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आपरेशन ‘माफिया क्लीन’ पर उठे सवाल

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली यूपी में आपरेशन ‘‘माफिया क्लीन’’ पर अब सवाल खडे़ किए जाने लगे हैं। मुठभेड़ के नाम पर निर्दोष युवकों की बली चढ़ाए जाने के आरोप अब खुलकर लगाए जाने लगे हैं। भुक्तभोगी परिवार के लोग तो खुलकर सामने आए ही हैं साथ ही कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने भी यूपी के ऐसे आॅपरेशनों पर उंगली उठानी शुरु कर दी है। सरकार कटघरे में है, पुलिस की कार्यप्रणाली पहले से ही संदेह के घेरे में रही है, रही बात सत्ताधारी नेताओं-मंत्रियों की तो वे भी मौके का फायदा उठाने से नहीं चूक रहे।
पिछले दिनों मुजफ्फरनगर साम्प्रदायिक हिंसा के गवाह इकराम को गवाही देने के एवज में उसकी सांसे थामने की तैयारी थी लेकिन स्थानीय नागरिकों के विरोध के चलते स्थानीय पुलिस अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पायी और अपनी हरकतों से जुडे़ तमाम ऐसे सवाल पीछे छोड़ गयी है जिनकी जांच होना जरूरी है। गवाह इकराम का परिवार अब खाकी को देखते ही दहशत में आ जाता है, बच्चे रोने लगते हैं। लब्बोलुआब यह कि पूरा परिवार स्थानीय पुलिस की कारगुजारी के चलते दहशत में है।
इकराम की पत्नी का कहना है, ‘विगत 17 तारीख की शाम लगभग 5 बजे तीन पुलिस वाले उसके घर आए और बोले कि वे पुलिस पर हुए हमले की जांच करने आए हैं। इकराम की पत्नी के उसके पिता और दादा मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा मामले में गवाह हैं और उन पर लगातार गवाही बदलने का दबाव बनाया जा रहा है। इकराम की पत्नी का कहना है कि घटना वाले दिन (12 जून) सादे ड्रेस में एक आदमी आया और पापा को पूछते हुए घर में घुस गया। मोहल्ले में नूर हसन के यहां वलीमा था। बहुत से मिलने-जुलने वाले भी घर आए थे। पापा ऊपर वाले कमरे में थे। ऊपर वाले कमरे से वो पापा को खींचकर लाने लगा तो हाथा-पाई होने लगी। ये देखकर हम सब बहनें रोने लगीं और अपने पापा को ले जाने का कारण पूछने लगीं। इतना पूछते ही पुलिस वाले हमें भी मारने-पीटने लगे।’ यह पूछने पर कि कोई महिला पुलिस साथ थी तो सलमा ने ‘नहीं’ में जवाब दिया और साथ ही यह भी बताया कि पुलिस वाले महिलाओं तक को मार रहे थे। भुक्तभोगी परिजनों का कहना है कि जब उनकी अम्मी ने विरोध किया तो पुलिस वालों ने उनके कपड़े तक फाड़ दिए। 60 वर्षीय बुजुर्ग महिला हसीना के पैर और उनकी बहन रुबीना के गर्दन में आज भी चोटों के जख्म देखे जा सकते हैं। इसके बाद पुलिस वाले उनके पिता को जबरन ले जाने लगे। जब उन्होंने विरोध किया तो गोलियां भी चलायीं जिसमें एक गोली तो ऐसे मारी जैसे उनको पकड़ना तो केवल बहाना था, वे तो पापा को मारने के लिए ही आए थे। सलमा ने रोते हुए बताया, ‘25 जून को उसकी शादी है और पुलिस वालों ने हमारे घर में गम का माहौल पैदा कर दिया है।’
