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अब गेंद सोनिया के पाले में

जैसा कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नटवरसिंह ने कहा है, यदि नेहरू-गांधी परिवार बैकफुट पर चले जाता है तो कांग्रेसी छत्रप आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएंगे और पार्टी में एक नहीं कई विघटन हो जाएंगे। जिस प्रकार चुनाव मुहाने पर खड़े हरियाणा में शीर्ष नेताओं की रार को सुलझा पाने में पार्टी विफल रही है, पूरी आशंका है कि इस टूट की शुरुआत भूपिन्दर सिंह हुड्डा से ही हो जाए। यदि प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान मिलती है, तो जरूर गुटों-खेमों में बंट चुकी कांग्रेस को जीवनदान मिल सकता है। जिन तेवरों का प्रदर्शन प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में दलित हत्याओं के मुद्दे पर किया उससे जनता को एक बार फिर बिहार का बेलछी कांड और इंदिरा गांधी की हाथी पर सवारी याद हो आई। यदि गांधी परिवार प्रियंका को आगे नहीं करता और किसी अपने विश्वस्त को पार्टी की कमान सौंपता है, तो निश्चित ही पार्टी (बची-खुची) एक नहीं कई भागों में टूट जाएगी। अब गेंद सोनिया गांधी के पाले में है, यह उनकी समझ और सोच पर निर्भर है कि वे बैटिंग करती हैं या फिर गेंद को नो बॉल में बदल देती हैं

 

देश का सबसे पुराना राजनीतिक दल अपने अस्तित्व के संकट से उबर नहीं पा रहा है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस अतीत में कभी ऐसे समय से दो-चार न हुई हो, ऐसा पूर्व में कई बार हुआ तब लेकिन कांग्रेस के पास नेतृत्व का संकट नहीं था। नया नेतृत्व पुराने से ‘बैटन’ लेने को तैयार था। अब हालात उलट हैं, पार्टी का युवा नेता पद छोड़ने को तैयार है, बैटन थामने वालों की भी कमी नहीं, कमी नए नेतृत्व की स्वीकार्यता और गांधी परिवार से इतर ऐसे किसी भी नेतृत्व की क्षमता का है। जुलाई 1963 में भी कांग्रेस को तब भारी संकट के दौर से गुजरना पड़ा जब चीन से मिली करारी हार के बाद ऊर्जाविहीन नेहरू ने पार्टी में आमूल-चूल परिवर्तन की बात कही थी। सोनिया गांधी की स्थिति ठीक नेहरू समान ही है। फर्क सिर्फ इतना कि न तो उनके पास इंदिरा सरीखी कोई शख्सियत मौजूद है, न ही कामराज सरीखा कोई सहयोगी जो पार्टी के लिए भविष्य की रूपरेखा तैयार कर सके। हालांकि कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले बुद्धिजीवियों और गांधी परिवार पर निर्भर रहने वाले कांग्रेसी नेताओं के बड़े वर्ग को प्रियंका गांधी से बड़ी आस है, सोनिया गांधी अनिर्णय के भंवर में ऐसी जा फंसी हैं कि उन्हें मार्ग तलाशे नहीं मिल रहा। कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर फैसला जितना देरी से होगा उतना ही नुकसान पार्टी को होना तय है। कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है। सत्तालोलुप और सुविधाभोगी कांग्रेसी तेजी से पलायन कर भाजपा की शरण में जाने लगे हैं।

कामराज प्लान-एक नजर

चीन से मिली करारी शिकस्त ने ‘हिंद-चीन भाई-भाई’ और ‘पंचशील’ के सिद्धांत पर चल रही नेहरू सरकार के प्रति न केवल जनता में अविश्वास के बीज बोए, बल्कि स्वयं जवाहरलाल नेहरू गहरे अवसाद का शिकार हो गए। यह वह दौर था जब लोकसभा के लिए उपचुनाव में नेहरू के धुर विरोधी तीन कद्दावर नेता चुनाव जीत संसद में पहुंच गए थे। डॉ राममनोहर लोहिया, आचार्य कøपलानी और फायर ब्रांड मीनू मसानी जहां संसद में नेहरू सरकार पर तीव्र प्रहार कर रहे थे, नेहरू के गिरते स्वास्थ्य के कारण कांग्रेस कमजोर होने लगी थी। ‘नेहरू के बाद कौन’ कांग्रेसियों के बीच चर्चा का विषय बनने लगा था। ऐसे कठिन समय में मद्रास (अब तमिलनाडु) के कांग्रेसी सीएम के ़ कामराज ने नेहरू को सलाह दी कि वरिष्ठ कांग्रेसियों को सत्ता का मोह त्याग संगठन के लिए काम करना चाहिए। नेहरू को उनका सुझाव बेहतर लगा। कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने इस प्रस्ताव पर चर्चा की। नतीजा नेहरू मंत्रिमंडल के सदस्यों ने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को सौंप दिया। साथ ही के ़ कामराज समेत कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी त्यागपत्र ले लिया गया। नेहरू ने मोरारजी देसाई, लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम समेत छह मंत्रियों के त्यागपत्र स्वीकार कर उन्हें संगठन का काम सौंप दिया। मद्रास, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, बिहार और कश्मीर के मुख्यमंत्रियों को भी सरकार से हटा संगठन में भेज दिया गया। कामराज की इसी योजना को ‘कामराज प्लान’ कह पुकारा जाता है। कामराज स्वयं कांग्रेस के अध्यक्ष बने और नेहरू की मृत्यु पश्चात उन्होंने बहुत कुशलता के साथ उनके उत्तराधिकारी के प्रश्न को सुलझाते हुए लाल बहादुर शास्त्री को नया प्रधानमंत्री बनाया। कामराज ने सामूहिक नेतृत्व की भावना से पार्टी को चलाया। शास्त्री के बाद इंदिरा गांधी जब सत्ता का केंद्र बनी तो शनैः शनैः उन्होंने इस कामराज प्लान के मुख्य तत्व कलेक्टिव लीडरशीप से किनारा कर व्यक्ति केंद्रित सत्ता स्थापित कर डाली। हालांकि तब से लेकर आज तक देश की नदियों में खासा पानी बह चुका, लेकिन जब कभी भी कांग्रेस पर संकट के बाद मंडराते हैं, पार्टी में कामराज प्लान की गूंज सुनाई देने लगती है। राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से अपने इस्तीफे के साथ पार्टी को नेहरू-गांधी परिवार से इतर नेतृत्व तलाशने की बात कह एक बार फिर से के. कामराज की रणनीति पर पार्टी को विचार करने के लिए बाध्य कर दिया है।

