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‘‘मैं ने अपनी सहेली को नहीं मारा। उस दिन हम दोनों स्कूल में लंच एक साथ कर रहे थे। उसे प्यास लगी। उसने पानी मांगा तो मैंने अपना पानी दे दिया। पानी पीते ही वह चिल्लाने लगी। मैंने ही मैम और सर को बुलाया। सर उसे डॉक्टर के पास ले गए। मगर वह . . .।’’ इतना कहते ही पिंकी (बदला हुआ नाम) फफक कर रोने लगती है। उसके बाद वह कुछ नहीं बोल पाती। दरअसल, पिंकी ने खुद की जानकारी के मुताबिक अपनी सहेली को पानी ही दिया था, मगर उसके वाटर बोतल में पानी नहीं एसिड था। जिसे पानी समझकर पीने से एक नाबालिग छात्रा की मौत हो गई। यह घटना पिछले सप्ताह दिल्ली के हर्ष विहार स्थित एक स्कूल में घटी।
आखिर इस घटना के लिए किसे दोषी माना जाए? पिंकी को, जिसने अपनी प्यासी सहेली को अपना पानी पीने दिया या फिर स्कूल को, जिसने अपने छात्र-छात्रों के पानी और लंच को चेक नहीं किया। यहां यह भी सवाल उठता है कि क्या ऐसा संभव है कि स्कूल अपने सभी बच्चों का लंच और पानी टेस्ट कर चेक करे? क्या पिंकी के घर वाले दोषी हैं, जिन्होंने अपने घर में शौचालय साफ करने के लिए एसिड रखा था या सरकार और उसकी व्यवस्था को दोषी ठहराया जाए, जो पाबंदी के बाद भी दिल्ली में एसिड की बिक्री पर रोक नहीं लगा पाई। उच्चतम न्यायालय ने एक बार नहीं, बल्कि कई बार सभी राज्य सरकारों को एसिड की खरीद-बिक्री पर सख्त कानून बनाने का आदेश दिया है। आखिर उच्चतम न्यायालय से कुछ दूरी पर स्थित दिल्ली के हुक्मरानों तक यह आदेश अभी तक क्यों नहीं पहुंच पाया। दिल्ली की सरकार राजनीति से आगे कुछ नहीं कर रही है। कहने को तो दिल्ली में आम आदमी की सरकार है पर इनमें और भाजपा या कांग्रेस की सरकार में कोई खास अंतर नहीं दिखता।
उस दिन किसी न किसी एक की मौत होने वाली थी, क्योंकि उस दिन पिंकी अपने घर से जीवनदायिनी पानी नहीं, बल्कि खतरनाक एसिड ले आई थी। वह एसिड को पानी समझकर अपने साथ लेकर आई थी। यदि उसकी सहेली पानी नहीं मांगती तो वह खुद उसे पीती। यानी उस दिन किसी एक की मौत जरूर होती। दिल्ली या देश के विभिन्न शहरों में एसिड अटैक से लड़कियों या दूसरों को नुकसान पहुंचाने की खबरें आज भी आती रहती हैं। एसिड अटैक पर देश में मुहिम भी चलाई गई। कई संस्थाएं बनाई गई, जो एसिड हमले की शिकार लड़कियों को मदद करती है। दिल्ली में एसिड अटैक से नहीं, बल्कि उसे पानी समझकर पीने से नाबालिग की मौत हुई है। फिर भी सरकार इस पर गंभीर नहीं दिखती है। प्रशासन में भी कोई बदलाव नहीं दिखता। कुछ राज्यों को छोड़ दें तो अधिकतर राज्यों ने इस पर कानून नहीं बनाए हैं। कानून नहीं बनाने वाले राज्यों में दिल्ली भी शामिल है।
एसिड से प्रभावित लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले साल 2013 में आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए कि इस पर रेगुलेशन बनाएं। एसिड अटैक की शिकार महिलाओं के लिए सरकार मदद सुनिश्चत करे। इसके तहत केंद्र की ओर से एसिड अटैक की शिकार महिलाओं को मुआवजा देना भी शामिल है। बताया जाता है कि पहले प्रभावित महिलाओं को तीन लाख का मुआवजा सरकार से मिलता था। जिसे केंद्र सरकार की अनुशंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ा कर सात लाख कर दिया। दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट के 2013 और 2015 के निर्देशों के तहत नया कानून नहीं बना पाई है। कानून बनाना तो दूर उसके अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन तक नहीं करवा पाए हैं। जिस कारण राजधानी दिल्ली में आज भी गली-मुहल्लों में एसिड खुले आम बिक रही है। एसिड की बिक्री पर कोई प्रभावशाली अंकुश लगा पाने पर सरकार नाकाम रही है।
कोर्ट ने दिल्ली सहित सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिए थे कि वे जल्द से जल्द 100 साल पुराने कानून की जगह नया कानून बनाएं। केंद्र ने भी इसको लेकर सभी राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर निर्देश दिए, पर उसका भी कोई असर नहीं दिखता। सुप्रीम कोर्ट और केंद्र की कोशिशें तब तक सफल नहीं होंगी, जब तक दिल्ली सरकार कानून में संशोधन नहीं करे। केंद्र ने राष्ट्रीय विधि सेवा प्राधिकरण (नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी) के साथ मिलकर जो नीति बनाई है, उसके अंतर्गत एसिड की शिकार युवतियों को 7 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा, लेकिन दिल्ली सरकार नया कानून बनाने में विफल रही है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन 500 एसिड अटैक सरवाइवर्स हैं। इन्हें लोगों की सहानुभूति तो मिलती है, मगर आर्थिक मदद नहीं मिलती है। एसिड हमलों के शिकार लोगों को कई साल करेक्टिव सर्जरी करानी पड़ती है। हमलों की शिकार अधिकतर गरीब महिलाएं होने के कारण सर्जरी के लिए उनके पास पैसे नहीं होते हैं। ऐसे में प्रभावित महिलाओं की जिदंगी मरने से भी ज्यादा दर्दनाक होती है।
