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‘पापा मैं PCS बन गई ‘ : कहानी कोमल बैसला की 

‘दंगल मूवी में एक डायलॉग याद है न …… “म्हारी छोरियां छोरों से कम है के” ( मेरी बेटियां बेटों से कम हैं क्या ) …जिसे सच साबित कर दिखलाया है कोमल बैसला ने । आइए आप सबको कोमल के संघर्ष और सफलता से रूबरू कराते हैं ।

 

उत्तर प्रदेश का बागपत जिला ।  उसके छोटे से गांव डगरपुर से मध्यम वर्गीय परिवार की लड़की   । जिसका नाम कोमल बैसला  है । बचपन से ही कुछ बड़े ख्वाब देख रही थी ।

 

घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि , 12 वी के बाद की पढ़ाई करने के लिए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना और फिर उससे अपनी पढ़ाई करना ।
पढ़ाई में औसत रहने वाली लड़की अपने मेहनत के दम पर 2010 में बतौर दिल्ली पुलिस सिपाही भर्ती हो जाती है। मां बाप परिवार के लिए इससे बड़े गर्व की बात क्या हो सकती थी । किंतु कोमल की आंखों में तो अफसर बनने का सपना उन्हें चैन कहां से लेने देता ।
कहते हैं ना कि सपने वह नहीं होते जो सोते वक्त देखे जाते हैं बल्कि सपने तो वह होते हैं जो सोने ही नहीं देते । कोमल दिन की 8 घंटे की ड्यूटी करके भी रोज पढ़ाई किया करती थी ।

 

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सब कुछ ठीक चलता रहा । लेकिन कहते हैं ना कि बड़े सपनों को पूरा करने में झंझावात भी बड़े आते हैं। समाज में रिश्तेदार एवं कुछ लोगों की ऐसी भी प्रजाति पाई जाती है , जिसे आपके कैरियर के बारे में आप से भी ज्यादा चिंता होती है । लोग मुफ्त में सलाह देना शुरू कर देते हैं । कोमल का संघर्ष भी कई गुना बढ़ चुका था । अब उसे ड्यूटी भी करनी होती थी, पढ़ाई भी करनी होती थी, और मां-बाप रिश्तेदारों को समझाना भी होता था ।

 

दरअसल,  कोमल जिस पृष्ठभूमि से आती है , उस समाज में लड़कियों के लिए कैरियर क्षेत्र सीमित हैं । कोमल ने यह साबित कर दिखाया कि लड़कियां लड़कों से किसी भी क्षेत्र में कम नहीं ।  बस समाज लड़कियों पर भरोसा करना तो शुरू करें । और देखिए मेहनत के दम पर कोमल ने यह साबित कर दिखाया भी । पीसीएस 2020 के फाइनल लिस्ट में अपना नाम देखकर कोमल के आंखों में खुशी के आंसू थे तो मन में सपना पूरा होने का संतोष भी !

 

कुछ सेकंड में ही कोमल के मन में कई वर्षों का संघर्ष फ्लैशबैक की तरह कौंध जाता है । लंबे वक्त का संघर्ष और फिर सफलता के मिश्रित भाव मन में लेकर कोमल ने सबसे पहले पापा को फोन लगा दिया था ।

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कोमल : हेलो पापा नमस्ते !

पापा : नमस्ते बेटी ! कैसी हो ?

कोमल: पापा में पीसीएस अफसर बन गई…

पापा: ..(लंबा मौन.. शायद भावुक हो गए होंगे)

 

रुंधे गले से बेटी को बधाई देते हुए यह कहते हैं .. मुझे तुम पर गर्व है ; सभी बाप को तुम्हारी जैसी बेटियां नसीब हो!

 

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कोमल अब अपने जिले की ‘रोल मॉडल’ बन चुकी हैं । बैंड बाजा ,फूलों से पूरे गांव ने स्वागत किया अपनी इस बेटी का । चल पाने में दिक्कत महसूस करने वाली दादी भी अपनी इस पोती को छू लेना चाहती हैं , स्नेह बरसा देना चाहती हैं ।

 

‘ग्राम पाठशाला’ की टीम ने कोमल के हाथों लाइब्रेरी का उद्घाटन कराया । अपनी इस बेटी पर ग्राम पाठशाला की टीम को नाज़ है । सच है … कोमल ने साबित कर ही दिया कि, बेटियां बेटों से कम नहीं

कर दिखाने का मौका जब भी किस्मत देती है
गिन के तैयारी के दिन तुझको मोहलत देती है
मांगती है लागत में तुझसे हर बूँद पसीना
पर मुनाफा बदले में ये जान ले बेहद्द देती है”

साभार : विकास मिश्र, समीक्षा अधिकारी सचिवालय लेखक समीक्षा दृष्टि

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