कांग्रेस के सामने विकल्प

  • नेहरू के समय कांग्रेस से जनता का मोहभंग होना अवश्य शुरू हो गया था, लेकिन पार्टी न केवल केंद्र, बल्कि अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ थी। आज इसका उलट है। भाजपा केंद्र समेत अधिकांश राज्यों में सत्तारूढ़ है और कांग्रेस मात्र पांच राज्यों में। इनमें से भी मध्य प्रदेश की सरकार कर्नाटक के बाद अब भाजपा के निशाने पर है। इतना ही नहीं पार्टी के पास कामराज सरीखा कोई नेता नहीं जो इस संकट की घड़ी में निजी महत्वाकांक्षा से परे पार्टी के लिए रोड मैप तैयार कर सके। कांग्रेस पूरी तरह से नेहरू-गांधी परिवार पर निर्भर एक ऐसा संगठन बन चुका है जिसमें सड़क पर उतरकर संघर्ष करने का माद्दा नहीं बचा है। कांग्रेस के दिग्गजों पर एक नजर डालें तो पी ़ चिदंबरम, अहमद पटेल, अंबिका सोनी, मोतीलाल बोरा, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, मुकुल वासनिक, दीपक बावरिया जैसे चंद ऐसे नाम जो कांग्रेस की शीर्ष निर्णायक समिति सीडब्ल्यूसी के सदस्य हैं। इनमें से एक भी ऐसा नहीं जिसका कोई जनाधार हो। ये वे नाम हैं जो नेहरू- गांधी परिवार से चिपटे हुए हैं। इन्हें चापलूस मंडली कहा जा सकता है जो राहुल गांधी के हर उस प्रयास में मट्ठा डालते रहे हैं जिनकी बिना पर राहुल पार्टी का युवा नेतृत्व देने का प्रयास कर रहे थे। सोनिया गांधी ने जब कांग्रेस की कमान संभाली थी तब भी हालात इतने ही खराब थे। लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक चातुर्य और सूझ-बूझ से कांग्रेस को मुख्यधारा में ला दिया। हालात एक बार फिर से तब खराब होने शुरू हुए जब सोनिया गांधी ने स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के कारण राहुल गांधी को आगे किया। यहीं से युवा और ओल्ड के बीच कोल्डवार शुरू हो गई। राहुल जब भी कुछ कड़े कदम उठाते सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द चिपके इन पुराने दिग्गजों के चलते उन्हें बैकफुट पर आना पड़ता। इन लोकसभा चुनावों में मिली हार के बाद राहुल गांधी का इस्तीफा चुनावी पराजय से उपजी हताशा से कहीं ज्यादा कांग्रेस की वह अंतर्कलह है जिसके चलते राहुल अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सके। अब कांग्रेस के पास केवल दो ही विकल्प हैं :नया कामराज प्लान : पार्टी, विशेषकर सोनिया गांधी को फिर सक्रिय हो कामराज के सामूहिक नेतृत्व वाली सोच को लागू करना होगा ताकि पार्टी भविष्य का रोड मैप तैयार कर सके।

    प्रियंका को बागडोर : जैसा कि वरिष्ठ कांग्रेसी नेता नटवरसिंह ने कहा है, यदि नेहरू-गांधी परिवार बैकफुट पर चले जाता है तो कांग्रेसी क्षत्रप आउट ऑफ कंट्रोल हो जाएंगे और पार्टी में एक नहीं कई विघटन हो जाएंगे। जिस प्रकार चुनाव मुहाने पर खड़े हरियाणा में शीर्ष नेताओं की रार को सुलझा पाने में पार्टी विफल रही है, पूरी आशंका है कि इस टूट की शुरुआत भूपिन्दर सिंह हुड्डा से ही हो जाए। यदि प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान मिलती है तो जरूर गुटों-खेमों में बंट चुकी कांग्रेस को जीवनदान मिल सकता है। जिन तेवरों का प्रदर्शन प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में दलित हत्याओं के मुद्दे पर किया उससे जनता को एक बार फिर बिहार का बेलछी कांड और इंदिरा गांधी की हाथी पर सवारी याद हो आई। यदि गांधी परिवार प्रियंका को आगे नहीं करता और किसी अपने विश्वस्त को पार्टी की कमान सौंपता है, तो निश्चित ही पार्टी (बची-खुची) एक नहीं कई भागों में टूट जाएगी। अब गेंद सोनिया गांधी के पाले में है, यह उनकी समझ और सोच पर निर्भर है कि वे बैटिंग करती हैं या फिर गेंद को नो बॉल में बदल देती हैं। इतना तय है कि यदि जल्द कांग्रेस अध्यक्ष पर फैसला नहीं हुआ तो पार्टी का बंटाधार तय है।

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