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कांग्रेस के लिए पीके नहीं, प्रोग्राम जरूरी

कल के दिन सवाल उठ सकते हैं कि क्या राजनीतिक जंग जीतने के लिए राहुल गांधी को पार्टी के भीतर पले-बढ़े सलाहकारों का टोटा हो गया? क्या उनके पास जनता के लिए कोई ठोस कार्यक्रम या विजन नहीं रह गया जो कि प्रशांत किशोर (पीके) जैसे लोगों को रणनीतिक सलाह के लिए आयातित करना पड़ रहा है?

 

दाताराम चमोली

 

राजनीति में हार-जीत का सिलसिला चलता रहता है। बड़े-बड़े नेता चुनाव हार जाते हैं। इतिहास गवाह है कि अतीत में बड़े-बड़े नेता चुनाव हारे, लेकिन उन्होंने कभी अपना ‘आत्मबल’ नहीं खोया। वर्षों तक सड़कों पर जनता की लड़ाई लड़ी, मगर सत्ता में न आने का मलाल उन्हें विचलित नहीं कर पाया। सत्ता हासिल करने के लिए प्रोफेशनल रणनीतिकारों के बजाए उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं, दोस्तों और जनता पर ही भरोसा किया। बराबर उनके साथ संवाद बनाए रखा। लगातार जनहित के कार्यक्रम देकर अहसास कराते रहे कि इस देश के लिए उनकी अहमितयत है।

समझ में नहीं आता कि आज भारतीय राजनीति में यह ‘आत्मबल’ कम क्यों होता जा रहा है? क्या राजनेता अंदर से इतने खोखले हो चुके हैं कि उन्हें प्रोफेशनल की ज्यादा जरूरत महसूस होने लगी है। सुनते हैं कि इस बीच प्रशांत किशोर नामक एक शख्स जिन्हें कि बहुत बड़े रणनीतिकार के तौर पर पेश किया जा रहा है, उनकी कांग्रेस के गांधी परिवार से मुलाकात हुई है। मुलाकात का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि प्रशांत किशोर 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रणनीतिकार होंगे। वे बाकायदा कांग्रेस में शामिल भी होंगे। सोशल मीडिया में इस खबर को लेकर खूब चर्चा हो रही है। अगर खबर में वाकई दम है तो यह स्थिति कांग्रेस के लिए सोचनीय है। उस कांग्रेस के लिए जो कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और जिसने देश पर सबसे ज्यादा समय तक राज किया।

जिन राहुल गांधी पर कांग्रेस की भविष्य की उम्मीदें टिकी हुई हैं उन्हें अहसास करना होगा कि आखिर उनके पुरखों ने इस देश पर प्रोफेशनल रणनीतिकारों के बूते राज नहीं किया। ठीक है कि कांग्रेस अध्यक्ष अपने राजनीतिक सलाहकार रखते आए हैं, लेकिन वे कहीं से आयातित या ‘भाड़े’ के नहीं होते थे, बल्कि पार्टी के ही नेता या कार्यकर्ता होते थे। कल के दिन सवाल उठ सकते हैं कि क्या राजनीतिक जंग जीतने के लिए राहुल गांधी को पार्टी के भीतर पले-बढ़े सलाहकारों का टोटा हो गया? क्या उनके पास जनता के लिए कोई ठोस कार्यक्रम या विजन नहीं रह गया जो कि प्रशांत किशोर (पीके) जैसे लोगों को रणनीतिक सलाह के लिए आयातित करना पड़ रहा है?

