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विकल्प की कोशिशें तेज

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी दलों की ओर से भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बनाने के प्रयास हुए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अब 2024 के लिए विपक्षी दलों ने फिर कोशिशें शुरू कर दी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिशों में पिछले कुछ महीनों से काफी तेजी आई है। मोदी के खिलाफ संयुक्त विपक्ष बनाने की अपील सबसे पहले ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव के दौरान की थी। यही वजह है कि बंगाल चुनाव में जीत के बाद ममता बनर्जी विपक्ष का सबसे मजबूत चेहरा बनकर उभरीं। तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता ने कुछ दिन पहले अपने दिल्ली दौरे पर विपक्षी नेताओं से मुलाकात की। इस बीच पिछले दिनों मिशन 2024 को लेकर कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुवाई में कई विपक्षी दलों की बैठक भी हुई। इस बैठक के बाद अब विपक्षी एकजुटता की सियासी पहल को जमीन पर उतारकर उसे कार्यान्वित करने की जरूरत को देखते हुए प्रमुख विपक्षी दलों की एक संयुक्त समन्वय समिति जल्द बनाए जाने के संकेत हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की अगुआई में हुई 19 विपक्षी दलों के नेताओं की बैठक में समन्वय समिति के गठन पर सैद्धांतिक सहमति बनी है।

भाजपा सरकार के खिलाफ विपक्षी पार्टियों के राजनीतिक अभियान से लेकर आंदोलनों को संगठित और प्रभावी बनाने के मकसद से इस संयुक्त समन्वय समिति के गठन की तैयारी की जा रही है। विपक्षी नेताओं की बैठक में बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने समन्वय समिति के गठन का सुझाव देते हुए इसकी जरूरत बताई और कहा कि भाजपा व मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ विपक्षी पार्टियों का एक साथ आना जरूरी हो गया है। इसमें यह भी अहम होगा कि प्रमुख राष्ट्रीय और राजनीतिक मुद्दों पर विपक्षी दलों के बीच निरंतर आपसी संवाद एवं समन्वय का सिलसिला बना रहना चाहिए। विपक्षी दलों ने 20 अगस्त की बैठक के बाद पेगासस जासूसी कांड, कृषि कानूनों को रद्द करने, महंगाई से लेकर बेरोजगारी और कोरोना की दूसरी लहर में बड़ी संख्या में लोगों के जान गंवाने के खिलाफ 20 से 30 सितंबर तक संयुक्त विरोध- प्रदर्शन करने का ऐलान किया है।

2024 के आम चुनाव के मद्देनजर विपक्षी एकजुटता की शुरू हुई इस पहल के क्रम में यह पहला मौका है, जब विपक्ष की 19 पार्टियों ने एकजुट होकर इन मुद्दों पर सरकार को संसद के बाद सड़क पर घेरने का फैसला किया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि एकजुट विपक्षी पार्टियां देश की 60 फीसद से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं। जाहिर तौर पर इस लिहाज से मोदी सरकार के खिलाफ अपने पहले बड़े सियासी अभियान को जमीन पर सफल बनाना विपक्षी दलों के लिए बड़ी चुनौती है। इसीलिए संभावना जताई जा रही है कि संयुक्त समन्वय समिति का गठन इसके पहले कर दिया जाएगा। अब बड़ा सवाल यह है कि किसके नेतृत्व में संयुक्त समन्वय समिति का गठन होगा। भले ही लंबे अरसे के बाद 19 विपक्षी दलों के नेता एक साथ बैठे हैं, संसद के मानसून सत्र में साथ-साथ चले, लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि जिस समन्वय समिति के गठन की बात की जा रही है उसका नेता कौन होगा? कांग्रेस को छोड़कर यदि देखा जाय तो जितनी भी पार्टियां सोनिया गांधी की बैठक में शामिल हुई थी उनका जनाधार उनके राज्य के बाहर कहीं नहीं है। ममता बनर्जी बंगाल तक सीमित हैं तो शरद पवार का महाराष्ट्र के बाहर कहीं जनाधार नहीं है। इसी तरह लालू यादव का जनाधार बिहार के बाहर नहीं है। अखिलेश यादव और या मायावती दोनों उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं। ममता बनर्जी और शरद पवार दोनों की नजर दिल्ली की कुर्सी पर है। पिछले दिनों जिस तरह से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के साथ शरद पवार ने दो-दो बैठकें की और विपक्षी एकता कायम करने का प्रयास किया उसके भी अपने मायने हैं।

दरअसल, विपक्षी दलों के विकल्प में सबसे बड़ा रोड़ा यह है कि कोई भी खुद को किसी को कम नहीं समझता। कांग्रेस खुद को राष्ट्रीय पार्टी मानते हुए अहसास कराती है कि उसी के नेतृत्व में विकल्प बने, जबकि विपक्षी दल राहुल गांधी को अपना नेता स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। ममता बनर्जी को कांग्रेस, सपा, बसपा या एनसीपी भला क्यों अपना नेता मानें या ममता इन पार्टियों के सामने खुद को बौना क्यों बनाएं?

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