इकराम के पिता नफेदिन बताते हैं कि वो रहीसू की हत्या के गवाह हैं और 24 जून को अदालत में उनकी गवाही है। शायद यही वजह है कि पिछले पांच-सात महीने से लगातार दबाव बनाया जा रहा है। भुक्तभोगी परिवार के सदस्यों ने करन, मदन, प्रवीण, फेरु, विक्की आरोपियों का नाम लेते हुए कहा कि ये सब विधायक उमेश मलिक के आदमी हैं।
इस सम्बन्ध में मोहल्ले वाले बताते हैं कि सादी वर्दी वाला नितिन सिपाही था जिसके साथ तीन मोटर साइकिल पर लोग आए थे। थोड़ी ही देर में एक बोलेरो और दो जीप भी आ गयी। रहीसू हत्याकांड मामले में शमशेर भी उनके साथ एक गवाह हैं। उन पर भी लगातार दबाव है। वो बताते हैं कि आरोपी पक्ष ने साढ़े चार लाख रुपए देकर अन्य गवाहों को अपने पक्ष में कर लिया है जिनमें अफरोज, प्रवीन और यहां तक कि रहीसू का लड़का हनीफ भी शामिल है।
रहीसू हत्याकांड मामले के अहम गवाह शमशेर उस दिन इकराम के साथ हुई घटना की बात करते हुए कहता है कि करन ने छह लाख रुपए तक गवाही बदलने पर देने को कहा। ये लोग काफी समय से लगातार दबाव बना रहे हैं। इस घटना के पन्द्रह-बीस दिन पहले भी सुरेश और रहीसू का बेटा हनीफ आए थे। दो महीने से इनका दबाव बहुत बढ़ गया है। वे बताते हैं कि करन, सुरेश, भूरा, फेरु, विक्की, मदन, संहसर, प्रवीण, श्यामत ये सभी दो-दो, तीन-तीन साल तो कोई छह महीना जेल काटकर निकले हैं।
ज्ञात हो इकराम और उनके भाई आदिल भी फेरी के काम से परिवार पालते रहे हैं। सांप्रदायिक हिंसा पीड़ितों के इस मोहल्ले में मुहम्मदपुर रायसिंह, खेड़ा, फुगाना और अन्य जगहों से सांप्रदायिक तत्वों के डर से विस्थापित साठ-सत्तर परिवारों का बसेरा है।

बताते चलें कि ग्राम मुहम्मदपुर रायसिंह थाना भौराकलां में 8 सितंबर 2013 को हुई सांप्रदायिक हिंसा में रहीसुद्दीन पुत्र कपूरा की हत्या हो गई थी जिसके गवाह इकराम के पिता नफेदीन हैं। इकराम सहित कई लागों के घरों में आगजनी हुई थी जिसको लेकर मुकदमा दर्ज हुआ था। इस घटना के बाबत स्पेशल टीम ने जांच की थी जिसके बाद फेरु, करन, संहसर, मदन, प्रवीण, विजय, संजीव, विनोद, प्रवीण आदि को आरोपी बनाया गया था। इस मुकदमे में इकराम की गवाही होनी है जिसको लेकर सुरेश, विक्की और अन्य इकराम पर छह-सात महीने से अपने पक्ष में गवाही देने का दबाव बना रहे थे। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सुरेश और अन्य आधा दर्जन लोग 10 जून 2019 को लगभग 10 बजे सुबह इकराम के घर आए और समझौते के लिए दबाव बनाने लगे। सुरेश का कहना था कि विधायक उमेश मलिक के मन मुताबिक फैसला कर लो, तुमको छह लाख रुपए मिलेगा लेकिन गवाही दोगे तो तुम्हारा इनकाउंटर करा दिया जाएगा। इकराम लालच और धमकी के सामने नहीं झुके। उधर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त आरोपियों के हौसले बुलंद थे। 