पिंकी की सहेली की तो मौत हो गई। लेकिन एसिड अटैक की शिकार महिलाएं जिंदा लाश से कम नहीं रह जाती हैं। ऐसी महिलाओं को समाज से भी ताना सुनना पड़ता है। साथ ही उन्हें समाज अपनाने को तैयार नहीं होता। मगर पिंकी के मामले में दो परिवार प्रभावित हैं। पिंकी और उसके परिवार पर अब कार्रवाई की तलवार लटकी हुई है, तो उसकी सहेली के परिवार ने अपना बच्चा ही खो दिया है। इस घटना में स्कूल प्रशासन और पिंकी के परिवार पर केस दर्ज किया गया है। हर्ष विहार थाने के सब इंस्पेक्टर राजीव कुमार ने बताया, ‘यह मामला लापरवाही का है। इसलिए आईपीसी की धारा 304ए के तहत मामला दर्ज किया गया है। अभी इसमें किसी का नाम दर्ज नहीं किया गया है।’
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के डीसीपी अतुल कुमार ठाकुर से इस संबंध में पूछा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली में तेजाब बेचना गैर-कानूनी है तो फिर पिंकी के परिवार वालों ने एसिड कैसे खरीदा। क्या ऐसे में पिंकी के परिवार पर कार्यवाही होगी? मगर डीसीपी ठाकुर ने इसका जवाब नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि जांच जारी है। पुलिस की जांच में जो भी हो, मगर इस घटना ने दोनों परिवार को पूरी तरह से तोड़ दिया है। प्रश्न केवल एसिड अटैक से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि देश के शीर्ष न्यायालय तक के आदेशों की अवहेलना का भी है। चाहे पर्यावरण से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश हों या फिर निर्भया बलात्कार कांड के बाद रेप पीड़ितों की बाबत अदालती आदेश हों, हमारी शासन व्यवस्था पूरी तरह असंवेदनशील और निष्प्रभावी हो चुकी है। ऐसे में बड़ा प्रश्न लोकतंत्र की सार्थकता पर आ जाता है।
‘गंभीर नहीं सरकार’
कानून विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह से बातचीत
इस घटना में दोषी कौन है?
देखिए, जिस बच्ची ने पानी दिया, उस पर और उसके परिवार पर लापरवाही का मामला बनता है। इसलिए आईपीसी की धारा 304ए की तहत मामला दर्ज किया गया है। चूंकि बच्ची नाबालिग है और परिस्थिति बताता है कि उस छोटी सी बच्ची ने पानी और एसिड का बोतल एक जैसा होने के कारण अंतर नहीं समझ पाई। ऐसे में बच्ची पर केस नहीं बनेगा। मगर उनके परिवार पर केस बनता है। हो सकता है, यदि उनकी लापरवाही सिद्ध हो जाती है तो परिवार को 2 से 3 साल की सजा हो जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने एसिड बिक्री पर रोक लगाई हुई है, फिर भी दिल्ली जैसे मैट्रो सिटी में यह खुलेआम बिक रहा है क्यों?
क्यों बिक रहा है, इसका जवाब तो सरकार या अधिकारी देंगे। मगर मैं इतना बता दूं कि वर्ष 2013 और उसके बाद 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सभी राज्य सरकारों को इस पर कानून बनाकर उसे लागू करने के निर्देश दिए थे। आज भी देश के कई राज्यों ने कानून नहीं बनाया है। यहां सरकार की कमी है। सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी अब गंभीरता से नहीं ले रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसिड बनाने के लिए क्या कोई गाइडलाइन भी जारी की है?
गाइड लाइन के साथ कानून राज्य सरकार को बनाना है। ऐसे सुप्रीम कोर्ट ने मोटा-मोटी गाइड लाइन बताए हैं। जैसे, एसिड बिक्रता को लाइसेंस लेना होगा। खरीदने वाले को अपना आई कार्ड देना होगा और एसिड खरीदने के उद्देश्य बताने होंगे। एसिड बिक्रेता को बेचने और खरीदने की ऑडिट रिपोर्ट तैयार रखनी होगी। एसिड अटैक पीड़िता को मुआवजा देने की भी बात इसमें है। इस केस में देखना होगा कि मरने वाली बच्ची को एसिड अटैक पीड़िता माना जाता है या नहीं।

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