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भारत में लागू होगी ‘वन नेशन वन चार्जर पॉलिसी’

दुनियाभर में ई -कचरे से उत्पन्न हो रहा कचरा तेजी से बढ़ रहा है। भारत में 95 प्रतिशत ई-कचरे का रीसाइक्लिंग किया जा रहा है। इलेक्ट्रानिक और इलेक्ट्रिकल उपकरणों (ईईई) और उनके पार्ट्स से है, जो उपभोगकर्ता द्वारा दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जाता। ग्लोबल ई-वेस्ट मानिटर-2020 के मुताबिक चीन और अमेरिका के बाद भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक है। इलेक्टि्कल और इलेक्ट्रानिक उपकरणों को बनाने में खतरनाक पदार्थों (शीशा, पारा, कैडमियम आदि) का इस्तेमाल होता है, जिसका मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इससे मस्तिष्क, हृदय, लीवर, किडनी को नुकसान पहुंचता है। इसके चलते भारत में अब स्मार्टफोन कंपनियों ने देश भर में एकल चार्जिंग पद्धति यानी ‘वन नेशन वन चार्जर पॉलिसी’ को लागू करने की सहमति व्यक्त की है।

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने जानकारी दी है कि कंपनियों और औद्योगिक संगठनों ने इस बात पर सहमति जताई है कि सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए सिंगल चार्जिंग पोर्ट की सुविधा होनी चाहिए। इसे ‘वन नेशन वन चार्जर पॉलिसी’ की दिशा में पहला कदम बताया जा रहा है। इस नीति के लागू होने के बाद उपभोक्ताओं को स्मार्टफोन, स्मार्ट वॉच और लैपटॉप जैसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए अलग-अलग चार्जर की आवश्यकता नहीं होगी। इन सभी को एक ही चार्जर से चार्ज किया जा सकता है यानी सी टाइप चार्जर।

‘वन नेशन वन चार्जर पॉलिसी’ के लिए जानकारी एकत्र करने के लिए एक उप-समूह बनाया जाएगा और इस बात पर विचार-विमर्श किया जाएगा कि स्मार्ट वॉच जैसे सभी उपकरणों के लिए एकल चार्जिंग पोर्ट विधि का उपयोग किया जा सकता है या नहीं। उपभोक्ता मामलों के सचिव रोहित कुमार सिंह की अध्यक्षता में विभिन्न मंत्रालयों के अधीन कार्यबल की बैठक में यह फैसला लिया गया है।

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बैठक में महाराजा अग्रसेन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MAIT), भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (FCCI) , भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) के अधिकारियों के साथ IIT कानपुर, IIT भुवनेश्वर सहित कई शैक्षणिक संस्थानों ने भाग लिया। बैठक में केंद्रीय मंत्रालयों, पर्यावरण मंत्रालय के अधिकारी भी शामिल हुए। ”बैठक के बाद जारी एक पत्र में कहा गया है, “शेयरधारक चरणबद्ध तरीके से सामान्य चार्जिंग पोर्ट नीति को लागू करने पर सहमत हुए हैं। इसे उद्यमियों द्वारा लागू किया जाएगा और फिर इसे उपभोक्ताओं द्वारा भी अपनाया जाएगा।

इस बैठक से समझा जा रहा है कि यूएसबी चार्जिंग पद्धति में टाइप-सी चार्जिंग पद्धति को अपनाने पर सहमति बन गई है। टाइप-सी चार्जिंग पद्धति स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप और अन्य विद्युत उपकरणों के लिए लागू होगी। लेकिन साथ ही भविष्य की बदलती तकनीक को देखते हुए सभी ने इस बात पर भी सहमति जताई कि स्मार्टफोन के लिए चार्जिंग के नए तरीके को इस्तेमाल करने के संबंध में नीति को समय-समय पर बदलना होगा।

उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए एक समान चार्जिंग पोर्ट के बारे में उद्यमियों को सकारात्मक रूप से सोचने की आवश्यकता है। इससे ई – कचरे की समस्या पर भी कुछ हद तक काबू पाया जा सकेगा। स्मार्ट वॉच जैसे पहनने योग्य उपकरणों के लिए देश भर में यूएसबी चार्जिंग सुविधा की व्यवहार्यता का परीक्षण करने के लिए एक समूह स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। इसमें क्षेत्र की कंपनियों, संस्थानों के अधिकारी और शिक्षा मंत्रालय के अधिकारी शामिल होंगे। साथ ही ई-कचरे पर समान चार्जिंग पोर्ट नीति के प्रभाव पर पर्यावरण मंत्रालय की ओर से एक रिपोर्ट तैयार की जाने वाली है। यह फैसला पर्यावरण के लिए लाइफस्टाइल की नीति पर आधारित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीओपी-26 की बैठक में इस नीति का जिक्र किया था।

यूरोप का कॉमन चार्जर

इससे पहले यूरोपीय संघ (ईयू) द्वारा सभी ब्रांडों के उपकरणों के लिए एकल चार्जिंग सिस्टम का उपयोग करने का निर्णय लिया गया था । वर्तमान में आईफोन को अलग केबल के माध्यम से चार्ज किया जाता है, लेकिन यूरोपीय नियमों के अनुसार, चार्जिंग केवल टाइप सी यूएसबी केबल के साथ ही की जानी चाहिए।

यूरोप का कॉमन चार्जर नियम क्या है

इस साल की शुरुआत में ही यूरोपीय संघ ने सभी विद्युत उपकरणों के लिए एकल चार्जर पोर्टल का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव को अब संसद में बहुमत से स्वीकार कर लिया गया है और अब यह नियम जल्द ही अपनाया जाएगा। कहा जा रहा है यूरोपीय संघ के देशों में सामान्य चार्जर नियम 2024 के अंत में लागू होगा। नए बदलाव मोबाइल फोन, टैबलेट, ई-रीडिंग, पोर्टेबल स्पीकर, कैमरा, हेडफोन, हेडसेट, वीडियो गेम और अन्य सभी उपकरणों पर लागू होंगे जिन्हें हम केबल के जरिए चार्ज करते हैं। 2024 के दूसरे छह महीनों तक टाइप सी यूएसबी पोर्ट सभी के लिए अनिवार्य हो जाएगा।

कॉमन चार्जर रूल से कैसे होगा फायदा?

यूरोपीय संसद के अनुसार, हर साल विभिन्न विद्युत उपकरणों के उपभोक्ता अलग-अलग चार्जर पर 250 यूरो खर्च करते हैं। यदि ऐसा सामान्य चार्जर सिस्टम अस्तित्व में आता है, तो इस अनावश्यक लागत को बचाया जा सकता है। इतना ही नहीं इससे पर्यावरण को भी फायदा होगा। 11,000 टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा हर साल उत्पन्न होता है जब क्षतिग्रस्त, बंद चार्जर को फेंक दिया जाता है। यूरोपीय संघ का मानना है कि इस नए नियम से उपभोक्ताओं को लागत बचाने और पर्यावरण की रक्षा करने में मदद मिलेगी।

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