राहुल गांधी अपने हिसाब से जो बेहतर समझेंगे करेंगे, लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना होगा कि स्वर्गीय इंदिरा जी और स्वर्गीय राजीव जी के नेतृत्व में भी कांग्रेस चुनाव हारी, लेकिन इन नेताओं की जनता में यदि लोकप्रियता बनी रही तो इसलिए कि उनका ‘आत्मबल’ काफी मजबूत था। इसी आत्मबल के कारण वे जनता का भरोसा जीतते रहे। जहां तक मेरी जानकारी है प्रोफेशनल्स का उनकी रणनीति में कोई स्थान नहीं था। मानते हैं कि आज हम संचार के युग में जी रहे हैं, लेकिन क्या इंटरनेट से ही सबकुछ कर लेंगे? यदि कोई रणनीतिकार इतना ही कामयाब है तो पहले उसी क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ने का साहस क्यों नहीं दिखाता जहां का वह मूल निवासी है? पश्चिम बंगाल का यदि कोई तर्क दे तो पचने वाली बात नहीं होगी। वहां ममता को बंगाल का आदमी ‘दीदी’ के तौर पर पूरी तरह सम्मान देता है। फिर राज्य का मुस्लिम वोटर उनके पक्ष में गोलबंद हो चुका था। हालात भाजपा के लिए अनुकूल जरा भी नहीं थे, फिर भी वह 80 विधानसभा सीटें जीत गई। उससे पहले लोकसभा में भी 20 सीटें जीती। वर्षों तक राज करने वाले वामपंथी और कांग्रेसी तो साफ ही हो गए। क्या प्रोफेशनल रणनीतिकारों के बजाए पार्टी की रीढ़ समझे जाने वाले कार्यकर्ताओं को मोब्लाइज करना ज्यादा जरूरी नहीं होगा? किसी भी युद्ध की रणनीति तो यही कहती है कि लड़ाई हवाई भी जरूरी है, लेकिन निर्णायक जंग तो जमीन पर ही होती है।

कांग्रेस

हालांकि हाईटेक चुनाव प्रचार आज के समय की जरूरत बन चुका है। सभी पार्टियां इसे अपना रही हैं, लेकिन जमीनी जंग के लिए कार्यकर्ताओं को संगठित करना सबसे ज्यादा जरूरी है।

भाजपा कार्यकर्ताओं की संख्या आज करोड़ों में है। उसे देश ही नहीं, बल्कि विश्व की बड़ी राजनीतिक पार्टियों में खड़ा किया जा रहा है। उसका मुकाबला किसी प्रोफेशनल के बूते नहीं बल्कि ठोस कार्यक्रम और विजन आगे रखने से ही संभव होगा। अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित कर जन विश्वास हासिल करने से ही होगा। तर्क दिया जा सकता है कि राहुल गांधी उस राजनीतिक घराने से हैं जिसकी भारत में एक खास पहचान है, लेकिन सोचने का विषय यह भी है कि इस वक्त भारत दुनिया का एक जवान देश माना जाता है। विश्व की सबसे ज्यादा युवा आबादी की है। सन् 1984 के बाद जन्मी युवा पीढ़ी में से कितने नेहरू, इंदिरा या राजीव राज के बारे मंे जानते होंगे? अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बूते ही कोई कब तक राजनीति में टिका रह सकता है? राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस की हालत आज यह है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद भी उसे हासिल नहीं है। इस खालीपन की भरपाई भी क्या कोई रणनीतिकार ही करेगा?

सत्ताधारी भाजपा लगातार यह संदेश देती आ रही है कि उसके शासन में देश की रक्षा सेनाओं का मनोबल ऊंचा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी किसी न किसी विषय पर लगातार जनता से संवाद बनाए रहते हैं। नतीजा यह है कि 2014 में पार्टी की जो सीटें 282 थी वह 2019 में 303 हो गईं, वोट प्रतिशत में भी 33 ़45 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। करोड़ों लोगों को राशन देना, उज्ज्वला रसोई गैस, मनरेगा मजदूरों का पैसा बढ़ाना जैसे मुद्दों के सहारे भाजपा 2024 में चुनावी मैदान में होगी। इस बीच सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोतरी भी कर दी गई है। धीरे-धीरे मीडियम क्लास यानी मध्य वर्ग को भी पार्टी संतुष्ट कर लेगी। ऐसे में कांग्रेस की चुनौतियां और बढ़ जाएंगी। भाजपा सरकार और संगठन ने 2024 के लिए काफी हद तक अपनी गोटियां बिठा ली हैं, लेकिन अपनी राज्य इकाइयों के आपसी मतभेदों में उलझी हुई कांग्रेस कहां तक पहुंची? क्या वह तय कर चुकी है कि अकेले चुनाव लड़ेगी या विपक्षी दलों को अपने छत्र के नीचे ला देगी? जो भी हो मौजूदा भाजपा सरकार का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को इस देश की जनता खासकर युवा पीढ़ी के लिए एक ठोस कार्यक्रम देने की जरूरत है, अपना खोया हुआ जनविश्वास पार्टी इसी से हासिल कर पाएगी? किसी प्रोफेशनल रणनीतिकार के भरोसे नहीं। आज कांग्रेस को इसी दिशा में आत्मंथन की ज्यादा जरूरत है।

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