12 जून 2019 को दोपहर बाद करीब ढाई बजे इकराम घर में मेहमानों के साथ बैठा था कि एक व्यक्ति आया और उसने पूछा कि इकराम कौन है। इकराम की पहचान होते ही वह उन्हें घसीटते हुए ऊपर से नीचे की ओर ले आया। तब तक आठ-दस पुलिसकर्मी और आ गए थे। उन लोगों ने कहा कि थाने चलो, सीओ साहब ने बुलाया है। इनमें बुढ़ाना थाने के सिपाही नितिन, सतीश, शिवकुमार व दरोगा ओमकार पाण्डेय व अन्य शामिल थे। इकराम को वे जबरदस्ती थाने ले जाने लगे जबकि उनके पास कोई वारंट नहीं था। इकराम की पत्नी हाजरा, लड़कियां गुलफशा, रुबी, सलमा, आशमा छुड़ाने लगीं तो उनको डंडों, लात मुक्कों से मारा। इकराम बहुत डरा हुआ था। पुलिस से जान बचाने की कोशिश की तो सामने से एक पुलिसकर्मी ने गोली चला दी। इकराम तुरंत जमीन पर लेट गया और गोली से बच गया। फिर पुलिस द्वारा दो और हवाई फायर किए गए और फिर राइफल के कुंदे से मारा। इकराम की पत्नी ने पति को पिटता देखउसे बचाने की कोशिश की तो उसे और उसकी बेटियों तक को मारा। उसकी पत्नी के कपड़े तक फाड़ दिए। आस-पड़ोस के काफी लोग इकट्ठा हो गए पर पुलिस कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। पुलिस इलियास उर्फ मिंटू और इंतजार फौजी को पीटते हुए थाने ले गई और बिना कसूर के हवालात में बंद कर दिया। थाने पर आम जनता ने पहुंचकर निर्दोषों को छोड़ने की मांग की तो रात आठ बजे के करीब उन्हें छोड़ा।
पुलिस थाना बुढ़ाना पर सत्ता पक्ष का दबाव साफ-साफ दिखा जो मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपियों को बचाने के लिए किसी भी हद तक उतरने पर उतारु दिखी। जो लोग दंगे के बाद अपना घर-गांव छोड़ने को विवश हुए, एक बार फिर राजनीतिक बदले की भावना से भरे पुलिसिया हिंसा का शिकार हो रहे हैं। पुलिस अपने ऊपर उठ रहे सवालों से बचने के लिए कह रही है कि वो वहां बदमाश को पकड़ने गई थी। सवाल उठता है कि इकराम पर पुलिस ने फायरिंग क्यों की। सादी वर्दी में इकराम को मारते-पीटते पुलिस का जो वीडियो सामने आया है उसे देख कोई भी कह सकता है कि पुलिस इकराम का इनकाउंटर करने आई थी। अपने बचाव में पुलिस ने यह कहानी गढ़ी कि वो राजा नाम के किसी बदमाश को पकड़ने के लिए गयी थी जिसे इकराम ने सरंक्षण दिया था। ऐसे में पुलिस ने उसको भगाने के एवज में इकराम को निशाना बनाया।
स्पष्ट है कि ऐसा करके वह यूपी में हो रही फर्जी मुठभेड़ों में एक और मुठभेड़ को न सिर्फ शामिल करती बल्कि मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक हिंसा के आरोपी भाजपा विधायक उमेश मलिक के समर्थकों की गर्दन कानून के हाथों से छुड़ा लेती। अगर ऐसा नहीं था तो क्यों पुलिस बार-बार वीडियो में भी कह रही है कि सीओ साहब बुला रहे हैं। किसी को बिना वारंट उठाने में सीओ साहब की इतनी दिलचस्पी क्यों थी कि उसके ऊपर तीन-तीन गोलियां चलाई गईं।
ऐसे तमाम प्रश्न है जिसका जवाब घटना स्थल के आस-पास ही मौजूद है लेकिन स्थानीय प्रशासन आंख मूंदकर बैठा है। आरोप तो यहां तक हैं कि स्थानीय प्रशासन सिर्फ ऊपर से आदेश की प्रतीक्षा में है, माहौल तैयार हो चुका है। कहा जा रहा है कि स्थानीय जनता का विरोध ठण्डा होते ही एक और फर्जी मुठभेड़ की कहानी पुलिस के दस्तावेजों में शामिल हो जायेगी।

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