तब उत्तर प्रदेश में प्रशांत की नाकामयाबी भी उनके पॉलिटिकल कॅरियर के साथ जुड़ चुकी थी। एक तरह से वह 2017 में कांग्रेस के ‘अभिमन्यु’ बनकर रह गए थे। तब कहा गया कि प्रशांत किशोर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कराने के लिए सहमत नहीं थे। लेकिन उनकी इच्छा के विरुद्ध सपा के साथ गठबंधन किया गया।

प्रशांत चुनावी रणनीतिकार के तौर पर कई राजनीतिक दलों के साथ काम कर चुके हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी के साथ, 2015 के बिहार चुनाव में नीतीश कुमार से लेकर आम आदमी पार्टी के साथ अपने राजनीतिक अनुभव दे चुके हैं। नीतीश कुमार ने उन्हें बकायदा अपनी पार्टी जेडीयू में उपाध्यक्ष भी बना दिया था। लेकिन बाद में नीतीश कुमार के साथ मतभेदों के चलते पार्टी ने उन्हें निकाल दिया था। इसके अलावा वह आंध्र प्रदेश में जगन रेड्डी और तमिलनाडु में डीएमके नेता एमके स्टालिन तो 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में कैप्टन अमरिंदर सिंह और तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी को अपनी प्रोफेशनल सेवाएं शेयर कर चुके हैं जिसमें लगभग सभी में वह कामयाब रहे हैं। प्रशांत किशोर के लिए 2021 का बंगाल का विधानसभा चुनाव सबसे ज्यादा प्रतिष्ठापूर्ण था, जिसमें उन्होंने खुद को साबित करके दिखाया था। उन्होंने गत पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल के साथ भी काम किया। इन सभी दलों ने प्रशांत किशोर और उनकी टीम को काम करने की पूरी आजादी दी। पार्टी संगठन ने भी चुनाव रणनीति को अमलीजामा पहनाने में उनकी पूरी मदद की। लेकिन कांग्रेस में ऐसा करना आसान नहीं है। पार्टी नेताओं की अपनी पसंद नापंसद है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस के राजनीतिक रथ के वह सारथी बनने से पीछे हट गए।

बताया जाता है कि सोनिया गांधी के साथ प्रियंका और राहुल गांधी प्रशांत किशोर को पार्टी में शामिल करने के पक्ष में थे। लेकिन वह नहीं चाहते थे कि यह एकतरफा फैसला लगे इसके चलते 10 जनपथ पर पार्टी के सभी मुख्यमंत्रियों और प्रमुख
नेताओं के साथ प्रशांत किशोर की बैठक कराई गई। वरिष्ठ नेतृत्व के साथ अपनी बैठकों के दौरान प्रशांत किशोर ने बताया था कि वह पार्टी प्रोटोकॉल के साथ काम नहीं कर सकते हैं। वह सीधे कांग्रेस अध्यक्ष को रिपोर्ट करना चाहते हैं। बताया जा रहा है कि प्रशांत किशोर का यह कहना कई वरिष्ठ नेताओं के लिए विवाद का विषय साबित हुआ है, जो वर्तमान में गांधी परिवार की आंख और कान कहे जाते हैं। उन सभी को ऐसा लगा कि अब प्रशांत की कार्य योजना से उनकी गांधी परिवार के प्रति भूमिका भी खतरे में पड़ सकती है। बताया जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने भी अपनी तरफ से कुछ मांग रखी थी। वह अपनी कार्य योजना को लागू करने के लिए फ्री हैंड चाहते थे। इसके साथ ही वह चुनावी राज्यों में रणनीति को लागू करने के लिए जरूरी अधिकार भी चाहते थे। प्रशांत की चाहत यह भी थी कि पार्टी की कमान सोनिया और राहुल के बजाय प्रियंका गांधी के हाथ में हो जिसके लिए कांग्रेस नेतृत्व अभी मन से पूरी तरह तैयार नहीं था।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। पार्टी का काम करने का अपना तरीका है। हर राज्य में पार्टी के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां हैं। पार्टी संगठन कमजोर है और अंदरुनी कलह चरम पर है। ऐसे में प्रशांत किशोर के लिए कांग्रेस का हाथ थामकर अपनी कार्य योजना को अमलीजामा पहनाना आसान नहीं होगा। पार्टी में हाईकमान कल्चर और निर्णयों में देरी से भी प्रशांत किशोर की चुनौतियां बढ़नी लाजिमी थी। कांग्रेस के कई नेताओं का तो यहां तक दावा है कि प्रशांत किशोर को लेकर गांधी परिवार में भी एक राय नहीं थी। राहुल गांधी प्रशांत किशोर को लेकर बहुत सहज नहीं थे। यही वजह है कि वह सिर्फ एक बैठक में शामिल हुए, जबकि प्रियंका गांधी लगभग हर बैठक में मौजूद थी। सोनिया गांधी के बारे में कहा जा रहा है कि वह भी प्रशांत के पार्टी नेतृत्व को लेकर दिए सुझावों से बहुत सहमत नहीं थी। इसलिए वह पार्टी में शामिल नहीं हो पाए।

 

टीआरएस से हुए करार पर भी था इंकार?


एक तरफ प्रशांत किशोर के कांग्रेस में शामिल होने की खबरें चल रही है तो दूसरी तरफ इस सब के बीच खुद प्रशांत किशोर हैदराबाद में सत्तारूढ़ टीआरएस अध्यक्ष एवं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के साथ बातचीत कर रहे थे। राव ने पिछले महीने ही कहा था कि प्रशांत उनके साथ पूरे देश में परिवर्तन लाने के लिए काम कर रहे हैं। इसके अलावा दोनों तेलंगाना में भी साथ काम कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि प्रशांत की कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपैक) अगले साल तेलंगाना में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के लिए सीएम के चंद्रशेखर राव की पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के लिए काम करेगी। दोनों के साथ हुए इस करार के कारण भी कांग्रेस में कई सवाल खड़े हो रहे थे। ऐसे में चर्चा हो रही थी कि कांग्रेस हाईकमान सोनिया गांधी की उस बात का क्या महत्व निकाला जाए जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी और दल के लिए वो काम नहीं करेंगे। भाजपा, जेडीयू, टीएमसी और दूसरे राजनीतिक दलों के साथ काम करने को लेकर पार्टी के कुछ नेताओं को प्रशांत पर पहले से ही आपत्ति भी थी जिसे उनके टीएसआर के साथ करार ने और मजबूती दे दी थी। हालांकि कहा यह भी जा रहा है कि प्रशांत अपनी कंपनी आईपैक से अलग हट चुके हैं।

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