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भाजपा और पीएम के खिलाफ विपक्षी गोलबंदी की अगुवाई को लेकर विपक्षी एकता की 12 जून को पटना में होने वाली बैठक के टलने से कई सवाल खड़े हो गए हैं। इनमें सबसे पहला सवाल यह कि क्या नीतीश के बारे में विपक्ष की शंकाएं बरकरार हैं? क्या 2024 के आम चुनाव में मोदी विरोधी मुहिम की अगुवाई नीतीश कुमार को मिलने में पेंच फंसने लगा है? क्या विपक्ष की अगुवाई को लेकर गतिरोध पैदा हो गए हैं? क्या कांग्रेस गोलबंदी में खुद की अगुवाई का संदेश देने लगी है? ऐसे कई सवालों की वजह बना है बीते हफ्ते पटना में होने वाली विपक्षी बैठक का टल जाना। हालांकि अब यह बैठक 23 जून को होनी प्रस्तावित हुई है। लेकिन फिर भी कहा जा रहा है कि नीतीश पर विपक्ष की शंकाएं बरकरार हैं। यहां तक कि कई ऐसे दल हैं जिन्होंने बैठक से पहले ही किनारा कर लिया है। इसमें सबसे बड़ा नाम तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर का है।

राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि जिस तरह नीतीश कुमार और उनके डिप्टी सीएम तेजस्वी इस रैली को लेकर उत्साहित थे, उससे लगता यही था कि इस रैली के बाद विपक्ष मौजूदा केंद्रीय सत्ता के खिलाफ गोलबंद होगा, जैसे 49 साल पहले पटना में ही हुई रैली के बाद तत्कालीन इंदिरा सरकार के खिलाफ मुहिम शुरू हुई थी। यह भी अनुमान लगाया जा रहा था कि इसके बाद अपने बेदाग राजनीतिक दामन के चलते नीतीश कुमार पीएम मोदी विरोधी मुहिम के स्वाभाविक नेता के तौर पर उभरेंगे। लेकिन बैठक का टलना बताता है कि विपक्षी खेमे में सब कुछ वैसे नहीं चल रहा है।

दरअसल कांग्रेस इस बैठक से किनारा करने लगी थी। पहले से ही व्यस्तता के बहाने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसमें शामिल होने से इनकार कर दिया था। इस बीच तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भी इस बैठक में शामिल न होने के लिए अपनी किसी व्यस्तता का बहाना बना चुके थे। ऐसे में बैठक को टलना ही था। गौरतलब है कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के पहले तक ऐसा लग रहा था कि मोदी के खिलाफ आक्रामक अभियान में नीतीश की अगुवाई को कुछ किंतु-परंतु के बाद विपक्षी खेमा स्वीकार कर लेगा। लेकिन 13 मई को आए कर्नाटक विधानसभा चुनाव नतीजों ने स्थितियां बदल दी हैं। हार-दर-हार हलकान रही कांग्रेस को मिली बड़ी जीत ने उसकी सोच को बदल दिया है। इसमें दो राय नहीं कि अब भी भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस ही है, लेकिन अतीत की हारों से वह मोदी विरोधी गोलबंदी की अगुआई से हिचक रही थी। कर्नाटक ने उसके खोए हुए आत्मविश्वास को वापस लौटा दिया है। ऐसे में भला वह क्यों स्वीकार करने लगी कि किसी छोटे से दल का नेता उसकी अगुवाई करे?

राजनीतिक पंडितों की मानें तो ऐसा नहीं कि कांग्रेस पहले नहीं चाहती थी कि विपक्ष का नेतृत्व वही करे। उसकी इस मंशा को ममता बनर्जी भांप रही थीं। वैसे भी ममता पूर्व कांग्रेसी हैं और वे कांग्रेस के मानस को ठीक से समझती हैं। इसीलिए उन्होंने ही नीतीश कुमार को पटना में बैठक कराने का सुझाव दिया था। बहाना बना था 1974 का बिहार आंदोलन तब बिहार से ही इंदिरा विरोधी रणभेरी फूंकी गई थी। ममता को लगता था कि पटना की बैठक के बाद नीतीश की अगुआई पर परोक्ष मुहर लग जाएगी और इस बहाने कांग्रेस पर दबाव भी बनेगा कि जिन राज्यों में स्थानीय दल ताकतवर हैं, वहां कांग्रेस उनकी मदद करे।

ममता को लगता था कि अगर कांग्रेस अपने हाथ में नेतृत्व रखेगी तो मोदी विरोधी चुनावी संग्राम में वह ताकतवर क्षेत्रीय दलों के राज्यों में भी अपने ढंग से गठबंधन थोपने की कोशिश करेगी। इससे स्थानीय दलों के प्रदर्शन पर असर पड़ सकता है। लगता है कि कांग्रेस ममता की इस रणनीति को भी भांप गई और उसने पटना बैठक में शामिल न होने के लिए बहानों की फेहरिस्त पेश कर दी। इसलिए नीतीश का त्यागी दांव भी काम नहीं आ रहा है। दो महीने पहले नीतीश के सिपहसालार राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन ने अपनी अध्यक्षता में जनता दल यू की कार्यकारिणी का गठन किया था, लेकिन तब पार्टी के बड़े नेताओं में शुमार केसी त्यागी को कोई जगह नहीं मिली थी। ऐसा नहीं हो सकता कि त्यागी की रुखसती बिना नीतीश की मर्जी के हुई होगी। नीतीश भी जनता दल यू के वैसे ही आलाकमान हैं जैसे वंशवादी दलों का आलाकमान होता है। जनता दल यू में भी अध्यक्ष की हैसियत नीतीश के सामने कुछ भी नहीं है। लेकिन मोदी विरोधी अभियान छेड़ने के बाद उन्हीं केसी त्यागी की उपयोगिता नीतीश कुमार को समझ आने लगी। नीतीश को उम्मीद है कि विपक्षी लामबंदी में केसी त्यागी के राजनीतिक रिश्ते सहयोगी हो सकते हैं।

नीतीश की कोशिशों से 1987 के विपक्षी अभियानों की याद आना स्वाभाविक है। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी बोफोर्स घोटाले के आरोपों से जूझ रहे थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुआई में अरुण नेहरू, रामधन, आरिफ मोहम्मद खान और सतपाल मलिक ने कांग्रेस से अलग राह अपना ली थी। तब नीतीश कुमार, शरद यादव के आदमी माने जाते थे और उन दिनों शरद के राजनीतिक बॉस देवीलाल का हरियाणा की सत्ता पर कब्जा था। तब उन्होंने राजीव विरोधी परिवर्तन रथ चला रखा था।

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