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उत्तर प्रदेश में चुनाव समाप्ति की ओर हैं। चौतरफा यही हवा बह रही है कि योगी सरकार की वापसी होनी कठिन है। पहले तीन चरणों के चुनाव बाद इस हवा ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया था। पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 58 सीटों के लिए हुए मतदान बाद राजनीतिक पण्डितों ने कयास लगाने शुरू किए कि इन 58 में से 40 पर सपा-लोकदल का कब्जा होने वाला है। दूसरे चरण की 55 सीटों पर मतदान बाद इन चर्चाओं ने तेजी पकड़ ली। तीसरे चरण की 59 सीटों में मतदान बाद तो सपा की आंधी चलने लगी। इससे भाजपा भीतर भारी घबराहट का माहौल बना। इस घबराहट को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में मायावती की तारीफों के कसीदों से समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि मायावती को दलित समाज का समर्थन है और उनकी पार्टी को अच्छे वोट मिलने तय हैं। यह वही अमित शाह हैं जो कुछ अर्सा पहले तक ‘बुआ, बबुआ और बहन’ पर तंज कसते घूम रहे थे। मुरादाबाद में एक जनसभा में उन्होंने हुंकार भरी थी कि बुआ मायावती, बबुआ अखिलेश और बहन प्रियंका मिलकर भी चुनाव लड़े तो भी भाजपा को नहीं हरा सकते। अब लेकिन उनके सुर बदल चुके हैं।

राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा भीतर फैल चुकी घबराहट से जोड़ रहे हैं। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सत्ता गलियारों में कहा-सुना जा रहा है कि भाजपा आलाकमान ने मान लिया है कि अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सत्ता मिलना संभव नहीं इसलिए बीच चुनाव अपनी रणनीति बदल अमित शाह मायावती को आगे कर दलित वोट बैंक को साधने का प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, भाजपा आलाकमान प्रधानमंत्री मोदी से लेकर मुख्यमंत्री योगी तक की जनसभाओं में खाली पड़ी कुसिर्यों, पार्टी प्रत्याशियों को कई विधानसभा क्षेत्रों में जनता द्वारा खदेड़े जाने की खबरों आदि से खासी चिंतित है। पार्टी नेतृत्व को लगने लगा है कि मोदी की करिश्माई छवि का जादू अब टूट रहा है। इस छवि का ही कमाल था कि 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में जो 17-18 प्रतिशत भाजपा का कोर वोट बैंक था, वह 2017 के चुनाव में बढ़कर 39.67 प्रतिशत पहुंच गया था। इन चुनावों में इस बढ़े हुए वोट बैंक का टूटना तय है। कोरोनाकाल में योगी सरकार की बदइंतजामी, बढ़ती महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी आदि के चलते 2017 में भाजपा से जा मिला 22 प्रतिशत वोट अबकी बार सपा की तरफ जाता नजर आने लगा है।

2017 के चुनाव में सपा के हिस्से मात्र 21.82 प्रतिशत वोट इस बार सपा की तरफ जाता है तो उत्तर प्रदेश से भाजपा का सूपड़ा साफ होना तय है। यही कारण है कि भाजपा आलाकमान अब बाकी बचे दो चरणों के चुनाव पर पूरा फोकस सपा को जाते नजर आ रहे वोट को बिखेरने का है ताकि मायावती की बसपा को कुछ मजबूती मिल सके और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति में बहिनजी का साथ ले भाजपा अपनी सरकार बना सके। जानकारों का कहना है कि इस रणनीति से भाजपा को फायदा कम, नुकसान ज्यादा हो सकता है। बसपा से जुड़ा मुस्लिम मतदाता अब भाजपा संग मायावती के संभावित गठजोड़ से नाराज हो सपा के पक्ष में चला जाएगा। इतना ही नहीं दलित वोट बैंक में भी इससे बिखराव बढ़ेगा और गैर जाटव दलित मायावती के बजाए अखिलेश के पक्ष में मतदान करेगा। सत्ता गलियारों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि यदि त्रिशंकु विधानसभा बनी तो भाजपा मायावती के समर्थन से सरकार बनाने का प्रयास करेगी। ऐसी स्थिति में योगी महाराज का मुख्यमंत्री न बनना तय बताया जा रहा है।

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