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केंद्र में सरकार बनाते ही भारतीय जनता पार्टी ‘एक देश, एक चुनाव’ (वन नेशन-वन इलेक्शन) के अपने मुद्दे पर सक्रिय हो चुकी है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पिछले कार्यकाल के दौरान इस बारे में सभी राजनीतिक पार्टियों को चिट्ठियां लिखी और इस बार सत्ता संभालते ही तमाम पार्टियों की एक बैठक भी बुलाई। इसके चलते वन नेशन-वन इलेक्शन का मुद्दा सियासी सुर्खियों में है। इस पर राजनीतिक बहस गरमा गई है। भाजपा अपने एजेंडे पर कायम है तो विपक्षी दल बंटे हुए हैं। कुछ इस मुद्दे का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ विरोध में हैं।
उल्लेखनीय है कि 1952 में पहली बार देश के आम चुनाव हुए थे। तब लोकसभा चुनाव के साथ ही राज्यों के विधानसभा चुनाव भी संपन्न हुए थे। 1967 तक यह स्थिति बनी रही, लेकिन बीच में क्षेत्रीय दलों के उभार और मध्यवधि चुनाव के चलते यह सिलसिला टूट गया। अब इस दिशा में फिर से कोशिश हो रही है। इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में विपक्षी पार्टियों की राय जानने और सहमति बनाने के उद्देश्य से 40 पार्टियों की बैठक बुलाई। बैठक के बाद वन नेशन-वन इलेक्शन का मुद्दा इसलिए सियासी सुर्खियों में छाया हुआ है कि इस मुद्दे पर विपक्षी पार्टियां एकमत नहीं हैं। यहां तक कि कांग्रेस का कोई नेता इसका समर्थन कर रहा है, तो किसी की राय इसके पक्ष में नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री की बुलाई बैठक में नहीं पहुंचे। उनकी पार्टी के प्रवक्ता गौरव गोगोई ने एक संवाददाता सम्मेलन में वन नेशन-वन इलेक्शन प्रस्ताव का विरोध किया है। लेकिन मुंबई के कांग्रेस प्रमुख पूर्व सांसद मिलिंद देवड़ा मानते हैं कि ‘निरंतर चुनाव मोड़ में होना सुशासन के लिए एक अवरोधक है, राजनेताओं को वास्तविक मुद्दों को संबोध्ति करने से विचलित करता है और लोकलुभावनवाद को शासन के चरित्र में जोड़ता है।’
सीपीआई (एम) और सीपीआई ने इस विचार का कड़ा विरोध किया है। उनका तर्क है कि ‘राज्य के चुनावों को आम चुनावों से अलग क्यों किया गया, इसकी वजह थी संविधान के अनुच्छेद 356 का घोर दुरुपयोग। जब तक यह अनुच्छेद रहेगा, तब तक हम एक साथ चुनाव नहीं कर सकते हैं। सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी ने संवाददाताओं से कहा। यह विचार लोकतंत्र को अस्थिर कर देगा। सूत्रों के अनुसार, बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस और तेलंगाना राष्ट्रीय समीति जैसे क्षेत्रीय दलों ने इस विचार का समर्थन किया है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी ने कहा कि हालांकि उनकी पार्टी सिद्धांत रूप में इस विचार से सहमत है। लेकिन यह विधानसभाओं के निर्धारित कार्यकाल के विरोध में हैं।
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक जो इस बैठक को छोड़ने वाले पहले लोगों में से एक थे, उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि उनकी पार्टी इस विचार का समर्थन करती है। कई अन्य दलों ने भी इस पर जोर दिया और आगे के अध्ययन करने की आवश्यकता के बारे में बताया। एनसीपी नेता शरद पवार ने कहा कि यह विचार अच्छा है, लेकिन यह व्यावहारिक नहीं है।
तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कहा कि इस फॉर्मूले को जल्द लागू नहीं किया जा सकता है और इसके लिए एक श्वेत पत्र की आवश्यकता है। तेलुगु देशम पार्टी, नेता चंद्रबाब नायड्ू ने विदेश में होने के कारण बैठक में भाग नहीं लिया इसलिए उन्होंने एक ज्ञापन सौंपा। टीडीपी ने तर्क दिया है कि ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ एक गंभीर और संवेदनशील विषय है जिसमें बहुत विचार-विमर्श की आवश्यकता होगी। सहकारी संघवाद एक प्रमुख विशेशता है और पार्टियों को इसे स्वीकार करने से पहले कानूनी, राजनीतिक और व्यावहारिक पहलुओं में तौलना चाहिए।
बसपा की प्रमुख मायावती भी बैठक में अनुपस्थित रहीं। उन्होंने संवाददाताओं से कहा कि राष्ट्रीय और राज्य के चुनाव एक साथ होना भारत जैसे विशाल देश के लिए अलोकतांत्रिक और अंसवैधानिक है। उन्होंने कहा कि चुनावों को खर्च और उपव्यय के दृष्टिकोण से नहीं तौला जाना चाहिए। ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ का विचार एक ऐसी प्रणाली की परिकल्पना करता है जहां सभी राज्यों और लोकसभा के चुनाव एक साथ होने हों। इसमें भारतीय चुनाव चक्र के पुनर्गठन को इस तरह से शामिल किया जाएगा कि राज्यों और केंद्र के चुनाव में तालमेल हो। इसका मतलब यह होगा कि मतदाता लोकसभा और राज्य विधनसभाओं के सदस्यों के लिए एक ही दिन के लिए अपना वोट डालेंगे।
 1983 में चुनाव आयोग की वार्षिक रिपोर्ट में एक साथ चुनावों पर भरोसा करने के विचार को प्रस्तुत किया गया था। विधि आयोग की रिपोर्ट ने इसे 1991 में भी संदर्भित किया। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में यह मुद्दा रखा। मोदी ने 2016 में एक बार फिर से इस विचार को व्यक्त किया। नीति आयोग ने जनवरी 2017 में इस विषय पर एक कार्यपत्र तैयार किया। अप्रैल-2018 में विधि आयोग ने जो वर्किंग पेपर निकाला उसमें कहा गया था कि कम से कम पांच संवैधनिक सिफारिशें आवश्यक होंगी। इसे कामयाब करने में एक साथ चुनाव कराने पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है।

वन नेशन, वन इलेक्शन के फायदे

  • चुनाव खर्चों में कमी आएगी बार-बार सरकारी कर्मियों को चुनाव ड्यूटी पर नहीं लगाना पड़ेगा।
  • यह प्रणाली सत्ताधरी दलों को चुनाव मोड़ में लगातार रहने के बजाय शासन पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगी।

वन नेशन, वन इलेक्शन के नुकसान

  • राष्ट्रीय और राज्य के मुद्दे अलग-अलग हैं और एक साथ चुनाव कराने से मतदाताओं के फैसले पर असर पड़ने की संभावना है।
  • चूंकि चुनाव पांच साल में एक बार होंगे। इसलिए यह लोगों के लिए सरकार की जवाबदेही को कम करेगा। बार-बार चुनाव विधायकों को सक्रिय व सतर्क रखते हैं और जवाबदेही बढ़ाते हैं।
  • यह लोकतंत्र और संघवाद के लिए एक झटका होगा।

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