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लॉकडाउन में पुलिस की बर्बरता के शिकार हो रहे हैं लोग, पत्रकार ने कुछ यूं साझा किया दर्द

लॉकडाउन में पुलिस की बर्बरता के शिकार हो रहे हैं लोग, पत्रकार ने कुछ यूं साझा किया दर्द

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए देश में 21 दिन का लॉकडाउन लागू किया गया है। ऐसे में आम लोगों के सामने कई मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। कई लोग प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान ही दुकानों में जा खड़े हो गए। हालांकि बाद में साफ कहा गया कि राशन, सब्जी और मेडिकल की दुकानें खुली रहेगी। बहुत जरूरत पड़ने पर लोग बाहर निकल सकते हैं। अनावश्यक तौर पर बाहर निकलने वालों के लिए पुलिस को छूट दी गई थी कि वे उन लोगों से सख्ती से पेश आएं। पुलिस इस कार्य को बखूबी निभा रही है। कई पुलिस अधिकारी हैं जो कई-कई दिनों तक अपने घर नहीं जा पा रहे हैं। रोड़ पर उन्हें सोना पड़ता है। रास्ते में कुछ मिलने पर खा लेते हैं। दिन-रात अपनी ड्यूटी पर अड़े हुए हैं। कहीं लोगों को रास्ता दिखाते हुए पुलिस वाले मिलेंगे, तो कहीं खुद का खाना गरीबों को खिलाते हुए और कहीं लोगों को समझाते हुए कि वो घर से न निकलें।

इन्हीं खाकी वर्दी वालों का एक और रूप है जो पुलिस वालों के किए अच्छे कामों का धज्जियां उड़ा देता है। ऐसे वक्त में लोग कोरोना से ज्यादा अपने और अपने परिवार वालों को लेकर चिंता है। किसी के यहां खाने को कुछ नहीं। किसी के यहां बुजुर्ग हैं, छोटे बच्चे हैं जो बीमार हैं। ऐसे लोगों को न चाहते हुए भी जान हथेली पर लेकर बाहर निकलना पड़ रहा है। लेकिन जिस तरह से मजबूरी में बाहर काम से निकले लोगों को पुलिस द्वारा मारा-पीटा जा रहा है वह भी बाहर निकलने का बिना कारण सुने, वह निंदनीय है।

वाराणसी में पूर्व सभासद मणि सिंह अपनी पत्नी के साथ दवा लेने जा रहे थे। रामनगर चौराहे के पास पहुंचे ही थे। दरोगा ने उनकी जमकर पिटाई कर दी। उनकी पत्नी के साथ भी बदसुलूकी की गई है। दूसरा एक वीडियो है जिसे बॉलीवुड डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने शेयर की है। इस वीडियो में एक शख्स राशन कासामान स्कूटी पर लेकर जाते हुए दिख रहा है और पुलिस वाले उस पर डंडे बरसा रहे हैं। उन्हें स्कूटी में रखें राशन की बोरिया नहीं दिखती। अनुभव सिन्हा ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “क्या किसी को ऐसे पीटना कानूनी तौर पर जायज है?”

ऐसे ही दिल्ली में एक व्यक्ति अपने बच्चें के लिए दवा लाने जा रहा था। पुलिस देखते ही उसपर लाठियां की बारिश कर दी। जिससे उस व्यक्ति का हाथ टूट गया। ये तो बात रही आम आदमी की। दिल्ली के एक जिम्मेदार पत्रकार नवीन कुमार के साथ जो घटा है, उसे सुनकर कोई भी दंग रह जाएगा। पत्रकार नवीन कुमार ने अपने साथ हुए पुलिसिया बर्बरता के संबंध में बहुत मार्मिक और भीतर तक हिला देने वाली घटना को अपने फ़ेसबुक वॉल पर साझा किया है। आप भी पढ़े:

प्यारे साथियों,

इस तरह से यह पत्र लिखना बहुत अजीब-सा लग रहा है। लेकिन लगता है कि इस तरह से शायद मेरा दुख, मेरा क्षोभ और वह अपमान जिसकी आग मुझे ख़ाक कर देना चाहती है उससे कुछ हद तक राहत मिल जाए। एक बार को लगा न बताऊं। यह कहना कि पुलिस ने आपको सड़क पर पीटा है कितना बुरा एहसास है। लेकिन इसे बताना जरूरी भी लगता है ताकि आप समझ सकें कि आपके साथ क्या कुछ घट सकता है। वह भी देश की राजधानी में।

कोरोना से लड़ाई में मेरे सैकडों पत्रकार साथी बिना किसी बहाने के भरसक काम पर जुटे हुए हैं। मैं भी इसमें शामिल हूं। आज दोपहर डेढ़ बजे की बात है। मैं वसंतकुंज से नोएडा फिल्म सिटी अपने दफ्तर के लिए निकला था। सफदरजंग इन्क्लेव से होते हुए ग्रीन पार्क की तरफ मुड़ना था। वहीं पर एक तिराहा है जहां से एक रास्ता एम्स ट्रॉमा सेंटर की तरफ जाता है। भारी बैरिकेडिंग थी। पुलिस जांच कर रही थी। भारी जाम लगा हुआ था। मेरी बारी आने पर एक पुलिसवाला मेरी कार के पास आता है। मैंने नाम देखा ग्यारसी लाल यादव। दिल्ली पुलिस। मैंने अपना कार्ड दिखाया और कहा कि मैं पत्रकार हूं और दफ्तर जा रहा हूं। मेरी भी ड्यूटी है। उसने सबसे पहले मेरी कार से चाबी निकाल ली। और आई कार्ड लेकर आगे बढ़ गय। आगे का संवाद शब्दश: इस तरह था।

कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – माधर&^%$, धौंस दिखाता है। चल नीचे उतर। इधर आ।

मैं पीछे पीछे भागा। उसने दिल्ली पुलिस के दूसरे सिपाही को चाबी दी। मेरा फोन और वॉलेट दोनों बगल की सीट पर रखे थे। मैंने कहा आप ऐसा नहीं कर सकते। अपने अधिकारी से बात कराइए।

कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – मैं ही अधिकारी हूं माधर^%$।

मैंने कहा आप इस तरह से बात नहीं कर सकते। तबतक उसने एक वैन में धकेल दिया था। मैंने कहा मोबाइल और वॉलेट दीजिए। तबतक दो इंस्पेक्टर समेत कई लोग वहां पहुंच चुके थे। एक का नाम शिवकुमार था, दूसरे का शायद विजय, तीसरे का ईश्वर सिंह, चौथे का बच्चा सिंह। मैंने कहा आप इस तरह नहीं कर सकते। आप मेरा फोन और वॉलेट दीजिए। तबक इंस्पेक्टर शिवकुमार ने कहा ऐसे नहीं मानेगा मारो हरामी को। और गिरफ्तार करो।

इतना कहना था कि तीनों पुलिसवालों ने कार में ही पीटना शुरु कर दिया। ग्यारसी लाल यादव ने मेरा मुंह बंद कर दिया था ताकि मैं चिल्ला न सकूं। मैं आतंकित था।

आसपास के जिन गाड़ियों की चेकिंग चल रही थी वो जुटने लगे तो पुलिस ने पीटना बंद कर दिया। मैं दहशत के मारे कांप रहा था। मैंने अपना फोन मांगा। तो उन्होंने मुझे वैन से ही जोर से धक्का दे दिया। मैं सड़क पर गिर पड़ा। एक आदमी ने मेरा फोन लाकर दिया। मैंने तुरंत दफ्तर में फोन करके इसके बारे में बताया।

मैंने सिर्फ इतना पूछा कि आपलोग किस थाने में तैनात हैं। इंस्पेक्टर शिव कुमार ने छूटते ही कहा तुम्हारे बाप के थाने में। ग्यारसी लाल यादव ने कहा हो गया या और दूं। उन्हीं के बीच से एक आदमी चिल्लाया सफदरजंग थाने में हैं बता देना अपने बाप को।

कार में बैठा तो लगा जैसे किसी ने बदन से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरा दिमाग सुन्न था। आंखों के आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि इतने आंसू कहां से आए।

मुझे पता है कि जिस व्यवस्था में हम सब जीते हैं वहां इस तरह की घटनाओं का कोई वजूद नहीं। मुझे यह भी पता है कि चौराहे पर किसी को पीट देना पुलिस की आचार संहिता में कानून व्यवस्था बनाए रखना का एक अनुशासन है। और मुझे यह भी पता है कि इस शिकायत का कोई अर्थ नहीं।

फिर भी मैं इसे इसलिए लिख रहा हूं ताकि यह दर्ज हो सके कि हमारे बोलने, हमारे लिखने और हम जिस माहौल में जी रहे हैं उसमें कितना अंतर है। हमारी भावनाएं कितने दोयम दर्जे की हैं। हमारे राष्ट्रवादी अनुशासन का बोध कितना झूठा, कितना मनगढ़ंत और कितनी बनावटी हैं।

यह सबकुछ जब मैं लिख रहा हूं तो मेरे हाथ कांप रहे हैं। मेरा लहू थक्के की तरह जमा हुआ है। मेरी पलकें पहाड़ की तरह भारी हैं और लगता है जैसे अपनी चमड़ी को काटकर धो डालूं नहीं तो ये पिघल जाएगा। अपने आप से घिन्न सी आ रही है।

यह सब साझा करने का मकसद आपकी सांत्वना हासिल करना नहीं। सिर्फ इतना है कि आप इस भयावह दौर को महसूस कर सकें। जब हमारी नागरिकता का गौरवबोध किसी कॉन्स्टेबल, किसी एसआई के जूते के नीचे चौराहे पर कुचल दी जाने वाली चीज है।

मैं शब्दों में इसे बयान नहीं कर सकता कि यह कितना अपमानजनक, कितना डरावना और कितना तकलीफदेह है। ऐसा लगता है जैसे यह सदमा किसी चट्टान की तरह मेरे सीने पर बैठ गया है और मेरी जान ले लेगा। और यह लिखना आसान नहीं था।

आपका साथी
नवीन

ऐसी अमानवीय घटना के प्रति कई लेखकों और पत्रकारों ने अपना विरोध दर्ज करते हुए नवीन कुमार के इस पोस्ट को अपने फ़ेसबुक वॉल पर शेयर किया है। इसलिए इस पोस्ट को ज्यों-का-त्यों आप तक पहुंचाया। पुलिस की ऐसी अमानवीय रवैये किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं की जा सकती है।

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